First published in January 2017 edition


एक नगर में एक सेठ रहता था। वह बहुत धनवान था। उनके पास किसी चीज की कमी नहीं थी। उसके चार बेटे थे। चारों के चारों रूपवान और समझदार थे।

एक दिन उसने दूर दराज की सोच कर अपनी बड़ी बहू से पूछा, “बहू यह बताओ कि कौन से दिन सबसे अच्छे होते हैं?” बहू ने कहा, “पिताजी सबसे अच्छे दिन गरमी के होते हैं। न कहीं कीचड़ होता है और न कंपकपाने वाली सर्दी। गरीब–अमीर सभी के लिए सुखदाई। गरीबों को कपड़ों की चिंता नहीं होती, वे बेमौत नहीं मरते। खुला–खुला माहौल सबको अच्छा लगता है। ठंडी–ठंडी कुल्फी, बर्फ का गोला, तरह–तरह की लस्सी, मन भावन शर्बत किसको अच्छे नहीं लगते। फल भी कितने अच्छे कि नाम लेते ही मुंह में पानी आ जाए। इस समय मिलने वाला आम तो फलों का राजा कहलाता है। तरबूज और खरबूजों का तो क्या कहना! लंबी, पतली ककड़ी तो सबको जकड़ ही लेती है। ठंडा खीरा भला किसको नहीं भाएगा! न किसी को घर टपकने की चिंता न घर में पानी भरने की। गरीब–अमीर सभी सुखी। अब आप ही बताइए…हुए न सबसे अच्छे दिन”।

सेठ ने विचार करते हुए कहा, “तुम्हारी बात ठीक है…लेकिन तुम हर साल देखती हो कि गर्मी में कितनी बीमारियाँ फैलती हैं, कितने ही लोग लू लगने से असमय ही काल के गाल में समा जाते हैं। मच्छर, मक्खी के बढ़ जाने से तरह–तरह की भयानक बीमारियाँ फैलती हैं जिससे बच्चे बीमार पड़ते हैं। पानी की किल्लत हर जगह हो जाती है। चारों ओर गर्मी से त्राहि माम-त्राहि माम मची होती है। पेड़ पौधे सूख जाते हैं, हरियाली के लिए आँखें तरस जाती हैं। मनुष्य तो क्या, पशु–पक्षी भी परेशान हो जाते हैं। अब तुम्हीं बताओ ये दिन अच्छे दिन कैसे हो सकते हैं”?

बहू को सेठ जी की बात भी उचित लगी। उसने सहमति में सिर हिलाया और सिर झुका लिया।

sabse acche din

सेठ के चेहरे पर असंतोष नजर आया, उसने उससे छोटे बेटे की बहू से यही प्रश्न पूछा। उसने कहा, “सर्दी के दिन सबसे अच्छे होते हैं…क्योंकि तब न लू चलती है और न तपन होती है, न उमस होती है और न सीलन, न उससे उपजी दुर्गंध। शीतल, मंद सुगंध पवन सबके मन को भाती है, चारों ओर खुशनुमा माहौल होता है। सेहत के लिए भी ये मौसम बहुत अनुकूल होता है। इस समय भरपूर स्वास्थ्य वर्धक सब्जियाँ होती हैं। सेब, अंगूर, अंजीर, पपीते, चीकू, चेरी आदि फल सब के मन को भाते हैं। गरम कपड़े पहन कर सभी इस मौसम का मजा ले सकते हैं। थोड़ी सावधानी और भरपूर मजा…यही तो सब चाहते हैं। मेरी समझ से ये दिन ही सबसे अच्छे होते हैं”।

सेठ जी बहू के विचारों से सहमत नहीं दिखे। उन्होने कहा, “बहू प्रति वर्ष कितने ही लोग सर्दी और ठिठुरन से मर जाते हैं। गरीबों का जीवन मुश्किल हो जाता है। बिना कपड़ों के ठंड से ठिठुरते हुए समय निकालते हैं। कटते वनो से लकड़ी की कमी हो गई है जिससे अलाव जलाना भी मुश्किल हो गया है। ऐसे हालातों में जीना बहुत ही दुरूह है”।

