जब राजेश को आतंकवादियों ने बंदी बना लिया, उसने अपनी होशियारी से अपने माता-पिता को खबर करी।  यह है उसके सूझ-बूझ की कहानी।

 घुप्प अँधेरी काली रात, सांय-सांय करती बर्फीली हवा और शरीर को बर्फ सा जमा देने वाली कश्मीर की भयानक ठंड। ऐसे में राजेश को बंधक बनाए वो चार कबायली आतंकवादी, एक टूटे खंडहर में बैठे हुए आगे की कार्यवाही की समीक्षा कर रहे थे।

राजेश आठवीं कक्षा में पढ़ने वाला, एक बड़े पुलिस अधिकारी का इकलौता बेटा था जिसे इन आतंकवादियों ने धोखे से बंदी बना लिया था।

घटना कल शाम की थी। स्कूल की छुट्टी के बाद राजेश घर जाने के लिए बस का इंतज़ार कर रहा था। तभी एक पुलिस की जीप उसके पास आकर रुकी, जिसमें दो पुलिस वाले बैठे थे।

उनमें से एक बोला, “राजेश बेटा, आपके डैडी दिवाकर साहब का एक्सीडेंट हो गया है और वह अस्पताल में भर्ती हैं। हम आपको उनके पास ले जाने के लिए आए हैं।”

राजेश एक क्षण हिचकिचाया, लेकिन पुलिस की वर्दी व पुलिस की जीप देखकर और एक्सीडेंट की खबर सुनकर वह जीप में उन दोनों के बीच बैठ गया। जीप के चलते ही उनमें से एक पुलिस वाला बिस्कुट निकाल कर खाने लगा। उसने दो बिस्कुट राजेश को भी खाने को दिये। बिस्कुट खाने के कुछ ही मिनटों बाद राजेश को गहरी नींद ने दबोच लिया और वह बेहोश हो गया।

जब राजेश को होश आया तो उसने अपने आप को एक खंडहर में पाया। उसके मुँह पर टेप चिपका हुआ था और उसके हाथ पैर कस के बंधे हुए थे। बाहर दिन की तेज रोशनी से ऐसा लग रहा था की शायद दोपहर का समय है। धीरे-धीरे सारी घटना चलचित्र की तरह राजेश के दिमाग में घूमने लगी। “इसका मतलब मेरा अपहरण हो गया है और मैं कल शाम से आज दोपहर तक बेहोश रहा,” राजेश बड़बड़ाया।

राजेश की सूझ-बूझ की कहानी

थोड़ी देर में दो कबायली राजेश के पास आए। उनमें से काली दाढ़ी वाले एक कबायली ने राजेश से कहा, “बेटा, अपने डैडी को एक चिट्ठी लिखकर दो जिससे हम अपने बंद आतंकवादी साथियों को छुड़ा सकें।” राजेश ने सोचा, “ये आतंकवादी भले ही अभी मुझसे प्यार से बात कर रहे हैं, पर वास्तव में ये बड़े ज़ालिम और निर्दयी लोग होंगे, अगर इनकी बात नहीं मानी तो ये मुझे मार भी सकते हैं।” डैडी अक्सर मम्मी से ऐसे ही क़बायली लोगों की क्रूरता का ज़िक्र किया करते थे। परसो ही डैडी, मम्मी को बता रहे थे कि दो कबायली आतंकवादी पकड़ में आए हैं, जिनसे इनके बहुत से राजों का पर्दाफाश हो सकता है, जैसे कि उनके पास हथियार कहाँ से आते हैं, ये अपने हथियार छुपाते कहाँ पर हैं, और कौन-कौन बड़े लोग इनकी सहायता करते हैं।

उस काली दाढ़ी वाले क़बायली ने राजेश के हाथ-पैर खोल दिये व मुँह से टेप भी हटा दिया और बोला, “लो बेटा, ये कागज-पेन, और अपने डैडी को एक चिट्ठी लिख दो।”

राजेश ने कहा, “अंकल मुझे बड़ी ज़ोर से पौटी आ रही है। कृपया मुझे बाहर जाकर पौटी करने दें। उसके बाद मैं तुरंत पत्र लिख दूँगा।” उस क़बायली के इशारे पर, दो अन्य क़बायली पिस्तौल के निशाने पर राजेश को खंडहर के बाहर ले आए। वहाँ से करीब पचास कदम चलने पर एक छोटा सा नाला था, जिसके किनारे बैठ कर राजेश दैनिक क्रिया से निवृत्त होने लगा और साथ ही कनखियों से चारों तरफ की भौगोलिक स्थिति को समझने की कोशिश करने लगा। तभी उसके कानों में घंटा बजने की आवाज़ आयी, शायद आस-पास कोई मंदिर था। वापिस खंडहर में जाते हुए राजेश का दिमाग बड़ी तेजी से काम कर रहा था।
खंडहर में पहुँचते ही दाढ़ी वाले कबायली ने राजेश से कहा, “चलो बेटा, अब चिट्ठी लिखो”।

