Post Series: सिंहासन बत्तीसी

सिंहासन बत्तीसी के अगले भाग में राजा विक्रमादित्य के त्याग और परोपकार के बारे में जानिए।


उन्नीसवें दिन स्वयं को भाग्य के भरोसे छोड़, राजा भोज पुनः चमत्कारी सिंहासन की ओर बढ़े। उन्होनें सोच लिया था कि आज वे अवश्य ही सिंहासन पर बैठेंगे। उन्होनें सिंहासन की ओर कदम बढ़ाए, तभी सिंहासन से प्रकट होकर पुतली मदनमोहिनी खिलखिलाती हुई बोली, “राजा भोज! मैं तुम्हारे साहस की प्रशंसा करती हूँ और कामना करती हूँ कि तुम इस सिंहासन पर बैठ सको। किन्तु ऐसा तब तक नहीं हो सकता जब तक तुममें राजा विक्रमादित्य जैसा एक भी गुण नहीं हो।  ठहरो! मैं तुम्हें विक्रमादित्य की एक कथा सुनाती हूँ”।

यह कहकर पुतली ने कथा सुनानी आरंभ की।

“रात्रि का दूसरा पहर था। सारा नगर गहन निद्रा में डूबा हुआ था। तभी राजा विक्रमादित्य को एक स्त्री के रोने की आवाज सुनाई दी। राजा तुरंत जाग उठे और तलवार लेकर आवाज की दिशा मे चल पड़े। थोड़ी ही दूर पहुँचकर राजा ने देखा कि एक शव के पास एक स्त्री बैठी रो रही है।

राजा शीघ्र ही स्त्री के पास पहुँच कर बोले, “देवी, तुम कौन हो? यह शव किसका है? मैं यहाँ का राजा विक्रमादित्य हूँ। निडर होकर सारी बात कहो”।

सिंहासन बत्तीसी - कहानी पुतली मदनमोहिनी कीस्त्री रोते हुए बोली, “महाराज! यह शव मेरे पिताजी का है। मैं और मेरे पिताजी दोनों पास के नगर से आपके नगर के दर्शन के लिए आए थे किन्तु मार्ग में पिताजी की मृत्यु हो गयी। अब मैं क्या करूँ? कहाँ जाऊँ?”

राजा बोले, “धैर्य धारण करो बहन! होनी को कौन टाल सकता है। मैं तुम्हारे पिताजी को जीवित तो नहीं कर सकता लेकिन एक भाई की तरह तुम्हारी सहायता तो कर ही सकता हूँ। मैं तुम्हें किसी प्रकार का कष्ट न होने दूँगा”।

तब स्त्री बोली, “वह सब तो ठीक है। किन्तु यदि आप इस शव को नदी के तट तक पहुंचा दें तो पिताजी की अंतिम इच्छा पूर्ण हो सकेगी और उनका अंतिम संस्कार हो सकेगा”।

स्त्री की बात सुनकर राजा बोले “आओ बहन! मैं पिताजी के शव को नदी के तट पर ले चलता हूँ”।

ऐसा कहते हुए राजा नें ज्यों ही शव को उठाना चाहा शव के भीतर से कुछ अटपटी तंत्र-मंत्र की सी आवाजें आने लगीं। तब राजा नें स्त्री से पूंछा, “सच-सच बताओ यह सब क्या है ? तुम कौन हो और क्या चाहती हो?”

