“अरे! सुमित तुम कहाँ चले गए थे यार! मैं तो तुम्हारे बिना परेशान हो गया था”, अरुण ने सुमित को कक्षा में बैठा देख कर चहकते हुए कहा।

    “अब तो तुम्हें मेरी अहमियत पता चली”, सुमित ने उसे गले लगाते हुए कहा।

    “हाँ भाई हाँ, तुम्हारे बिना तो मुझे अपना स्कूल भी वीरान लगता है”।

    “कुछ ज्यादा ही नहीं हो गया”, सुमित ने चुटकी ली और दोनों ज़ोर से हँस पड़े।

    “अब जल्दी बता न! तुम कहाँ गए थे, कल क्यों नहीं आए?”

    “यार! इस सप्ताहांत पर मम्मी–पापा ने अमृतसर जाने का प्रोग्राम बना लिया था, बस हम सब वहीं चले गए थे। मैंने बस कल की ही तो छुट्टी मारी है और तुम एक दिन में ही परेशान हो गए”।

    “क्या–क्या देखा? मुझे फोटो भी दिखा। अभी तो घंटी बजने में देर है”।

    “क्या देखा यह बताता हूँ, फोटो घर आकर देखना या मैं ई मेल पर भेज दूँगा”।

    “हाँ, यह ठीक रहेगा”।

    “मैंने वगह बॉर्डर देखा, गोल्डन टेम्पल देखा। इसे हर्मिन्दर साहब भी कहते हैं। और जंलिया वाला बाग देखा, इसमें देखा शहीदी कुआं”।

    “यह शहीदी कुआं क्या है? मैंने तो अंधेरा कुआं, गहरा कुआं, खारा कुआं, धौला कुआं सुना है…ये शहीदी कुआं क्या बला है?” अरुण ने पूछा।  

    “यह सचमुच एक भयंकर बला थी जो हमारे देश वासियों ने भुगती। इसकी दास्तां से आँखों में आँसू आते हैं और कलेजे में उबाल!”

    सुमित का तमतमाया चेहरा देख कर अरुण भी गंभीर हो गया और उसने धीरे से पूछा, “आखिर हुआ क्या?”

    “तुमने सुना होगा की जनरल डायर ने हमारे निहत्थे लोगों पर बगैर चेतावनी दिए गोलियां चलवा दी थीं। गोलियां ही नहीं चलवाईं, बल्कि उसने इस घटना में टैंकों का भी प्रयोग किया था। ऑटोमैटिक मशीन गनों का प्रयोग किया था। ऑटोमैटिक मशीन गनों से बेशुमार गोलियां चलवाई थीं जिसकी क्रूरता के निशान आज भी वहाँ की दीवारों और पेड़ों पर देखे जा सकते है। सैकड़ों की संख्या में लोग हताहत हुए। बच्चे, बूढ़े जवान, स्त्री–पुरुष, किसी को भी नहीं छोड़ा गया। औरतों ने अपनी आबरू और सम्मान के लिए इस कुएं में छलांग लगा दी। देखते ही देखते यह कुआं लाशों से पट गया था। कहते हैं इसमें जितनी लाशें समा सकती थीं उससे ज्यादा इसमें थीं। लगभग डेढ़ सौ लाशें इसमें से निकाली गईं थीं। जनरल डायर ने अपनी बहदुरी का परचम लहराते हुए निहत्थे नागरिकों को गोलियों से भून दिया था। ये सब लोग ‘रोलट एक्ट’ के विरोध में यहाँ एकत्र हुए थे और उसका विरोध करने के लिए विचार–विमर्श करने वाले थे।

