मधुरिमा के सरल समाधानों ने उसे एक वास्तविक परी का रूप दिया।


मधुरिमा १३ वर्ष की आठवीं कक्षा से उत्तीर्ण हुई। वह विद्यालय आठवीं स्तर तक ही था। अतः आठवीं के बाद सभी विद्यार्थी अपने अनुसार अलग-अलग विद्यालयों में प्रवेश ले लेते थे। मधुरिमा अनाथ आश्रम में रहती थी। वो ३ साल की थी जब एक दुर्घटना में माता-पिता की मृत्यु हो गई थी। सामान्य वर्ग के रिश्तेदारों ने शोक अफ़सोस तो प्रकट किया किन्तु लड़की को साथ रखने की ज़िम्मेद्दारी नहीं ली। अतः उसे अनाथ आश्रम में भेंट कर दिया।

अनाथ आश्रम लम्बे समय से चल रहा था। सभी निष्कपट खरे व्यक्तियों द्वारा चल रहा था। महिला और पुरुष दोनों पूरी देखभाल करने के लिए हफ्ते में एक बार मिल कर संगम-मिलन कार्यक्रम करते थे। सभी अपने कार्यो में व्यस्त होने के कारण इतवार को बैठक रखते थे। साथ ही सभी बच्चों से बातचीत कर उनकी समस्याओं का समाधान भी करते थे।

सभी बच्चे सरकारी विद्यालयों में पढ़ते थे, लेकिन सभी बच्चों की अलग-अलग कमज़ोरी के निवारण हेतु अध्यापकों की व्यवस्था भी कर रखी थी।

मधुरिमा शांत, खुश मिज़ाज़, पढ़ने में रूचि एवं कौशलपूर्ण थी। सबसे बड़ी कुशलता थी – वो बेहद परेशान, अनिवाणित समाधानों का निवारण बड़ी सरलता से देती थी।

सभी सदस्यों ने बैठक में विचार व्यक्त किया कि मधुरिमा को उसकी इच्छा के अनुसार पढ़ाई मार्ग पर आगे बढ़ा कर सक्षम बनाएंगे।

चिकित्सक सदस्य बोले, “हम इसे चिकित्सक बना सकते है”। इसी प्रकार इंजीनियर ने विज्ञान एवं तकनीकी मार्ग की सलाह दी। व्यापारियों ने व्यापार हेतु ज्ञान देने की बात कही।

एक सदस्य ने कहा, “अभी दसवीं तक तो सारे विषय पढ़ने हैं। अतः ११वीं कक्षा के बाद मधुरिमा किस मार्ग को चुनेंगी, तब निर्धारित कर लेंगे”।

मधुरिमा ने दसवीं का इम्तिहान दिया।

अब लम्बी छुट्टी का समय था। सभी सदस्यों ने बैठक आयोजित की। सबसे पहले मधुरिमा को ही बुलाया। पूछा – भविष्य हेतु तुम्हारा क्या विचार है?

मधुरिमा हलके से मुस्कुरा कर बोली, “आदरणीय, भविष्य से पहले वर्तमान पर विचार करना चाहिए”।

सभी ने चौंक कर अलग-अलग तरह से कहा, “हैं? बताओ बिटिया, वर्तमान में तुम्हे क्या कमी लग रही है? किस चीज़ में सुधार चाहिए? पढ़ाई, खाना-पीना, व्यवस्थित तरह से रहना, सब ही तो ठीक है? वर्तमान के लिए क्या चाहिए?”

मधुरिमा ने कहा, “आदरणीय, सभी चीजों की आप लोगों ने उच्चत्तम व्यवस्था कर रखी है। लेकिन सभी बच्चों को संस्कार देने का आयोजन भी होना चाहिए। आप यहाँ का नियम बनाइये कि सभी नियम से जल्दी करीब ७ बजे खाना खा कर ९ बजे सोएँ। नियम से प्रातः जल्दी ५ बजे उठें, खुले में योग साधना करें। प्रातः ऑक्सीजन से भरपूर शुद्ध वातावरण और सूर्य की किरणें ऊर्जावान बनाती हैं। सबसे पहले स्वस्थ जीवन के मार्ग का परिचय नियम बनाये।

अनाथाश्रम में लोग परोपकार हेतु, दान-धर्म हेतु पूरी-कचौरी, मात्र आलू की चटपटी सब्ज़ी, लड्डू, इत्यादि लाते हैं। आप उन्हें भी बताये – क्या आप अपने बच्चों को रोज़ यही खिलाते है? ऐसे भोज से सेहत कैसे अच्छी रहेगी?

