२१ तोपों की सलामी के साथ, भारतीय सैनिकों की उपस्थिति में, तिरंगे को आधा झुकाकर इस तरुण का अंतिम संस्कार किया जा रहा है। यह कोई भारतीय सेना का जवान नहीं है, कोई राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री नहीं है, कोई करोड़पति या अरबपति नहीं है, कोई वैज्ञानिक या उच्च उपाधि वाला नहीं है, है तो अमृतसर के पास भारत-पाकिस्तान के बीच वाघा बॉर्डर पर गायों को चराने वाला मात्र एक साधारण सा चरवाहा।

“मेरा जीवन मेरे लिए यादगार है, मेरी मौत भी यादगार होगी।” यही कहा करता था वो गायें चराते हुए अपने दोस्तों से। उसके वो सब दोस्त भी आज यहाँ उसके ऐसे अनपेक्षित अंतिम संस्कार में सम्मिलित हैं। इन्हें भी उम्मीद नहीं थी कि क्या सच में ऐसा होगा कि उनका यह साथी ‘गोचर’ मरकर भी यादगार बन जायेगा। कितने सालों से यह साथ में गायें चराता रहा और आज ना जाने कैसे सबसे बिछुड़ के इतना ऊँचा होकर दूर चला गया है। सभी मित्र अनगिनत दुआओं, झुके हुए सिर और नम आँखों के साथ उसे विदाई दे रहे हैं। राष्ट्रगान के साथ आज उसका अंतिम संस्कार हो रहा है।

अभी ३ दिन पहले की ही तो बात है जब यह अशिक्षित गोचर अपनी गायों को चराने के लिए वाघा बॉर्डर के इस ओर भारत में वाघा गाँव में घूम रहा था। अपने साथी चरवाहों के साथ वह मस्ती में गाता हुआ घूम रहा था,

कन्हैया संग ग्वालों के चरावे आज गैया,

ग्वाल बना डोले है ये जग का खिवैया।

साथ-साथ उसके साथी भी गाते हुए नाच रहे थे। मस्ती भरा माहौल था। तभी गोचर की एक गाय दूर जाने लगी। गोचर उसके पीछे गया, बोला, “ए मीठी! चल तो, जा कहाँ रही है वहाँ, अरे वहाँ अपना जाना मना है।” गाय तो आगे ही आगे चली जा रही थी। गोचर फिर पीछे-पीछे जाते हुए प्यार से बोला, “बावरी हो गयी, समझा रहा हूँ तो समझती ही नहीं। मैं कहाँ से बंसरी लाऊँ तुझे बुलाने को उस कन्हैया की तरह।”

पर गाय है कि सुनना ही नहीं चाह रही थी और गोचर को प्यार की जगह डंडे की भाषा आती नहीं थी। वह तो सदा से इन सभी गायों, बछड़ों के साथ मित्रवत् ही व्यवहार करता आया है और प्यार से ही उनके दिलों पर राज करता आया है। उसके सखाओं ने गायों को नियन्त्रित करने के लिए कभी उसके हाथ में लकुटी नहीं देखी। और उसकी गायें भी उसके बोलने से ही उसके अनुरूप कार्य करने लगती थीं। पर आज ना जाने क्यों यह गाय सुन ही नहीं रही थी। चलते-चलते वह सीमा के एकदम नजदीक पहुँच गयी। वहाँ लगे कँटीले तारों से उसे बचाने के लिए गोचर आगे हो गया। कुछ काँटों ने उसकी एक बाँह पर खँरोचें ला दीं। जाने क्या हुआ कि उसका ध्यान कुछ दूरी पर बात करते दो पाक सैनिकों की बातों पर चला गया। उन सैनिकों को इसका तनिक भी आभास नहीं था कि कोई उनकी बात सुन रहा होगा।

“आज रात ही आग बरसा देंगे”, एक पाक सैनिक बोला।

“लेकिन सर, अभी हमारे पास यहाँ जलाने के लिए १०० से ज्यादा तीलियाँ नहीं हैं”, दूसरे सैनिक ने कुछ डर मिश्रित आश्चर्य के साथ कहा।

