बधाइयाँ स्वीकार करते-करते अभयदेव का गला सूख गया। जिलाधिकारी का कार्यभार ग्रहण करने आफिस पहुँचे, तो वहाँ लोगों की भीड़ फूल मालाएँ लेकर उनका स्वागत करने के लिए खड़ी थी। प्रतीक्षा कक्ष में जिलाधिकारी के अधिकार क्षेत्र के सभी विभागों के प्रतिनिधि अधिकारी हाथों में गुलदस्ते लिए प्रतीक्षारत थे। अभय को थोड़ा गर्व हुआ।

तभी कानों में परिचित आवाज़ गूँजी, “पद पाकर गर्व नहीं, सेवाभाव सीखो”। वह मुस्करा दिया। विनम्रतापूर्वक एक-एक से परिचय एवं बधाई स्वीकार करता हुआ आगे बढ़ा। इस औपचारिकता में काफी समय लग गया। ग्यारह बजे मीटिंग थी। जिला में हो रहे विकास कार्यों, योजनाओं, समस्याओं आदि से उन्हें परिचित होना था, नये कार्यक्रम की रूपरेखा तैयार करनी थी। स्वास्थ्य एवं कानून व्यवस्थाओं की वर्तमान स्थिति का जायजा लेना था।

मीटिंग बहुत लम्बी चली। सांस लेने का समय नहीं मिला। मीटिंग से अपने आफिस कक्ष में वापस लौटे, तो गुलदस्ते में कैद फूलों की सुगंध से पूरा कमरा सुवासित था। मौका देखकर झट से ब्रीफकेस से उन्होनें एक फोटोफ्रेम निकालकर मेज पर सजा दिया और साथ में एक फ्लावरपॉट भी रखा दिया। फिर फोटो को अपलक निहारते हुए उनकी आँखें नम हो गई।

भावुक होकर वह बुदबुदाये, “काश! आज आप यहाँ होती”।

उन्हें लगा जैसे फोटो बोल रही है, “देख अभय! मेरी बात सच हुई या नहीं?”

वह भी भावावेश में बोल पड़े, “हाँ दीदी! आप ने ठीक कहा था”।

अन्धेरे और उजाले में लिपटा पूरा अतीत उनके सामने खड़ा हो गया। उस दिन फिजिक्स का पेपर देकर कर वह घर वापस आना ही नहीं चाहता था। अपनी बेइज्जती, बदनामी और थू थू से व्यथित उसका मन नदी में डूब कर आत्महत्या या घर से भाग जाने का था। काफी देर तक इस उलझन में रहा कि उसे क्या करना चाहिए। अनिश्चय की स्थिति में घर की तरफ कदम मुड़ गये। घर में घुसते ही देशी घी में बने हलुआ और कचोरी की खुशबू की उपेक्षा करता हुआ वह अपने कमरे की तरफ भागा, किसी का भी सामना करना नहीं चाहता था। करता भी कैसे? काम ही ऐसा किया था। अब क्या परिणाम होगा, वह खुद नहीं जानता था। लेकिन कोशिश करके भी दीदी से नहीं बच पाया था।

उन्होनें बीच में ही दबोच लिया, “कहाँ तीर की तरह भागे जा रहे हो? पेपर कैसा हुआ?”

उसने चिढ़कर कहा, “जैसा होना था, हो गया, मैं सोने जा रहा हूँ”।

तीखी नज़रें गड़ाकर दीदी ने कहा, “भूखे पेट नींद नहीं आयेगी, नाश्ता कर लो”।

उसे और गुस्सा आ गया। “अपनी सलाह अपने पास रखो!” कहकर वह खटाखट सीढ़ियाँ चढ़कर अपने कमरे में हताश, निराश, और उद्विग्न सा बिस्तर पर लेट गया।

एकटक छत की ओर ताकते हुए सोच रहा था, “मेरे इस गुनाह की कोई माफी नहीं है”।

तभी दीदी प्लेट में नाश्ता और बादाम का शरबत लेकर आई, “मैंने कहा था कि भूखे पेट नींद नहीं आयेगी। कुछ खा पी लो”।

भविष्य की डरावनी तस्वीर से बौखलाया वह दीदी पर बरस पड़ा, “आप अपनी दादागिरी से बाज क्यों नहीं आती? कह दिया भूख नहीं है, फिर भी पीछे पड़ी हैं। मुझे अकेला छोड़ दीजिये”।

Meri prerna - meri didi

उसने तैश में हाथ झटका, नाश्ता और शरबत जमीन पर गिर पड़ा। फिर पता नहीं कौन सा भूत उस पर सवार हो गया कि उसने सारी मर्यादाएं तोड़ कर चीजें पटकनी शुरू कर दी। मेज पर रखी फाइल उछाल दी। फाइल के पेपर इधर उधर बिखरकर जमीन पर पड़े शरबत से गीले हो गये। दीदी हक्का-बक्का सी आँखें फाड़कर देखती रह गई। फाइल में उसकी धीसिस का पहला अध्याय था। दीदी चुपचाप पेपर को समेटे कर चली गई।

