Post Series: हिरण्मई और भानुप्रिया

भाषाएँ लोगों को एक दूसरे से बात करने में मदद करती हैं। लेकिन हिरण्मई ने सीखा कि हिन्दी की दीवार भी बन सकती है।

First published in March 2016

हिन्दी की दीवारहिरण्मई और भानुप्रिया को आइज़ौल में बहुत मज़ा आ रहा था। वो दोनों पहली बार पहाड़ों में रह रहे थे। उन पहाड़ों में दिन हमेशा ठंडे और हवा साफ रहती थी। दूर-दूर तक ऊंचे-ऊंचे पेड़ ही नज़र आते थे। कभी-कभार सुबह हल्की सी धुन्ध भी होती थी। उन दोनों ने पहली बार एक छुई-मुई का पौधा देखा था। छुई-मुई की पत्तियाँ हाथ लगाने से बंद हो जाती थीं। कुछ देर बंद रहकर वो अपने आप फिर खुल जाती थीं।

कुछ दिनों में हिरण्मई ने स्कूल जाना शूरू कर दिया। वो चौथी कक्षा में पढ़ती थी। भानुप्रिया अभी स्कूल के लिए छोटी थी। हिरण्मई का स्कूल एक पहाड़ की चोटी पर था। उसके स्कूल के मैदान से पूरा आइज़ौल नज़र आता था। सुबह की प्रार्थना के बाद, उसे अपनी कक्षा में बिठाया गया।

अकेली बैठी हुई हिरण्मई को आस-पास के बच्चों से बड़ी इर्ष्या हो रही थी। हर एक बच्चा किसी-न-किसी के साथ मिलकर मज़े कर रहा था। कुछ लोग उसकी तरफ़ देखते, फिर आपस में बात करते। हिरण्मई को उनकी बात समझ में नहीं आ रही थी। आइज़ौल में लोग “मिज़ो” में बात करते हैं, जो हिन्दी से कहीं अलग है।

अचानक, दो लड़के हिरण्मई की तरफ़ बढ़े। लंबे वाले लड़के ने दूसरे के कंधे पर हाथ रखा हुआ था। छोटा लड़का थोड़ा हिचकिचा रहा था, मगर लंबा लड़का उसे प्रोत्साहन दे रहा था। पास आकर छोटा लड़का बोला, “तेरा नाम क्या है?”

हिरण्मई को अजीब सा लगा की पहली मुलाक़ात में ही उस लड़के ने उसे “तेरा” कहा। वो थोड़े गुस्से से बोली, “मेरा नाम हिरण्मई है। आपका नाम क्या है?”

लड़के को उसका गुस्सा दिखा मगर वो कुछ बोला नहीं। बस उसका मुंह लाल हो गया और वो थोड़ा सा डर गया!

“मेरा नाम डैनी”, वो डरते हुए बोला। फिर झिझकते हुए पूछा, “तेरे बाप का नाम क्या है?”

यह सुनकर हिरण्मई को बहुत गुस्सा आया। “बदतमीज़ कहीं का!” उसने सोचा, “मुझसे तो बात करने की तमीज़ नहीं हैं और अपने बड़ों का भी आदर नहीं करना आता!”

हिन्दी की दीवारबिना उस लड़के का जवाब दिये, वो तमतमाती हुई अपने स्थान पर बैठ गयी। डैनी का चहरा उतर गया। उसे समझ में आ गया कि उसने हिरण्मई को गुस्सा दिलाया था। उसके दोस्त ने उसे समझाने कि कोशिश करी, मगर डैनी सुन नहीं रहा था। तभी टीचर आ गयी और पढ़ाई शुरू ही गयी।

धीरे-धीरे दिन निकला और हिरण्मई का गुस्सा कम हुआ। फिर भी जब दोपहर के भोजन के समय डैनी ने उसको देख कर मुस्कुराना चाहा, तो हिरण्मई ने उसे सिर्फ घूर कर अपनी आँखें दिखाईं! “ऐसे बदतमीज़ लोगों के साथ बात करने से तो अकेले बैठ कर खाना ही अच्छा है”, उसने अपने को समझाया।

खाने के बाद हिन्दी की क्लास थी। आज टीचर उन्हें एक शब्द से वाक्य बनाना सीखा रहीं थी। आज का शब्द था ‘किताब’।

“मैंने किताब पढ़ता हूँ”, पहला बच्चा बोला। टीचर ने उसे बड़ी शाबाशी दी और दूसरे बच्चे की तरफ बढ़ गयी। हिरण्मई जानती थी कि पहले बच्चे का वाक्य गलत था, फिर टीचर को क्यूँ नहीं पता था? उसने हाथ उठा कर टीचर से कहा, “टीचर, उस बच्चे का वाक्य गलत था। ‘मैंने’ कि जगह उसे ‘मैं’ कहना चाहिए था”

हिन्दी की दीवारटीचर ने हिरण्मई को किताब पकड़ाई और उसमें से पढ़ने को कहा। टीचर ने जब उसकी बोली सुनी, तो उन्हें एहसास हुआ कि उसकी हिन्दी बाकी बच्चों से अच्छी थी, और शायद उनसे भी! उन्होने हिरण्मई को कक्षा को पढ़ाने को कहा और खुद चैन से बैठ गईं।

हिरण्मई को बहुत खुशी हुई! उसने सबसे आगे खड़े हो कर बच्चों को पढ़ाना शुरू किया। बहुत जल्दी उसे समझ में आ गया कि उसे छोड़कर, और किसी को भी हिन्दी नहीं आती थी! और डैनी? डैनी को तो एक शब्द भी समझ नहीं आया। ना ही वो किताब से एक अक्षर पढ़ पाया!

जब हिरण्मई वापस अपने स्थान पर बैठी, तब उसे सुबह का वाक़या ठीक से समझ आया। डैनी को हिन्दी नहीं आती थी, मगर वो नयी लड़की से दोस्ती करना चाहता था। दूसरे लड़के नें उसे हिन्दी के कुछ वाक्य रटा दिये थे, जो शायद उसने हिन्दी फिल्म में सुने थे। अपनी गलत हिन्दी के बावजूद, डैनी उससे बात करने आया था!

हिन्दी की दीवार

हिरण्मई तभी उठ कर डैनी कि तरफ बढ़ी। उसकी तरफ मुस्कुराकर, उसने डैनी कि तरफ दोस्ती का हाथ बढ़ाया।

शब्दार्थ: 

  • प्रोत्साहन – कुछ करने के लिया बढ़ावा देना
  • झिझकते – रुक-रुक कर
  • वाक़या – घटना

नैतिक मूल्य:

  • स्वीकृति

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हिन्दी की दीवार
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