बाकुली गाँव पुरानी परम्परा का गाँव था। जहाँ लड़के खेती का काम करते थे और लड़कियां भी सहयोग देती थीं। लेकिन उनकी जल्दी शादी कर देते थे। गाँव के अमीर जमींदार शहरों में बस गए थे। वो सारी जमीन बटाई पर दे देते थे। इसलिए साल में एक या दो बार पैसा वसूली, किसी परेशानी या खर्चे के लिए चक्कर लगाते थे।

बाकुली गाँव का एक जमींदार, राधास्वामी और उनके बटाई सहयोगी गज्जू किसान के अच्छे सम्बंध थे। गज्जू के दो लड़के और एक लड़की थी। जमींदार ने तीनो बच्चों को पढ़ने की प्रेरणा दी, लेकिन लड़के पढ़ने में कम, खेती के काम में बहुत रूचि लेते। लेकिन गज्जू की बेटी गरिमा पढ़ने में अच्छी  होशियार निकली। वो विद्यालय में पहुँच, समय निकाल कर अखबार, पुस्तकालय की पुस्तकों के साथ साथ अपनी सारी पढ़ाई समय से पूरी कर लेती। उसकी इच्छा थी कि पढ़ लिख कर अपना जीवन बनाये। माता पिता का सहयोग मिल रहा था।

दसवीं का नतीजा आया। न सिर्फ अपने गाँव में, बल्कि पूरे जिले में उसे उच्चत्तम स्थान मिला।

लेकिन उसके अन्य परिवार वाले बोले, चलो जितना पढ़ना था पढ़ लिया, अब ब्याह की सोचो। एक बहुत ही अच्छा रिश्ता आया है, वो लड़का भी पढ़ा लिखा है। इसलिए गरिमा को अच्छा लगेगा। गज्जू और उसकी पत्नी असमंजस की स्थिति में आ गए। एक तरफ परिवार दूसरी तरफ बेटी, जिसका अभी शादी का नहीं, पढ़ने का मन था।

आखिर में राधास्वामी जमींदार ने बीच का रास्ता निकाला। वो बोले, “देखो, गरिमा बुद्धिमान है। उसे स्वयं फैसला करने दो। लेकिन वो फैसला लड़के से बात करके ही करेगी”।

गज्जू बोला, “साहब, आप तो जानते है, गाँव में तो ये संभव नहीं है”।

“क्या आज तक कोई लड़की पढ़ाई में गरिमा के स्तर तक पहुँची है? जब वह संभव है तो ये भी संभव है। इन्हें पहले बात चीत करने दो। तब फैसला लेना। जो भी हो मुझे बता देना” ,राधास्वामी कह कर चले गए।

लड़का – लड़की की बात चीत हुई। दोनों परिवार किसान स्तर के थे। अतः लड़के ने कहा, “मैं भी पढ़ा लिखा बारहवीं उत्तीर्ण हूँ। मैं अब खेती से जुड़े व्यापार में आना चाहता हूँ। तुम भी पढ़ी लिखी हो अतः मेरा काम और घर की देखभाल अच्छी तरह से कर पाओगी। इस गाँव में तो दसवीं से ऊपर पढ़ाई ही नहीं है”।

vastavik garima

वार्ता का अंत हुआ, किंतु गरिमा ने मना कर दिया। कारण था – वह सिर्फ अपने बारे में सोच और बोल रहा था, जिसे स्वार्थी कह सकते है।

आगे क्या और कैसे पढ़ाई को आगे बढ़ाना है, ये विचार चल रहा था।

एक दिन गरिमा, खेत में अपने भाई और पिता का खाना ले कर जा रही थी। तभी बीच के सुनसान स्थान से वो लड़का कूद कर निकला। उसने लपक कर गरिमा का हाथ पकड़ लिया और बोला, “तुमने शादी से मना करके मेरी इज़्ज़त खराब  दी, अब मैं तुम्हारा पीछा नहीं छोड़ूंगा। तुम्हे कोई पढ़ाई नहीं करने दूंगा। तुम्हारा भविष्य, तुम्हारी ज़िंदगी खराब कर दूंगा”।

“तुम भगवान हो या मेरी मेहनत हो जिसपर मेरा भविष्य टिका है? सच बताओ क्या तुम पढ़े लिखे हो? वास्तव में पढ़ा लिखा इंसान क्या इतनी छोटी सोच-समझ वाला होता है? क्या मैंने तुम्हे गलत परखा जो मना कर दिया? देखो ये तुम्हारा वास्तविक रूप है। सिर्फ पढ़ा लिखा कहने से कोई नहीं होता, जब तक उसकी सोच और बुद्धि नहीं खुलती वो पढ़ा लिखा नहीं बनता”, गरिमा ने आराम से कहा।

