हे शिक्षक

जब भी मैं अपने विद्यालय के दिनों को याद करता हूँ

अपने गुरू जन को नमन करता हूँ।

कहते हैं गुरू आपके जीवन में नया सवेरा लाता है

पर वो सवेरा नहीं लाता हमारे नयन खोलता है।

जिस तरह आँखें होते हुए भी दिन में उल्लू अंधा रहता है

बिन ज्ञान के हमारा जीवन भी अंधकार में रहता है।

वह प्यार वह सम्मान वह डाँटना

वह मेहनत वह संस्कार व संभालना

धन्य है ‘हे गुरू’ जो तूने दिया

कोई शब्द नहीं है जिसमें तू है समाना।

मैं तो चला आया था यूँही

तूने ही मुझे राह दिखाई।

मैं तो भटकता था अनजानी सी राह पर

तूने ही जीवन की दिशा बताई।

मैं तो बहता था किसी मदमस्त नदी में

तूने ही ज्ञान की नौका दिलाई।

अब मैं राह को जानता हूँ

हर दिशा को पहचानता हूँ।

इस जीवन नौका को खेता हूँ

सब तेरी ही अथक मेहनत का परिणाम है।

हे गूरू तूझे शत्शत्प्रणाम है।

Aarnav Bharti, Hindi poem, 11 to 13 years
Average rating of 1 from 1 vote

Leave a Reply

Loading...