अभय को डर था कि उसकी दीदी अभी आसमान सिर पर उठा लेगीं। लेकिन ऐसा कुछ हुआ नहीं। दूसरे दिन वह भी शान्त दिखा। दोनों सामान्य दिखने का प्रयास कर रहे थे,  लेकिन अदृश्य सा एक तनाव दोनों के बीच था। उसकी परीक्षा समाप्त हो गई थी। दिखावे के लिए वह कम्पटीशन की तैयारी कर रहा था। शाम को स्विमिंग के लिए भरा बैग लेकर जाता, लौटता तो खाली होता। कभी कभी उसे लगता जैसे दीदी उस पर नज़र रख रहीं है। वह थोड़ा चौकन्ना रहने लगा। धीरे-धीरे दीदी से बात भी शुरू कर दी।

एक दिन किसी विवशता वश दीदी ने उससे कहा, “अभय! मेरा एक काम कर दो”।

उत्साहित होकर उसने कहा, “बताइये”।

“आभा का फोन आया है, उसके पैर में मोच आने के कारण वह लाईब्रेरी की किताबें वापस नहीं कर सकती। तुम उसके घर से किताबें ले आओ, मैं विश्वविद्यालय जाऊँगी, लौटा दूँगी”।

दीदी को खुश करने के लिए बताये पते पर वह पहुँचा। कालबेल बजाते समय उसे तनिक भी आभास नहीं था कि उसका साक्षात्कार किस से होने वाला है। दरवाजा मिसेज़ सक्सेना ने खोला, वह घबरा गया।

उसे देखते ही वह दहाड़ी, “तुम यहाँ! तुम्हारी इतनी हिम्मत कि मेरे घर सिफारिश के लिए आ पहुंचे?”

लड़खड़ाते हुए उसने कहा, “मैम! मैं नहीं जानता था कि यहाँ आप रहती हैं, मैं तो आभा दी से लाईब्रेरी की किताबें लेने आया था। मुझे श्रेया दी ने भेजा है”।

इतने में लगड़ाती हुई आभा आ गई, “अरे! अभय तुम, अन्दर आओ”।

वह दुविधा में था, अन्दर जाये या बाहर खड़ा रहे। पैर थर थर काँप रहे थे। वह किताबें लेकर फौरन भाग आया। घर आकर उसने देखा कि दीदी उसके कमरे से निकल रहीं थीं। वह डर गया, अब तो उसका भांडा फूट गया। अब तक तो उस दिन की सारी कहानी दीदी को पता चल चुकी होगी। पर उसने धन्यवाद के सिवाय कुछ नहीं कहा। पर अब इतना तय था कि बात छिपी नहीं रहेगी। किसी भी क्षण या दिन विस्फोट होकर रहेगा। बाबू जी के रौद्र रूप की कल्पना से वह सिहर गया। इसलिए शाम को वह फिर स्विमिंग के बहाने निकला। तय योजना के अनुसार वह स्विमिंग पूल ना जाकर पास के पार्क में जाकर बैठ गया था।

उसका दोस्त सुबोध स्कूटी पर वहाँ आया, उसने बैग से कुछ सामान उसे देते हुए कहा, “यार! गजब हो गया, सक्सेना मैम आभा दी की मम्मी हैं, अब दीदी को सब पता चल जायेगा। थोड़े पैसों का इन्तजाम कर दे, मैं कल ही भाग जाता हूँ”।

तभी न जाने कहाँ से यमराज की तरह दीदी वहाँ प्रकट हो गयी। उसके मुँह से विस्मय से निकला, “दीदी आप यहाँ?

“हाँ! मैं यहाँ। तुम क्या सोचते हो, मुझे कुछ नहीं पता? उस दिन के बाद से तुमने कोई परीक्षा नहीं दी है, केवल दिखावा किया है। कम्पटीशन की तैयारी का भी नाटक कर रहे हो। अब भागने की योजना बना रहे हो। अलमारी से सारा सामान धीरे धीरे बैग में लाकर सुबोध को दे रहे हो। एक के बाद एक गलती करते जा रहे हो”।

“फिर मैं क्या करूँ?”

“अगर उस दिन तुम ने अपनी गलती बता दी होती, तो कम से कम अगले वर्ष की परीक्षा का निष्कासन रुक जाता। तुमने अपने पैरों पर स्वयं कुल्हाड़ी मारी है”।

“फेल होने के दबाव में था, यही आखिरी विकल्प सूझा”।

“और मूर्ख अपने भविष्य के साथ खिलवाड़ कर बैठा। नकल करने से पहले नहीं सोचा, पकड़ा जाऊँगा तो क्या होगा?”

