First published in September 2017 edition

स्कूल से वापस आते हुए संभव बहुत खुश था। उसका मनपसंद टीवी सीरियल जो आना था आज। संभव को टीवी देखना बहुत पसंद था। इतना अधिक कि उसके सामने उसे न कुछ और करना अच्छा लगता था न ही किसी से बात करना। यहाँ तक की घर में सब उसे बुलाते रहते परन्तु वो “अभी थोड़ी देर में” कहकर टाल देता। यहाँ तक की वो अपने दोस्तों के साथ खेलने भी नहीं जाता।

संभव पढ़ने में बहुत होशियार था। जो भी स्कूल में पढ़ाया जाता, वो सब वह जल्दी ही याद भी कर लेता। पढ़ाई या होम वर्क में कभी किसी से पीछे नहीं रहता था इसलिए उसके पापा मम्मी उसे डांटते भी नहीं थे।

जब संभव घर पहुंचा तो देखा घर पर मेहमान आये हुए हैं। उसकी मम्मी ने बताया कि वो पापा के कॉलेज के दोस्त हैं। लखनऊ से आये हैं वो लोग। संभव ने सबसे नमस्ते की और अपने कमरे में चला गया। अपना स्कूल बैग बिस्तर पर ही छोड़ा और सीधा लॉबी में आकर टीवी खोल लिया। उसका मनपसंद कार्टून सीरियल जो आना था।

Sabak mila

मम्मी ने आवाज़ दी, “संभव, यहाँ आकर मेरी मदद करो”।

आदतन संभव ने बोल दिया, “अभी थोड़ी देर में करता हूँ”।

मम्मी ने गुस्सा भी किया फिर भी संभव पर कोई असर न हुआ। आखिरकार मम्मी ने सब काम अकेले किये। मेहमान के जाने के बाद पापा ने उसे बहुत डांटा।

रविवार को दोनों ने संभव को सबक सीखाने का सोचा। वो दोनों उसे बिना बताये टीवी देखते हुए छोड़कर बाजार चले गए। थोड़ी देर बाद संभव ने देखा घर पर कोई नहीं है, तो बहुत रोया। कहने लगा, “मम्मी, अब मैं आपकी सब बात मानूँगा। आप आ जाओ, मुझे डर लग रहा है”।

तभी दरवाजे के पीछे से मम्मी पापा आ गए, वो कहीं नहीं गए थे। मगर संभव अब सुधर गया था।

शब्दार्थ:

  • मनपसंद – मन को भाने वाला
  • आदतन – आदत के अनुसार
सबक मिला
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