गोचर अनपढ़ था लेकिन उसकी बुद्धि तेज थी। वह समझ गया कि पहला सैनिक उच्च पद पर है और दूसरा उसके अधीन है। गोचर उनकी बातों की बारीकियों को समझ रहा था, वे आज रात भारत पर हमला करने की बात कर रहे हैं और अभी १०० जवान ही इनके पास हैं।

पहला सैनिक बोला, “यह बात अभी तुम सिर्फ तुम तक ही रखना कि ५००० तीलियाँ माचिस की पेटी में चाँद सिर पर आते-आते यहाँ गुपचुप पहुँच जाएँगी। और सारे गोले-बारूद इन घास की बैलगाड़ियों में छुपे हुए हैं।”

दूसरा सैनिक खुश होते हुए बोला, “जी जनाब, हम सब तैयार हैं। कल सुबह की पहली किरण के साथ तिरंगे की जगह अपना झंडा फहराता नज़र आएगा।”

पहले ने कहा, “मुझे तुम सभी जवानों के लहू की जरूरत है।”

“हाज़िर है जनाब, इस्लाम के लिए तो सिर तक हाज़िर है।” दूसरे ने जोश के साथ तन कर कहा।

“ठीक है अब तुम अभी जाओ”, पहले ने आदेश दिया।

सलाम करते हुए दूसरे ने कहा, “खुदा हाफिज़।”

यह कहकर दूसरा सैनिक चला गया। और पहला इधर-उधर गिद्ध की तरह नज़र दौड़ाने लगा कि कहीं कुछ गड़बड़ ना हो। गोचर एकदम सचेत हो गया और वह यह समझ गया था कि उस सैनिक की दृष्टि से उसका बचना असम्भव है। इसलिए उसने कृत्रिम रूप से अनजान बनते हुए गाय को हल्का सा मारते हुए कहा, “चल ना री, चल।”

उस सैनिक ने पास आकर कड़क आवाज़ में गोचर से पूछा, “क्या कर रहा है यहाँ?” गोचर ने निर्भीकता के साथ जवाब दिया, “ये मेरा देश है, मैं मेरी माँ की गोद में कुछ भी करूँ, आपको जवाब क्यों दूँ? मुझसे कुछ भी पूछने का हक़ भारत के सैनिकों को है और मैं जवाब भी उन्हीं को दूँगा।”

पाक सैनिक बात ज्यादा बढ़ाना नहीं चाहता था क्योंकि उसे वहाँ आस-पास सुरक्षा में तैनात भारतीय सैनिक के आ जाने का डर था। और वह इस बात के प्रति भी आश्वस्त हो गया था कि इस चरवाहे ने कुछ नहीं सुना, यह बस गाय चरा रहा है, फिर इसमें इतनी बुद्धि भी नहीं है। गोचर चुपचाप गाय को लेकर चला गया। उसके सभी साथी उसे देखकर बोले, “कहाँ चला गया था?” गोचर ने कुछ जवाब नहीं दिया, वह गहरे चिंतन में डूबा हुआ था। कुछ देर बाद एक साथी से बोला, “भोला, तू मेरी गायों को शाम को मेरे घर ले आना। मैं जा रहा हूँ, मेरी तबियत कुछ ठीक नहीं है।” यह कहकर गोचर चला गया।

वह एक पेड़ के नीचे जाकर बैठ गया, गहन चिंतन में डूबा हुआ। जाने क्या उधेड़बुन उसके मन में चल रही थी। उसे इस बात का पता था कि अभी बहुत लम्बे समय से वाघा में पाकिस्तान की तरफ से शांति बनी हुई है। इसलिए भारतीय सेना यहाँ इतनी चौकन्नी नहीं है और यहाँ अभी बमुश्किल २०० सैनिक होंगे, बहुत सैनिक छुट्टियों पर हैं। उसके मन में यही सब बातें घूम रही थीं, “शायद इसी का लाभ उठाना चाहती है पाक सेना। पर अभी मैं क्या करूँ, मुझे क्या करना चाहिए? मैंने कहा था कि मैं अपनी माँ की गोद में हूँ, तो माँ की गोद को लहुलुहान कैसे करने दे सकता हूँ किसी को भी। मुझे कुछ तो करना होगा। जाकर भारतीय सेना को सबकुछ बताऊँ?….मैं क्या करूँ…” वह इसी तरह सोचता रहा। साँझ ढल आई, चाँद कुछ-कुछ दिखने लगा। उसकी धड़कनें बढती जा रही थीं, आने वाले विनाश को वो अपनी मन की आँखों से देख रहा था। फिर एकाएक उठा, “वाणी में बड़ी शक्ति होती है, आज मैं दिखाता हूँ उन्हें।”