“सच बताओ दीदी! क्या सारा दोष मेरा है? सब जानते हैं कि गणित और भौतिकी मेरे लिए गौरीशंकर की चोटी है, जिस पर चढ़ना मेरे लिये असम्भव है। दिन रात मेहनत की फिर भी फेल हुआ। फेल होने का दर्द क्या होता है, आप नहीं समझोगी। आप ने यह दंश झेला नहीं है। सब्जेक्ट बदलने की गुहार लगाई तो कहा – और मेहनत करो। मेहनत तो तभी रंग लाती, जब काम मनपसंद हो। बाबू जी की जिद्द है कि मैं इंजीनियर ही बनूँ। क्योंकि उनके दोस्तों के लड़के इंजीनियरी पढ़ रहे हैं। मेरी क्षमता, सामर्थ्य, रुचि और चाहत की परवाह बाबू जी को नहीं है। बुद्धिमानी का मापदंड सिर्फ साइंस है उनके लिए। मेरे अरमानों की बलि देकर उसे अपनी प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाया है। मैं तो अपनी जिंदगी से हार गया हूँ। आत्महत्या की कोशिश भी असफल रही, भागना चाहता था, तो आप बीच में आ गई”।

“क्या तुम उचित करने जा रहे थे?”

“दी! क्या उचित, क्या अनुचित? अभी कुछ दिनों में रिजल्ट आ जायेगा। बाबू जी वही पुराना डायलॉग दोहरायेंगे – नालायक! पढ़ाई लिखाई में मन नहीं लगता, तो गाँव जाकर हल चलाओ, गाय भैंस चराओ, सारी चर्बी छट जायेगी”।

कुछ सोचते हुए दीदी ने पूछा, “तुम्हें किन विषयों में रूचि है?”

“मुझे साहित्य, प्राचीन एवं अर्वाचीन इतिहास और राजनीति में रूचि है”।

“ठीक है, मैं बाबू जी को समझाऊँगी कि उनकी जबरदस्ती के कारण तुम बार बार फेल हो रहे हो। तुम्हें सब्जेक्ट बदलने की अनुमति देकर एक मौका और दे”।

“आप क्या सोचती हैं, बाबू जी मान जायेंगे!”

“आसानी से तो नहीं, तुम्हें उनकी डाँट, फटकार और गालियाँ तो सुननी ही पड़ेगी। उनका भी तो सपना टूटेगा। फिर बकझक कर शान्त हो जायेंगे। मानने के आलावा और कोई रास्ता भी उनके पास नहीं होगा”।

“अब मुझे क्या करना चाहिये?”

“पहले मुझसे वादा करो, भविष्य में कभी कोई गलत काम नहीं करोगे। अपनी निराशा और अवसाद से बाहर निकलो। दो साल व्यर्थ हुए हैं, पूरी जिन्दगी नहीं। अभी भी बहुत कुछ कर सकते हो”।

“क्या कर सकता हूँ?”

“कल से तुम अपने पसंदीदा विषयों की किताबें लाकर पढ़ाई शुरू करो। मुश्किल आये तो मुझ से पूछना। विश्वास रखो माँ और बाबू जी को कुछ नहीं बताऊँगी। सक्सेना आंटी से तुम्हारे लिए मदद माँगूगी । अगले साल तुम आर्ट्स साइड से प्राइवेट फार्म भरना। आर्ट्स साइड में भी बहुत स्कोप है। सफलता सिर्फ साइंस सब्जेक्ट की मोहताज नहीं है, बल्कि हर विषय में बहुत स्कोप है, यह तुम्हें सिद्ध करके बाबू जी को दिखाना होगा”, कहकर दीदी ने उसे गले लगा लिया था।

वह भी सिसक पड़ा था, “दीदी! उस दिन के दुर्व्यवहार के लिए मुझे माफ करना। अपनी विफलता का विक्षोभ आप पर उतार दिया। आपको चैप्टर दुबारा टाइप करना पड़ा”।

“माफ कर दिया, मगर अब मेहनत में कमी नहीं आनी चाहिए”।

“नहीं आयेगी”, कहकर उसने अपने आप से भी एक वादा लिया था।

उसके बाद उसने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। दीदी की प्रेरणा, सहयोग और मार्गदर्शन से आज वह जिलाधिकारी के पद पर आसीन हो गया है। अब कितने इंजीनियर उसके नीचे कार्यरत होगे। काश! यह बात उस समय बाबू जी समझ पाते।

तभी एस.डी.एम. ने कक्ष में प्रवेश किया, “सर! उचित समझें, तो कल से जिले के दौरे का कार्यक्रम आरम्भ कर दिया जाये”।

अभय अतीत की गलियों से निकल कर वर्तमान में लौट आये, “ठीक है”।

फोटो पर नजर पड़ते ही एस.डी.एम.ने पूछा, “मैडम का है?”

“नहीं, यह मेरी दीदी का है, जिनकी बदौलत मैं आज यहाँ हूँ”।

शब्दार्थ:

  • अपने पैरों पर खुद कुल्हाड़ी मारना – अपनी मूर्खतासे अपनी हानि स्वयं करना
  • मोहताज – आधीन
  • निष्कासन – बाहर निकालना
मेरी प्रेरणा – मेरी दीदी
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