First published in November 2016


वर्ष के इस समय में दिल्ली के आसपास घूमने और रहने वाले लोगों ने इस ऊँचे और मजबूत सेमल के पेड़ को ज़रूर देखा होगा, जो ‘कॉटन सिल्क’ के नाम से भी जाना जाता है। बिना पत्तों के सिर्फ चमकदार फूल पेड़ में बहुत अधिक संख्या में खिल उठते हैं और अपनी इसी अनूठी विशेषता की वजह से किसी का भी ध्यान खींचने में सक्षम हैं।

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पेड़ की महत्ता और भी बढ़ जाती है क्योंकि यह अपने फूलों की आधी संख्या को ज़मीन पर बरसा देता है, जो जंगली जानवरों के लिए उत्तम दावत भी हैं।

पाँच चमकीली नारंगी रेशमी पंखुड़ियाँ हरे रंग के तीन बड़े पत्रक ताज में रखी हुई हैं और इसके अन्दर विपुल संख्या में काले सिर वाले पीले-गुलाबी रंग के परागकोष हैं।

जनवरी महीने में पेड़ की पतियाँ गिरने लगती हैं, फरवरी में पेड़ पूरी तरह से खाली हो जाते हैं और मार्च में फूल आना शुरू हो जाते हैं।

नारंगी रंग लाल और पीले रंग के मेल से बनता है, जो लाल रंग की आलिशानता और पीले रंग की खुशियाँ फैलाने का काम का वर्णन करता है, और सभी को कार्य करने के लिए उत्साहित करता है।

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अन्य पेड़ों की तरह इसमें भी कई औषधीय गुण हैं और इसके अलग-अलग हिस्सों का उपयोग पेट संबंधी विकारों के उपचार में किया जाता है। इसके अलावा यह एक शक्तिवर्धक के रूप में भी काम करता है।

फूल का हरा ताज एक व्यंजन बनाने के काम में उपयोग होता है जो बहुत स्वादिष्ट होता है और एक दवा के रूप में भी काम करता है।

फूलों का मौसम समाप्त होते समय, एक बड़ा बीजकोष खुल जाता है और हवा में नरम और हलके रेशमी तंतु फ़ैल जाते हैं जो हवा के साथ दूर-दूर की यात्रा करते हैं। लोग इन रेशमी तंतुओं को तकिए बनाने के लिए एकत्रित कर लेते हैं।

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