एक पति-पत्नी बहुत साल शादी के बाद भी माता-पिता नहीं बन सके। दोनों को ही बच्चे बहुत प्यारे लगते थे। चिकित्सक आदि से सलाह-संपर्क कर भी फल नहीं मिला। अब उन्होंने सोचा – क्या फर्क पड़ता है? क्यों ना हम एक अनाथ बच्चे को गोद ले लें। इससे हमारी खुशी के साथ साथ एक बच्चे का भी जीवन सफल हो जाएगा।

लेकिन उन्हें सरल शुद्ध मन का बच्चा चाहिए था। इस पर विचार कर उन्होंने एक योजना बनाई। चलो हम अनाथ आश्रम चल कर देखते हैं, तभी हमें कुछ पता चलेगा।

दोनों पति पत्नी अनाथ आश्रम गए और प्रबंधक से मिले। उन्होंने अपनी राय उनके सामने रखी।

प्रबंधक ने कहा, “मैं आपको सब बच्चों से मिलवा देता हूँ।  लेकिन मुझे उनके स्वास्थ्य, शिक्षा एवं अन्य प्रबंधों का ख्याल रखना पड़ता है। इसलिए मेरे लिए सब बच्चे एक जैसे और अच्छे है। अब आप स्वव्यं सोचकर फैसला लीजिए। मैं आपकी इसमें कोई मदद नहीं कर सकता”।

उन्होंने विचार कर सोचा, बच्चे का स्वभाव सबसे बड़ी चीज़ है। आदतें, शिक्षा और संस्कार हम देंगे।

उन दोनों ने अगले दिन अनाथ आश्रम में बच्चों को खिलौने बांटने का विचार किया। वे सभी बच्चों के लिए खिलौने ले कर गए। उन्हें सात साल तक का बच्चा चाहिए था। उनकी नज़र में छह बच्चे आए जिनमें से एक उन्हें लेना था। उन छह को बुला कर उन्होंने बात की। सभी बच्चे प्यारे, सरल और अच्छे लगे।

अगले दिन उन्होंने फिर दौरा किया। कुछ खाने की चीज़े, कपड़े, कहानियों की पुस्तकें आदि सामान बांटते रहे और बच्चों को समझने का अनुपालन करते रहे।

उन छह बच्चों मे दो बच्चे लोभी, लालची थे। जिन्हें मुफ्त का मांग कर खाना अच्छा लगा। अतः पति पत्नी के आते ही वे भाग कर आते, चमचेबाजी में लग कर इच्छा दिखाते की उन्हें ज़्यादा से ज़्यादा सामान मिल जाए। अगली बार के लिए अपनी इच्छा भी दर्शाते।

और दो बच्चे प्राप्त हुई चीज़ो को इस्तेमाल करने की अपेक्षा दबाने, छुपाने में लग जाते। उनकी कंजूसी, छोटा दिल प्रकट हो रहा था। किसी भी और बच्चे के मांगने पर वो कुछ नहीं देते।

एक बच्चा नवाब प्रकृति का था। चीज़ की कद्र कम, इस्तेमाल में लापरवाही ज़्यादा। कुछ खाया, कुछ फेंक दिया। कोई पुस्तक पढ़ी, कोई नहीं, लापरवाही से फेंक दी। उसकी भविष्य आकृति में सरलता और यथार्थता का अभाव दिख रहा था।

heera putra

छटा बच्चा समान को ले कर, विनम्रता से धन्यवाद दे कर, गायब हो जाता। कभी भी, किसी चीज़ को इस्तेमाल करता हुआ नहीं दिखा। यदि पूछते कि तुम्हें कैसा लगा, वो सरलता से जवाब देता – बहुत, बहुत अच्छा। धन्यवाद। लेकिन जब इस्तेमाल ही नहीं किया तो झूठ क्यों बोलता है? क्या ये बहुत शातिर है? सारा सामान कहीं बेच देता है? पता लगाने की कोशिश की, लेकिन उसके बारे में कुछ समझ नहीं आया।

पति पत्नी उलझन में पड़ गए। अतः, पुनः प्रबंधक से मिलने गए। उनको सारी बात बताई और कहा, “हमारी समस्या का समाधान नहीं हुआ। लेकिन हम रजत के बारे में जानना चाहते है। इतना छोटा बच्चा – लेकिन हम उसकी मानसिकता समझ नहीं पा रहे है”।

प्रबंधक ने कहा, “मैं आपके सामने बुला कर ही पूछता हूँ।  मुझसे सब बच्चे खुल कर बात करते हैं। वो मेरे सामने झूठ नहीं बोल सकता”।

प्रबंधक ने आवाज़ लगाई, “बेटा रजत यहाँ आओ। क्या तुम इन्हें जानते हो?”

रजत बोला, “हाँ, ये कुछ दिनों से आ रहे हैं। हम बच्चों को सामान देते हैं”।

प्रबंधक ने पूछा, “लेकिन बेटा रजत, इन्होनें तुम्हें इतना सामान दिया। तुमने कुछ भी प्रयोग नहीं किया। जब स्वीकार ही नहीं किया, तो धन्यवाद किस बात का? सामान तुम्हें बहुत अच्छा लगा। यदि ऐसा कहा, तो तुमने झूठ क्यों बोला? बेटा स्थिति स्पष्ट करो। ये हमारे मेहमान हैं। इन्होनें जो कुछ भी बच्चों को खुश करने के लिए दिया है। हमें भी इन्हे संतुष्ट करना चाहिए”।”

रजत की आंखे नीची हो गई। फिर धीरे से नज़रें मिला कर सरलता से बोला, “आपको पता है, माली भैया का बेटा अन्नू, मेरा दोस्त, छत से गिर कर गम्भीर रूप से घायल पलंग पर पड़ा है। रोज़ मुझे जो भी सामान मिलता था, खाने, खिलौने, पुस्तकें, सब कुछ मैं अन्नू को दे देता हूँ। जिससे वो बहुत खुश हो जाता है। वो खुश, इसलिए मैं भी बहुत खुश। इसलिए सामान बहुत अच्छा लगा और धन्यवाद दिया। मैं अपने दोस्त की मदद करने को और उसे खुश करने को अपना सामान ही तो दे सकता हूँ ना? लेकिन मुझे माफ कर दीजिये। मुझे पहले आपसे आज्ञा लेनी चाहिए थी”।

प्रबंधक ने हल्की मुस्कुराहट के साथ पति पत्नी को देखा और  रजत की सौ प्रतिशत सच्चाई की सहमती दी।

पति पत्नी ने उठ कर रजत को गले लगा दिया। उन्हें हीरे जैसा बेटा मिल गया।

कठिन शब्द

  • दर्शाते – दिखाना
  • यथार्थता – वास्तविकता
  • मानसिकता – मन की स्थिति
हीरा पुत्र
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