फुलवारी ने कठिन परिसतिथियों में भी शिक्षा प्राप्त करी। उसकी लगन देखकर उसके चाहने वालों ने उसकी मदद की। 

एक सज्जन ने आकर पूछा, “एक माला कितने की है?”

फूल बेचने वाली बालिका ने पूछा, “कौनसी बाबूजी? गुलाब की, गेंदे की या मोगरे की?”

सज्जन ने कहा, “मोगरे की बता।”

बालिका बोली, “५ रुपये की है बाबूजी।”

जेब में से १० के २ नोट निकाल कर बालिका को देते हुए सज्जन ने कहा, “ला, २ दे दे।”

बालिका ने २ माला कागज़ में लपेटकर दे दी। जब पैसे देखे तो १० का नोट वापस करते हुए बोली, “बाबूजी, २ माला के १० रुपये ही होते हैं।”

सज्जन ने सहानुभूति और प्रसन्नता भरी दृष्टि से उसकी ओर देखते हुए कहा, “बेटी, रख ले। काम आयेंगे।”

कुछ चिन्तित सी होकर वह बोली, “बाबूजी, मैं भीख नहीं लेती, माफ़ करना मुझे।” थोड़ा रुककर फिर बोली, “बाबूजी अगर आप सच में मुझसे खुश हो तो मुझे आशीर्वाद दे दो। मुझे विश्वास है कि आशीर्वाद में बड़ी ताकत होती है।”

सज्जन ने १० रुपये वापस लेकर एक हाथ बालिका के सिर पर प्यार और ममता के साथ फिराते हुए कहा, “राधाकृष्ण एक दिन तुझे बहुत बड़ा बनायें।”

यह कहकर सज्जन ने माला ले प्रसन्नचित्त होकर मन्दिर की ओर कदम बढ़ा दिए।

एक स्कूल के पास यह राधाकृष्ण का मन्दिर था। मन्दिर और स्कूल के बीच में फूल बेचने के लिए यह बालिका बैठा करती थी। मन्दिर में आते-जाते लोग इसे प्यार से फुलवारी बोलते थे। ७ साल की थी तबसे फूल बेचने आती थी अपनी माँ के साथ। अब अकेली ही आती है। अब यह १६ साल की हो चुकी है।

उन सज्जन के जाने के करीब २ घन्टे बाद स्कूल की छुट्टी हुई। रोज़ की तरह उसकी सहेली शिक्षा उसके पास आई। शिक्षा बोली, “फुलवारी, वो दो पंक्तियाँ तो बोल जरा, जो तू अक्सर सुनाती रहती है।”

फुलवारी एक पुष्प की तरह मुस्कुराते हुए खुश होकर सुनाने लगी,

मेहंदी पिसकर ही रंग लाती है,

लगन सफलता को संग लाती है।”

शिक्षा भी सुनकर हमेशा की तरह खुश हो गयी। शिक्षा ने कहा, “अब बोल, आज कुछ पूछना है?”

फुलवारी बोली, “हाँ, गणित की कक्षा में से आवाज साफ़ नहीं आ रही थी जब गुरुजी वर्गमूल और वर्ग के सवाल समझा रहे थे। वो थोड़ा सा बता दे मुझे।”

शिक्षा उसे अपनी कॉपी निकालकर समझाने लगी। फुलवारी भी ध्यान से सब सुन रही थी। फिर शिक्षा चली गयी और फुलवारी घर आई। आकर माँ से बोली, “माँ, मैं दसवीं की परीक्षा देना चाहती हूँ।”

रोटी बेलते हुए माँ ने उसकी तरफ आश्चर्य और थोड़ा गुस्से से देखते हुए कहा, “बावरी हो गयी है क्या तू?”

फुलवारी ने कहा, “नहीं माँ, मैं सच में परीक्षा देना चाहती हूँ।”

माँ तवे को आँच पर से हटाकर, उसके पास आकर बैठी और प्यार से उसकी पीठ पर हाथ फेरते हुए बोली, “बेटी, अगर तेरे बापू आज जिन्दा होते तो ज़रूर हम तुझे पढ़ाते। पर…” माँ आँचल में मुँह छुपाकर रोने लगी। फुलवारी की भी आँखें भर आयीं।

फिर माँ के आँसू पोंछते हुए वो बोली, “माँ तू क्यों चिंता करती है, मैं परीक्षा की फीस के पैसे जमा कर लूँगी।”

माँ ने उसे समझाते हुए कहा, “देख फुल्लो, बात केवल फीस के पैसे की नहीं है, इसके लिए पढ़ना भी तो आना चाहिए। तुझे तो कुछ भी नहीं आता।”