    इस कुएं को उसी अवस्था में चारों ओर से दीवार उठा कर सुरक्षित कर दिया गया है। बीच–बीच में अंदर देखने के लिए खाली जगह छोड़ दी गई है। एक गुंबद नुमा इमारत बना कर उसे इतिहास की क्रूरतम घटना को आगे आने वाली पीड़ियों के लिए सुरक्षित किया गया है। इस बाग में एक स्मारक भी बनाया गया है जिस पर इस घटना में शहीद हुए लोगों के नाम अंकित हैं। यह सुंदर, रमणीक पेड़ों से भरा हुआ दर्द से कराहता स्थान है। यहाँ पर उस समय के वृक्ष आज भी मौजूद हैं लेकिन हमारे नासमझ भाई-बहनों ने इन वृक्षों और उनकी शाखाओं पर अपने नाम लिखे हैं, दिल खरोंच कर बनाए हैं और तरह–तरह से अपने संदेश लिखे हैं। इन हरकतों को देख कर बहुत दुख हुआ। ऐसी वेदना मयी घटना वाली जगह पर प्रेम गाथा लिखना अच्छा नहीं लगा। सभी लोगों को इसका विरोध ही नहीं भर्त्सना भी करनी चाहिए। जिससे अपनी धरोहरों को साफ और सम्मानित ढंग से रखा जा सके। पर्यावरण और वृक्षों को साफ–सुथरा और सुंदर बनाया जा सके। आज भी इन वृक्षों पर और दीवारों पर उस बर्बरता के चिह्न अंकित हैं”।

Shaheedi kuan

    “जनरल डायर ने ऐसा क्यों किया? उसका विरोध हम लोगों ने कैसे किया?” अरुण ने पूछा।  

    “जनरल डायर ने अपने आप को ब्रिटिश हुकूमत की वफादारी सिद्ध करने के लिए ऐसा घृणित कदम उठाया। अँग्रेजी हुकूमत ने उसे वापस इंगलैंड बुला लिया और उसके इस कार्य के लिए उसकी पीठ थपथपाई। भारत में इसका बहुत विरोध हुआ, लेकिन गुलाम देश की कौन सुनता है! हम लोग गुलाम थे और उनकी हर हरकत मानने के लिए मजबूर थे, चाहे वह काले पानी की अमानवीय सजा हो या जलियाँ वाले बाग का नर संहार हो। हमारे लोगों की सहनशीलता और दृढ़ इच्छा शक्ति की ये कठिन परीक्षा थी।

    वीर ऊधम सिंह ने यह कसम खाई कि वह जनरल डायर को जिंदा नहीं छोड़ेगा। उसने इसके लिए प्रयत्न करना शुरू किया। वह इंगलैंड वकालत पढ़ने गया। वकालत पढ़ना तो एक जरिया था जिससे वह इंगलैंड जा सके। वहाँ वकालत के साथ-साथ वह अपने देश को स्वतंत्र कराने के लिए भारतियों को संगठित करता और उनसे देश को स्वतंत्र करने की अपील करता। कई क्रांतिकारी इस कार्य में जुट गए। ऊधम सिंह अपने मिशन को ध्यान में रख कर कार्य कर रहा था। एक दिन वह दिन भी आया जिसके लिए वह पूरी तरह समर्पित था। अपनी पूर्ण तैयारी के साथ इस कार्य को अंजाम देने वाला था। उसने पता किया कि डायर किस–किस रास्ते से कब–कब गुजरता है। सिर पर कफन बांध कर वह निकला क्योंकि निहत्थे भारतियों की मौत का बदला उसने लेना था। ठीक समय पर उसने जनरल डायर पर गोली चलाई, उसकी मौत हो गई। ऊधम सिंह को पकड़ा गया और सजाए मौत की सजा दी गई।

    दुर्भाग्य था हमारा कि वह जनरल डायर नहीं था बल्कि डायर नाम का अन्य कोई व्यक्ति था। वीर ऊधम सिंह ने अपने बलिदान से लोगों में स्वतंत्रता के लिए वह आग लगाई कि हमने अंग्रेजों को बाहर का रास्ता दिखाया। हमारे क्रांतिकारियों और बलिदानियों की शहादत व्यर्थ नहीं गई। हमने स्वतंत्रता हासिल की और आज हम सभी उन स्थानों को, उन वीरों को नमन करते हैं जिन्हों ने अपने बलिदान से हमें यह दिन दिखाया।

    हम उनके बलिदान को, कर्म को, त्याग को हमेशा याद रखेंगे। और याद रखेंगे अंग्रेजों के बर्बरता पूर्ण कार्यों को भी, जो हमें स्वतन्त्रता के महत्व को हमेशा याद रखने की प्रेरणा देंगी”।

शब्दार्थ:

  • शहादत – बलिदान
  • क्रूरतम – निर्दयतापूर्ण
  • रमणीक – सौन्दर्य मयी, मन भावन
शहीदी कुआं
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