राजेश ने उससे कागज़ और पेन लिया और लिखा-

‘डियर डैडी,

कृपया देर मंत करिये। दिंन निकलते ही इनका कार्य अवश्य पूरा करंना है। ये भी देश की एकता में अखंण्डं विश्वास रखते हैं। इनका हंर काम पूरा करंनां है। अन्यथा मेरी लांश ही आपको मिलेगी।’

राजेश की सूझ-बूझ की कहानीक़बायली ने पत्र को एक बार पढ़ा और बोला, “बिलकुल सही लिखा तुमने। हम भी देश की एकता में विश्वास रखते हैं। हा हा हा।” कुछ घंटों बाद राजेश का लिखित पत्र और साथ में क़बायली आतंकवादियों की तरफ से लिखा एक पत्र दिवाकर साहब के हाथ में था। आतंकवादियों वाले पत्र में उन्होनें चौबीस घंटों के अंदर अपने दोनों साथियों को छोड़ने के लिए कहा था, और ऐसा न करने पर राजेश की मौत की धमकी दी थी। 

दिवाकर साहब कल शाम से राजेश को ढूँढने का हर संभव प्रयत्न कर रहे थे। इसके लिए उन्होनें अपनी पूरी फोर्स लगा रखी थी। राजेश की मम्मी की तो रो-रोकर आँखें भी सूज गयी थीं। हिचकियाँ रुकने का नाम ही नहीं ले रहीं थीं। पत्र मिलने के बाद तो उनकी स्थिति और भी खराब हो गयी, उन्हें दौरे से पड़ने लगे। लेकिन दिवाकर साहब ने ढ़ृढ़ निश्चय कर लिया कि भले ही देश की खातिर उन्हें अपने इकलौते बेटे को कुर्बान करना पड़े, पर वह उन आतंकवादियों को नहीं छोड़ेंगे। फिर भी बार-बार राजेश को याद कर के उनकी आँखों में आँसू आ जाते और वह उसका पत्र पढ़ने लगते।

तीसरी बार जब दिवाकर साहब ने राजेश का पत्र पढ़ा तो उन्हें लगा कि राजेश ने पत्र लिखने में कहीं कहीं बिंदी लगाने की गलती की है। हर साल हिन्दी में सबसे अच्छे नंबर लाने वाला उनका बेटा इतनी छोटी- छोटी गलतियाँ करेगा, ये उन्हें कुछ अजीब-सी बात लगी। तभी उनके दिमाग में एक ख्याल आया। उन्होनें गलत बिंदी लगे शब्दों को एक अलग कागज़ पर लिखा। ये शब्द थे-

मंत दिंन करंना अखंण्डं हंर करंनां लांश

अब उन्होनें गलत बिंदी वाले अक्षरों को अलग से लिखा। वे थे-

मं दिं रं खं डं हं रं नां लां।

मतलब – मंदिर खंडहर नाला

तो ये रहस्य था! दिवाकर साहब ने तुरंत अपनी फोर्स को चुपके से ये पता लगाने को कहा कि शहर में ऐसा कौन सा मंदिर है जिसके आस-पास खंडहर है और कोई नाला बहता है।

राजेश की सूझ-बूझ की कहानीतीन घंटों बाद उस जगह का पता चल गया और फिर एक फुल-प्रूफ योजना के तहत आधी रात को उन खंडहरों पर छापा मारा गया। वहाँ पर उपस्थित चारों आतंकवादियों को पकड़ लिया गया और राजेश को सकुशल छुड़ा लिया गया। और इस तरह राजेश अपने घर लौट आया, सिर्फ अपनी होशियारी के बल पर।

दिवाकर की माँ की खुशी का तो ठिकाना ही ना था। दिवाकर साहब ने अपने बेटे की खूब प्रशंसा की पर यह भी समझाया, “बेटा, कभी भी किसी भी अजनबी पर आँख बंद करके विश्वास मत करो और कभी किसी अजनबी की दी हुई चीज़ मत खाओ। भले ही वे लोग पुलिस की वेशभूषा में थे, पर तुम उनमें से किसी को नहीं पहचानते थे, जबकि तुम मेरे ज़्यादातर साथियों को जानते हो। और अभी तुम बच्चे हो, अगर मेरा सच में कोई एक्सीडेंट हुआ होता, तो या तो मम्मी तुम्हें लेने आतीं या कम से कम वे तुम्हारे स्कूल में फोन करतीं। इस तरह पुलिस की गाड़ी तुम्हें नहीं भेजी जाती।”

राजेश ने कहा, “हाँ डैडी, मुझे इन सब बातों को सोचना चाहिए था। आगे से मैं ध्यान रखूँगा।” और फिर वे दोनों मम्मी के बनाए आलू के पराँठे खाने चल दिये।

शब्दार्थ: 

  • क़बायली – कबीले वाले लोग
  • समीक्षा – विचार-विमर्श
  • पर्दाफाश – रहस्य खुलना

नैतिक मूल्य:

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Music by: Behind Your Window (Kai Engel) / CC BY 4.0
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