उसने अपने कंधे पर पड़े सफ़ेद कपड़े को सिर पर बाँधा और दृढ कदमों के साथ सीमा की ओर बढ़ चला। सीमा पर बने ऊँचे भवन पर चढ़ गया। फिर जोश भरी आवाज़ में ललकारते हुए बोला, “जय हिन्द।”

उसकी बुलंद आवाज़ से भारत और पाकिस्तानी सेना दहल गयी कि क्या हुआ है। और गोचर उसी तरह गर्जती आवाज़ के साथ धाराप्रवाह बोलने लगा, “तुम हमसे लड़ना चाहते हो, आओ, स्वागत है तुम्हारा। तुम्हारी सहायता के लिए तुम्हें जानकारी दे दूँ। पहली बात, तुम्हारे पास सिर्फ १४ लाख सैन्य टुकड़ियाँ हैं और हमारे पास चीन और अमेरिका से भी ४५ लाख हैं। आओ सामना करो हमारा! दूसरी बात, तुम्हारे पास सिर्फ ४९० हवाई उड़ानें हैं और हमारे १०५०। आओ, हिम्मत है तो सामना करो हमारा! तीसरी बात, तुम्हारे पास ७४ नौसेना जहाज हैं और हमारे पास १८४। आओ माँ का दूध पिया है तो सामने आओ! चौथी बात, तुम्हारे पास एक भी परमाणु पनडुब्बी नहीं है और हमारे पास २। आओ लड़ो हमसे! पाँचवी बात, तुम्हारे पास ४००० बैटल टैंक हैं और हमारे पास ६०००। आओ दिल मजबूत करके आओ! जहाँ तुम्हारी कमाई ४९० रुपये है वहाँ हमारी कमाई ८००० रुपये है। और हमसे लड़ने आ रहे हो! खाने के लिए रोटी जुटाने से पहले, तुम लड़ने के लिए हथियार तैयार करने की सोच रहे हो…”

और एक पाकिस्तानी गोली इस वीर बहादुर किशोर के मस्तिष्क को चीर गयी। गिरते-गिरते भी वो बोल गया, “जिस माँ का एक साधारण सा चरवाहा तुम्हें ललकार गया, उसके ये जवान सपूत तुम्हारी क्या दशा कर देंगे, सोच लेना। जय हिन्द!” धरती की गोद में उसका शरीर आ पड़ा और उसके होश रहते उस माटी को चूम लिया, बोला, “कृष्ण मैं आ रहा हूँ।”

इससे पहले कि भारत की तरफ से गोलियों की बौछार शुरू हो जाती, पाकिस्तान ने युद्ध बंद का झंडा लहरा दिया और भारत ने उसे स्वीकार कर लिया। उसकी बुलंद आवाज़ और जोश ने पाकिस्तानी सेना के हौसले कमज़ोर कर दिए। उसने दिखा दिया कि वाणी में कितनी ताकत होती है। जैसे कर्ण के सारथि शल्य ने कर्ण के हौसले कमज़ोर करके उसे अर्जुन से परास्त करवा दिया था, वैसे ही आज इस गोचर ने पाकिस्तान को सिर्फ अपनी वाणी से हरा दिया। और इस एक सपूत की जान ने लाखों जानें बचा लीं, भारतीय जानें भी और पाकिस्तानी भी। भारतीय जवानों ने उसी समय अपनी टोपी उतारकर, बन्दूक जमीन पर टिकाकर उसे सलाम ठोका।

और आज उसी रणबांकुरे का अंतिम संस्कार हो रहा है जो सदा कहा करता था “मेरी मौत भी यादगार होगी”।

शब्दार्थ

  • चरवाहा – गायें चराने वाला
  • धाराप्रवाह – लगातार
  • परास्त – हराना
Background music: Sunset (Kai Engel) / CC BY 4.0
मेरी मौत भी यादगार होगी
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