उस लड़के ने ऐसी प्रतिक्रया की उम्मीद नहीं की थी, अतः तुरंत हाथ छोड़ कर खड़ा हो गया। लेकिन उसके चहरे के भाव अहंकार उत्पीरण से ग्रस्त लग रहे थे।

घर आ कर गरिमा ने पूरी बात की चर्चा की। माता, पिता, परिवार सदस्य सभी घबरा गए। परिवार पीछे पड़ गया। अब इसकी शादी कर दो, वरना इसका भविष्य बिगड़ जाएगा। वो अहंकारी कभी ना कभी तो बदला लेगा ही।

गज्जू ने तुरंत ज़मींदार राधास्वामी को संपर्क किया।

राधास्वामी ने कहा, “गरिमा बेटी अब मेरे पास रहेगी। यहाँ आगे की पढ़ाई और सुरक्षा का पूरा प्रबंध होगा”। गरिमा ने आगे की पढ़ाई आरम्भ की। साथ ही साथ कंप्यूटर की शिक्षा भी प्राप्त की।

राधास्वामी कितने साल से शहर में रह रहे थे। उनके बच्चे आरम्भ से ही विदेश चले गए थे। उन्हें पता ही नहीं था कि कम्प्यूटर का क्या प्रयोग है। उनके जीवन में पहली बार गरिमा ने कम्प्यूटर का प्रयोग सिखाया – ऑनलाइन तरीके से चीज़े मंगाना, बुकिंग कराना, बिल जमा करना, सारा हिसाब किताब ठीक करना आदि। कितने सारे काम घर बैठे ही हो जाते – ख़ास तौर से बैंक आदि के।

गरिमा के आने से घर का माहौल ही बदल गया। उनके विदेश में रहने वाले बच्चों की शक्ल देख कर बात करने पर जमींदारिन खुशी के आंसू से गरिमा से लिपट गई। वस्तुओं एवं पैसों का उचित प्रयोग पहली बार हुआ। गरिमा उनके लिए गर्व एवं सामान की चीज़ थी। गरिमा में अहंकार का लेशमात्र भी अंश नहीं था। अतः वह दोनों को बुज़ुर्ग माता पिता तुल्य मान पूरा सम्मान देती।

गरिमा ने उच्चस्तरीय पढ़ाई कर ओहदा प्राप्त किया।

कई साल बाद गरिमा गाँव गई। उस लड़के के बारे में पता चला कि वो किसी भी मार्ग पर उन्नति नहीं कर पाया। ना आगे की पढ़ाई, ना व्यापार, ना खेती बाड़ी।

गरिमा ने उसे बुलवाया। वो नहीं आया। उसे यकीन था कि अब गरिमा को मौक़ा मिला है, इसलिए ज़लील करेगी। लेकिन पुनः संपर्क हुआ। एक उचित व्यक्ति ने कहा कि वो तुम्हारी समस्त समस्याओं का समाधान कर सकती है। उसे यकीन ही नहीं हुआ कि इतनी उच्चस्तरीय ओहदा प्राप्त उसकी सारी समस्याओं को समझने के लिए बुला रही है। वो डरा, घबराया सा आया। दोनों के बीच पूरी वार्ता हुई। गरिमा ने उसे उचित सलाह दी। कैसे खेती एवं खेती से सम्बंधित व्यापार को सफल बनाया जा सकता है। वो कई साल में सच्चे गुरु से मिल नतमस्तक हो काम सुधारने लगा। धीरे धीरे वो गरिमा द्वारा दिए दिशानिर्देश अनुसार अपने व्यापार को सफल करने लगा।

उसने हाथ जोड़ सभी के सामने नतमस्तक हो कहा, “गरिमा तुम मात्र स्त्री नहीं, देवी तुल्य हो। तुम्हारे मार्गदर्शन रूपी आशिर्वाद से मुझे पूर्ण ज्ञान और सफलता मिली है। मैं माफी के योग्य नहीं, किन्तु वचन देता हूँ कि पूरा जीवन महिलाओं के उत्थान एवं सुरक्षा में लगाऊंगा”।

शब्दार्थ

  • असमंजस – दुविधा
  • प्रतिक्रया – उत्तर
  • लेशमात्र – थोड़ा भी
वास्तविक गरिमा
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