वास्तविक परीआप आदरणीय चिकित्सक मुफ्त में दवाइयां दे देते हैं। जबकि दवाइयों की नहीं, हरे-भरे फल-सब्ज़ी वाले अच्छे भोजन की आवश्यकता है। यदि कोई वास्तव में सेवा, मदद, आदि हेतु आपसे संपर्क करे, तो आप उनको पौष्टिक भोजन के लिए ही कहें। किसी के लिए किया गया छोटा सा काम उसके जीवन में बहुत बड़ा बदलाव लाता है। उनके लिए उससे बड़ा काम नहीं।

साथ ही आप लोगों की मेरे प्रति रूचि के कारण कुछ साथी ईर्ष्या भी करते है। आप उन्हें बताये कि किसी से भी ईर्ष्या नहीं करनी चाहिए, ना अपने को संकोची अनुभव करे। ना निष्काम के लिए कोई होड़ रखे। सबका अपना जीवन है, अपनी मंज़िल, अपनी दौड़। तभी सब अच्छे साथी बनेंगे। धन्यवाद”।

सभी ने बेहद सराहना की और कहा, “मधुरिमा, तुम बेहद उत्तम दिमाग की हो। धन्यवाद तो हमें देना चाहिए। जो भी तुमने बताया, बेहद सही है। हम वर्तमान को सुधारेंगे। अतः हम चाहते हैं कि तुम भविष्य मार्ग को भी चुनो”।

मधुरिमा बोली, “दीपक बोलता नहीं, प्रकाश उसका परिचय देता है। ठीक उसी प्रकार अपने बारे में कुछ ना बोले, अच्छे कर्म करते रहे, वही आपका परिचय देंगे। मेरे लिए जो भी मार्ग आप निर्धारित करेंगे मैं उसमे अकृतिम ध्यान दूँगी। अब हमारे साथी जो नाबालिग श्रेणी में आ गए हैं, उन्हें आप साफ-सफाई, बागवानी, खाना बनाने, आदि कार्यों के लिए प्रशिक्षण दीजिये। इन सब कार्यों हेतु आप लोग इतना खर्च कर रहे हैं। जबकि सब मिल कर कार्य करेंगे। साथ ही सीखने का ज्ञान भी मिलेगा। हमें पैसो से सम्बंधित ज्ञान जैसे की किस चीज़ पर कितना खर्च हो रहा है, कैसे धन बचाया जाता है, जमा करना, आदि सब आप लोग ही सिखाएँ। हम सबका ध्यान रखने का कार्य तभी वास्तविक रूप से पूर्ण होगा।

अब हमारा नियम बनाइये कि अपने छोटे साथियों को हम एक घंटा पढ़ाएँ। बालिग़ श्रेणी में हम सब आपके अनुसार बताये कार्यों को कर सकेंगे”।

एक बुज़ुर्ग सदस्या सुन कर आश्चर्य से बोली, “खूबसूरत सा एक पत किस्सा बन जाता है। जाने कब कौन ज़िंदगी का हिस्सा बन जाता है। कुछ लोग ज़िंदगी में मिलते है ऐसे जिनसे कभी ना टूटने वाला रिश्ता बन जाता है। मधुरिमा, तुम तो मेरी सबसे प्यारी बेटी हो। मैं बेटी क्यों, तुम्हे परी मानूँ। तुम्हारा शांति से व्याख्या करने का व्यवहार, तुम्हे ‘परी’ ही घोषित करने का मन कर रहा है!”

Vastavik pari

दूसरे सदस्य ने कहा, “सचमुच जीवन एक यात्रा है। इसे संतुलित तरीके से तय करें। उसे मानो तो मौज है, वरना समस्या तो रोज़ ही है। सचमुच मधुरिमा, तुमने परी की तरह बोल, हमारा दिमाग शांत और पूरी तरह से खोल दिया”।

सभी ने विचार कर अध्यक्ष जी ने कहा, “इसका सबसे उत्तम तरीका है। मधुरिमा का नाम ‘अप्सरा’ रख देते हैं। अप्सरा परियों की श्रेणी में भी उच्चत्तम स्तर की है”।

सभी ने तालियाँ बजाई। मधुरिमा को परी के रूप में अप्सरा घोषित कर दिया।

शब्दार्थ: 

  • अधिवेशन – सम्मलेन
  • सच्चऱोत्र -सत्यवादी
  • अकृत्रिम -ईमानदार

नैतिक मूल्य:

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