स्त्री हाथ जोड़कर बोली, “महाराज मैं जादू नगर की राजकुमारी हूँ। मैं बहुत सा जादू जानती हूँ। यह धरती पर पड़ा व्यक्ति मेरा एक शत्रु है जिसे मैंने थोड़ी देर के लिए मूर्छित कर दिया है, यह होश में आते ही मुझे मार डालेगा। इसे मारने के लिए मुझे आपकी सहायता की आवश्यकता है। यदि आप मुझे अपना रक्त दे सकें तो मैं आपकी सदैव ऋणी रहूँगी”।

स्त्री की बात पर भरोसा करने से पहले राजा ने बेतालों का स्मरण किया। बेताल तुरंत राजा की सेवा में उपस्थित हो गए। राजा ने बेतालों से जादूगरनी के बारे में पूछा तो वे बोले, “महाराज यह स्त्री सच कह रही है। यदि आप इसकी सहायता कर सकें तो अवश्य कीजिये क्योंकि यदि इसका यह शत्रु जीवित रहा तो यह आपका भी शत्रु बन जाएगा”।

राजा बोले, “मैं तुम्हारी सहायता के लिए तैयार हूँ”।

यह कहते हुए राजा ने अपनी बाईं हथेली तलवार से चीर डाली। उसमें से खून की धार बह निकली। जादूगरनी ने बीस बार राजा का रक्त अपनी अंजलि में भरकर शत्रु के शरीर पर छिड़का, इक्कीसवीं बार रक्त की बूंदे पड़ते ही वह अदृश्य हो गया।

उसके अदृश्य होने पर वह स्त्री प्रसन्न होकर बोली, “हमारा शत्रु समाप्त हो गया राजन! कहें आपको क्या चाहिए”।

यह कहते हुए जादूगरनी नें राजा की हथेली पर एक फूँक मारी तो हथेली से रक्त का बहना बंद हो गया मानो कुछ हुआ ही न हो।

स्त्री की बात पर राजा बोले, “एक मनुष्य होने के नाते मैंने तो अपने कर्तव्य का पालन किया है, मुझे इसके बदले में कुछ नहीं चाहिए”।

जादूगरनी बोली, “आप महान हैं राजा, किन्तु मैं आपको खाली हाथ न जाने दूँगी”।

यह कहते हुए उसने अपना हाथ हवा में लहराया। हाथ हिलाते ही उसके हाथ में एक सोने का थाल आ गया जिसपर एक सुनहरा कपड़ा ढका हुआ था।

Singhasan bateesi - Kahani putli Madanmohini ki

जादूगरनी नें वह थाल राजा को देते हुए कहा, “यह लीजिये राजन! इस थाल से आप जब भी कपड़ा हटाएँगे यह आपको मन पसंद भोजन से भरा मिलेगा”।

राजा बोले, “मुझे सदैव ये चिंता रहती है कि मेरी प्रजा को कभी अन्न की कमी न हो। इस थाल से मेरी प्रजा को उनकी इच्छानुसार भोजन मिल सकेगा”।

यह कहकर राजा खुशी–खुशी महल की ओर चल दिये। मार्ग में राजा को एक साधु मिला। वह राजा से बोला, “राजन! मुझे बड़ी भूख लगी है। क्या आप मेरे भोजन की कुछ व्यवस्था कर सकते हैं?”

राजा ने तुरंत स्वर्ण-थाल से कपड़ा हटाकर साधु को स्वादिष्ट भोजन प्रस्तुत कर दिया। साधु भोजन करके तृप्त हो गया।

वह राजा को बहुत सारा आशीर्वाद देते हुए बोला, “राजन! यदि यह स्वर्ण-थाल मुझे मिल जाये तो मुझे किसी के आगे हाथ फैलाने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी”।

राजा ने साधु की इच्छा जानकर वह स्वर्ण-थाल उसे दे दिया और स्वयं खाली हाथ प्रसन्नचित्त होकर महल में लौट आए।

यह कथा सुनाकर पुतली बोली, “सुना तुमने राजा भोज! ऐसे परोपकारी और त्यागी थे हमारे राजा विक्रमादित्य”। यह कहकर पुतली अदृश्य हो गयी।

राजा भोज ने मन ही मन विक्रमादित्य के त्याग और परोपकार की बात स्वीकार कर ली। उस दिन भी वह निराश होकर अपने महल को लौट गए।

शब्दार्थ:

  • मूर्छित – बेहोश
  • ऋणी – कर्ज़दार
  • अंजलि – हाथ

नैतिक मूल्य:

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