एक बार खरगोश और चूहा एक मेले में जाने निकले। उस मेले में काफी मजेदार बातें थी, जैसे की ऊँचे ऊँचे झूले, गोल घूमनेवाले चक़्कर, तरह तरह की मिठाइयाँ, खिलौने, और भी कई चीज़ें थीं। वे दोनों मजे से बाते करते मेले को जा रहे थे। अचानक सामने से एक नर बत्तख आया और उनसे बोला, “मैं भी मेले आना चाहता हूँ, लेकिन मुझे रास्ता पता नहीं। क्या तुम मुझे ले चलोगे?” खरगोश उसे देखकर कहने लगा, “तुम कितने गंदे हो, कीचड़ से सने। मेरा ड्रेस देखो कैसा सफ़ेद है, तुम हमारे साथ मत आना”, और चूहा बोला, “अरे हम दोनों देखो कितने तेज चलते हैं,  तुम तो ठीक से चल भी नहीं सकते। हम तुम्हे नहीं ले जायेंगे”। बेचारा बत्तख नाराज हो गया। लेकिन उसने हिम्म्त नहीं हारी, वह धीरे धीरे अपनी चाल चलते उनके पीछे जाने लगा।

कुछ देर बाद एक छोटा सा पानी का झरना आया। खरगोश और चूहा वहीं रुक गये क्योंकि उन दोनों को तैरना नहीं आता था। और मेला जाने के लिए उस झरने को पार करना जरुरी था। दोनों चिंतित होकर किनारे पर बैठ गये। तभी धीरे धीरे चलकर बत्तख वहाँ पहुंच गया। उसने देखा खरगोश और चूहा दोनों किनारे पर रोती सूरत लेकर बैठे थे। जब उसे वजह का पता चला, तब वह आसपास से एक लकड़ी का फट्टा लाया और वहीं पड़ी एक रस्सी उसे बांध दी। फिर खरगोश और चूहे से कहा, “कोई बात नहीं दोस्तों, मुझे तैरना आता है और मैं तुम दोनों को इस तराफे पर बैठकर, उसे खींचकर उस पार ले जाऊंगा”। उसने दोनों को तराफे पर बिठाया और रस्सी को मुँह मे पकड़कर, तैर कर दूसरे किनारे ले गया। फिर वे तीनों साथ मिलकर मेला पहुंचे और उन्होंने खूब मजे किये। वापस आते वक्त खरगोश और चूहा, बत्तख से बोले, “दोस्त, हमें माफ़ कर देना। हमने तुम्हे बुरा भला कहा, लेकिन अब हम समझ गए की हर दोस्त जरुरी होता है”। बत्तख ने भी उनको माफ़ कर दिया और कहाँ, “हाँ, सही है, हर दोस्त जरुरी होता है”।

शब्दार्थ

  • (कीचड़ में) सने – (कीचड़ से) लथपथ
  • लकड़ी का फट्टा – लकड़ी को चीरकर निकाला हुआ छोटा तख्ता
हर दोस्त जरुरी होता है
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