इस बात को अधिक समय नहीं हुआ था जब मैं और मेरा बेटे भारत के राष्ट्रीय खेल, जो कि मेरी समझ में हॉकी है, के विषय में चर्चा कर रहे थे। तभी मेरी बेटे ने मुझे बताया कि स्कूल में उसके एक दोस्त ने उसे बताया था कि हॉकी भारत का राष्ट्रीय खेल नहीं है। मैंने यह मानने से मना कर दिया क्योंकि बचपन से कई किताबों में यह यही पढ़ती और सुनती आ रही हूँ। और इसके बाद हुए शोध में पता लगा कि भारत का स्पष्ट तौर पर कोई राष्ट्रीय खेल ही नहीं है।

यह तथ्य तब सामने आया जब लखनऊ की एक छोटी सी लड़की ने जानना चाहा कि हॉकी वास्तव में राष्ट्रीय खेल कब घोषित किया गया था। उसने संबन्धित मंत्रालय को पत्र लिखा जिसके उत्तर में उन्होनें लिखा कि भारत में कोई भी खेल राष्ट्रीय खेल घोषित नहीं हुआ है।

कई जगह और किताबों में यह लिखा रहता है कि फ़ील्ड हॉकी भारत का राष्ट्रीय खेल है किन्तु इस बात की कोई औपचारिक घोषणा नहीं हुई है। वैसे तो मुझे भी अभी निश्चित नहीं है कि हॉकी वास्तव में राष्ट्रीय खेल है या नहीं, किन्तु हॉकी का भारत में स्वर्णिम इतिहास रहा है और एक समय यह भारतीयों का प्रिय खेल हुआ करता था।

भारत में फ़ील्ड हॉकी का सबसे अच्छा समय १९२८ से १९५६ के बीच का था जब भारतीय हॉकी टीम (पुरुष) ओलिंपिक्स में लगातार ६ स्वर्ण पदक जीती थी। ध्यान चंद भारत में हॉकी के उस स्वर्णिम दौर के चमकते खिलाड़ी थे। इसके बाद, भारत ने १९६४ के टोक्यो ओलिंपिक्स और १९८० के मॉस्को ओलिंपिक्स में भी स्वर्ण पदक जीता।

Hockey and its glorious history in India

किसी यूरोपीय देश के अतिरिक्त, अंतराष्ट्रीय हॉकी फेडरेशन का हिस्सा बनने वाला भारत पहला देश था। भारतीय महिला टीम ने भी १९८० में मैंडलिउ में हुए हॉकी विश्व कप और मॉस्को ओलिंपिक्स में चौथा स्थान प्राप्त किया।

हॉकी सबसे पुराने खेलों में से एक जाना जाता है और यह प्राचीन अरबों, यूनानी, रोमन, फ़ारसी और इथियोपियाई द्वारा भी खेला जाता था।

इस खेल को अलग-अलग समय और जगह पर अलग-अलग तरीकों से खेला गया। कुछ इसे खेल की तरह खेलते थे और कुछ अच्छा योद्धा बनने के उद्देश्य से इसे खेलते थे। वर्तमान समय के फ़ील्ड हॉकी के रूप में यह १९वी सदी में ब्रिटिश आइल्स में स्कूली खेल बनकर विकसित हुआ। इस खेल के पूर्वज थे स्कॉटिश शिंटी, वेल्श बैंडी और आयरिश हरलिंग।

ब्रिटिश आर्मी द्वारा भारत में परिचित कराये जाने पर इसने शीघ्र ही भारतीयों को भी अपनी ओर आकर्षित किया। भारत के पहले हॉकी क्लब की स्थापना कलकत्ता में सन १८८५-८६ में हुई। खेल के नियम मानकीकृत थे। अंतराष्ट्रीय हॉकी फेडरेशन १९२४ में बना और भारतीय हॉकी फेडरेशन १९२५ में।

दो टीमें एक बार में खेलती हैं और और दोनों टीमों से ११ खिलाड़ी खेलते हैं जिसमें से १-१ खिलाड़ी गोल कीपर बनता है। पूर्वत:, हर मैच ३५-३५ मिनट के दो भागों में बंटा था किन्तु सन २०१४ में नियमों में बदलाव हुआ। अब इसे १५-१५ मिनट के चार हिस्सों में खेला जाता है। प्रत्येक खिलाड़ी के पास १५०-२०० सेंटीमेटर लंबी हॉकी स्टिक होती है। जिस गेंद का खिलाड़ी पीछा करते हैं, वह ठोस प्लास्टिक से बनी होती है। उस गेंद को स्टिक से ही मारना होता है और खिलाड़ी उसको लात नहीं मार सकते या पकड़ के भाग नहीं सकते। उनका लक्ष्य प्रतिद्वंदी टीम की ओर गोल मारना होता है। गोल वैध तभी माना जाता है जब वो निर्धारित गोले में रहकर मारा गया हो।

भारत ने अपना पहला मैच सन १९२८ में खेला जिसने सबका ध्यान अपनी ओर आकर्षित कर लिया। प्रतिद्वंदी को बिना कोई गोल दिये वह बहुत आसानी से स्वर्ण पदक जीत गए। ध्यान चंद निश्चित ही भारतीय हॉकी के हीरो के रूप में उभरे।

एक और उत्सुक बात का यहाँ वर्णन होना चाहिए। बलबीर सिंह, इस नाम को तीन दशकों तक हॉकी का पर्यायवाची माना गया। एक नहीं परंतु पाँच खिलाड़ी भारतीय हॉकी टीम के लिए खेलें हैं। प्रथम बलबीर सिंह का सबसे स्मरणीय प्रदर्शन १९५२ के हेलसिंकी ओलिंपिक्स में था जब उन्होनें नीदरलैंड्स के खिलाफ मैच में पाँच गोल किए। इसी नाम के चार और खिलाड़ी बाद के वर्षों में भारतीय टीम का हिस्सा थे। के डी सिंह, दिलीप तिरके और धनराज पिल्लई भारतीय हॉकी के कुछ प्रसिद्ध एवं प्रतिभाशाली खिलाड़ी रहे हैं।

पिछले कुछ समय में हॉकी को उसका लुप्त हुआ गौरव पुन: दिलाने की दिशा में प्रयास हो रहे हैं। चक दे इंडिया नामक प्रसिद्ध फिल्म में एक कठोर किन्तु प्रतिभाशाली कोच के प्रशिक्षण में भारतीय महिला हॉकी टीम के पूरे सफर को दर्शाया था। हाल ही में पाकिस्तान पर ७-१ के अंक से विजय प्राप्त कर भारतीय पुरुष हॉकी टीम ने भी बहुत प्रशंसा बटोरी और खेल की ओर भी लोगों का ध्यान आकर्षित किया।

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हॉकी और भारत में उसका स्वर्णिम इतिहास
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