फुलवारी बोली, “माँ मुझे थोड़ा बहुत तो आता है। मैं कितने साल से मन्दिर के बाहर फूल बेच रही हूँ, वहाँ स्कूल में से पढ़ाने की आवाज़ आती रहती थी। तो मैं हर साल ध्यान से पढ़ती थी, वहीं चोक से लिखकर समझ लेती थी और जो समझ में नहीं आता था वो शिक्षा से समझ लेती थी।”

माँ ने कुछ चिन्तित सी होकर कहा, “पर बेटी,…” फुलवारी बोली, “नहीं माँ, पर-वर कुछ नहीं। मुझे परीक्षा देने दे ना।” माँ ने हारकर उसे अनुमति दे दी।

अब परीक्षा नजदीक थी और फुलवारी को फीस के पैसे जमा करने थे। उसकी माँ भी उसका साथ दे रही थी। माँ देर रात तक खूब माला बनाती, और सुबह जल्दी उठकर फुलवारी घर-घर जाकर माला बेचती। फिर स्कूल के समय आकर मन्दिर के पास बेचने बैठ जाती। खूब मेहनत करके फिर एक दिन उसने अपने मन की बात शिक्षा से कही।

शिक्षा बोली, “चल मैं तुझे मेरी टीचर से मिला देती हूँ। वो किसी तरह तेरा परीक्षा में बैठना निश्चित करवा देंगी।”

शिक्षा उसे लेकर टीचर के पास गयी। फुलवारी ने टीचर के चरण छू लिए।

टीचर ने फुलवारी को ऊपर से नीचे तक देखते हुए कहा, “बेटा, दसवीं की परीक्षा इतनी आसान नहीं होती। फिर कहीं तुम्हारे पैसे भी बेकार चले जाएँ।”

फुलवारी ने दृढ़ता से कहा, “एक बार मन की इच्छा पूरी करना चाहती हूँ। हो सकता है मैं पास हो जाऊँ।”

टीचर ने कहा, “ठीक है, मैं फॉर्म भरवा दूँगी, तुम कल मेरे पास आना।”

अगले दिन शिक्षा के साथ जाकर वह टीचर से मिली। फॉर्म भरने के बाद जब फुलवारी पैसे देने लगी तो साथ ही शिक्षा भी देने लगी। टीचर ने कहा, “इसकी कोई जरूरत नहीं। बेटा, तुम मन लगाकर तैयारी करो, पैसे मैं भर दूँगी।”

फुलवारी ने हाथ जोड़कर कहा, “मैं आपका धन्यवाद कैसे करूँ, लेकिन आप अगर पैसे भरोगे और कहीं मैं उतने मन से तैयारी नहीं कर सकी तो? कहीं मुझे मुफ्त लेने की आदत पड़ गयी तो?”

टीचर ने कहा, “नहीं ये मुफ्त नहीं है, इन पैसों का कर्ज तुम्हें चुकाना है, अब ये तुम पर है कि तुम इसे कैसे चुकाती हो। और जो पैसे तुम्हारे पास हैं उनसे पढ़ने की सामग्री खरीदो।”

फुलवारी बोली, “थैंक यू! फिर कर्ज चुकाने के बाद ही दूँगी।”

शिक्षा और फुलवारी वापस लौट रही थीं तो रास्ते में फुलवारी ने पूछा, “शिक्षा, तेरे पास पैसे कहाँ से आये?”

शिक्षा बोली, “मुझे मम्मी-पापा ने जन्मदिन पर उपहार दिया था, चाँदी का पेन। उसे बेचकर ले आई।”

फुलवारी की आँखें भर आयीं। वो सोच रही थी कि इन सबका कर्ज कैसे चुका पाऊँगी मैं गरीब।

यही एक बात उसके मन में घूमती रही और मन्दिर में ढोक देकर उसने सभी परीक्षाएँ दीं। अब तक भी वह इस बात को मन से नहीं निकाल पायी थी।

अचानक एक सुबह बहुत खुश होते हुए टीचर के साथ शिक्षा उसके घर आई। टीचर ने आते ही कहा, “फुलवारी मेरा कर्ज तुमने इतना ज्यादा चुका दिया कि मुझपर ऋण चढ़ गया है!” फुलवारी कुछ समझ नहीं पायी। शिक्षा ने उसे कसकर गले लगते हुए कहा, “अखबार में नतीजा आया है, तू दसवीं की परीक्षा में प्रथम आई है। देख तेरा नाम छपा है।” फुलवारी के २ आँसू टीचर के चरणों पर गिर पड़े। मन्दिर के मन्त्र भी उसे कंठस्थ हो गए थे और स्कूल का ज्ञान भी उसमें समा चुका था।

मेहंदी पिसकर ही रंग लाती है,

लगन सफलता को संग लाती है।

शब्दार्थ:

  • सहानुभूति – दया
  • लगन – मन लगा कर काम करना
  • कंठस्थ – ज़बानी याद हो

नैतिक मूल्य: 

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लगन रंग लायी
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