सेठ जी की आँखों में निराशा उतार आई। उन्हों ने तीसरे बेटे की बहू की ओर आशा से देखा। तीसरी बहू ने कहा, “पिताजी सबसे अच्छे दिन बरसात के होते हैं क्योंकि वर्षा से वातावरण का रूप ही बदल जाता है, पेड़–पौधों में नई जान आ जाती है। चारों ओर हरियाली छा जाती है। काले–काले बादल मन को मोह लेते हैं। भीषण गर्मी से निजात मिल जाती है। प्यासी धरती की प्यास बुझती है। किसानों के लिए तो ये वरदान है, उनके चेहरों पर चमक आ जाती है। खेती का कार्य शुरू हो जाता है। वर्षा नहीं होगी तो अन्न भी कैसे पैदा होगा, बिना अन्न के तो जीवन भी संभव नहीं। अन्न तो सबसे बड़ा देवता है। हम सब के जीवन का आधार है। मेरी राय में तो ये ही सबसे अच्छे दिन हैं”।

सेठ जी ने कहा, “तुम्हारी बात तो सही है लेकिन बाढ़ की विभीषिका से क्या तुम परिचित नहीं हो? हर साल कितना नुकसान होता है इससे, जन हानि और धन हानि सभी का। तुम इन्हे सबसे अच्छे दिन कैसे कह सकती हो!”

सेठ जी ने यही प्रश्न सबसे छोटी बहू से भी पूछा। छोटी बहू बोली, “पिताजी सब दिन अच्छे होते हैं। सभी ऋतुओं का अपना–अपना महत्व होता है। इनकी खूबसूरती एक–दूसरे की वजह से ही है। यदि गर्मी न होती तो सर्दी अच्छी न लगती, यदि सर्दी न हो तो गर्मी भी अच्छी न लगती। पावस ऋतु का महत्व तो इन दोनों की वजह से ही बढ़ जाता है। हर दिन अच्छा है क्योंकि ये एक दूसरे से जुड़े हैं, पर सबसे अच्छा दिन वह है जिस दिन कोई शुभ कार्य किया जाए। शुभ कार्य से अभिप्राय शादी या किसी मांगलिक कार्य से नहीं है, बल्कि किसी मानवीय भावना से किए गए कार्य से है जैसे – किसी की मदद करना। किसी जरूरत मंद की सहायता करना, किसी गरीब को आत्म निर्भर बनाना, गरीब बच्चों को शिक्षित करना, किसी को भी दुख न पहुंचाना न मानसिक न शारीरिक, किसी के अधिकारों का हनन न करना। ऐसे कार्य जिनसे मन को शांति मिले, सुकून मिले जो अपने लिए न होकर मानव कल्याण के लिए हो, दूसरों के हित के लिए हो। अपने लिए तो सभी जीते हैं, जो दूसरों के लिए जिए वही सही अर्थों में सच्चा मानव होता है। हमारे पूर्वजों ने हमेशा सिखाया “जियो और जीने दो”। प्रत्येक प्राणी को जीने का अधिकार है, इसमें किसी को बाधा नहीं डालनी चाहिए। यदि कोई दूसरे के जीवन को असुरक्षित और असहज बनाता है तो समर्थ व्यक्तियों को इसका विरोध करना चाहिए। बुरे कार्यों का विरोध होना उतना ही आवश्यक है जितना अच्छे कार्यों की प्रशंसा करना। यदि सभी ऐसा करेंगे तो बुरे व्यक्ति भी गलत कार्य करने से घबराएँगे, डरेंगे। इससे एक अच्छे समाज के निर्माण में सहायता मिलेगी। ये ऐसे कार्य हैं जिन्हें करके हर दिन को शुभ बनाया जा सकता है। हर दिन अच्छा दिन है, हर पल शुभ है। कल्याण की भावना से किया गया हर कार्य शुभ ही होगा”।

सेठ जी को छोटी बहू के उत्तर से बहुत प्रसन्नता हुई। उन्होंने छोटी बहू को ही घर संभालने का उत्तरदायित्व देने का निश्चय किया।

शब्द – अर्थ

  • कल्याण – भलाई
  • अभिप्राय – मतलब
  • विभीषिका – भयानकता
सबसे अच्छे दिन
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