Post Series: हिरण्मई और भानुप्रिया


हिरण्मई और भानुप्रिया अब मेरठ में थे। छुट्टियों का पहला भाग उन्होनें अपने नाना-नानी के घर में बिताया था। उसके बाद वो मेरठ आ गए थे अपने दादा-दादी के पास। मेरठ में उनकी बुआ और चाचा और उनके परिवार भी रहते थे। छुट्टियों में बाकी चाचा और उनके परिवार भी आ जाते थे। इन सभी बच्चों का अपना ही बड़ा गिरोह बन जाता था, उन्हें और किसी की ज़रूरत नहीं थी।

बच्चे मिलकर चोर-सिपाही का खेल खेलते थे। उस नाटक में हर किसी की भूमिका होती थी। चोर की भूमिका तो नाटक के लिए ज़रूरी थी और उसको पकड़ने के लिए एक इंस्पेक्टर और दो सिपाही चाहिए थे। पर बाकियों को क्या बनाएँ और किसको क्या भूमिका दें? यह मुश्किल काम सबसे बड़े भाई का होता था। वो उम्र के हिसाब से बाकी लोगों को भूमिका थमाता था। खुद वो जज बनता था, अपने से छोटे को पुलिस का वकील और उससे छोटे को चोर का वकील बनाता था। भाई के चहेते भाई-बहन पुलिस के इंस्पेक्टर और सिपाही बनते थे। और जिससे भी वो उस समय नाखुश होता था, उस बेचारे को चोर बना दिया जाता था! वो छुपता और भागता था, मगर अंत में पकड़ा ही जाता था। उसके बाद जज भाई उसे भरी ‘अदालत’ में अक्ल बताते थे! घर के सबसे छोटे भाई-बहन अदालत में बैठ कर दर्शक का काम करते थे।

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इन सब खेलों के दूसरे छोर पर थी उनकी दादी। दादी बहुत धार्मिक थी, उन्होनें घर पर ही एक छोटा मंदिर बनाया था। हिरण्मई और भानुप्रिया रोज़ सुबह उनके साथ पूजा करते थे, यह उनके लिए एक नया अनुभव था। फिर उनकी दादी गाय को रोटी खिलाती थी। भानुप्रिया को गाय की बड़ी बड़ी आँखें देख कर डर लगता था। इसलिए वो दूर से ही यह सब देखती थी! लेकिन हिरण्मई थोड़ी सी ज्यादा बहादुर थी। वो थरथराते हुए अपनी दादी के साथ खड़ी रहती थी। गाय को रोटी देने के बाद दादी चिड़ियों के लिए भी सूखे चावल दाल देती थी। उनकी दादी उन्हें समझाती थीं की पशु-पक्षियों के प्रति हमें हमेशा दयालु होना चाहिए।

मेरठ का नौचंदी मेला बहुत ही प्रसिद्ध था। वो मेला इन्हीं छुट्टियों में लगता था। हिरण्मई और भानुप्रिया अभी मेला ही देखने जा रहे थे।

“कहाँ से शुरू करेंगे?”, भानुप्रिया ने पूछा।

“मुझे बंदूक से गुब्बारों पर निशाना लगाना बड़ा पसंद है, तुम्हें?”, हिरण्मई ने पूछा।

“मुझे वो मज़ेदार आईने बड़े पसंद हैं!”, भानुप्रिया चहकी। मेले में एक तम्बू में आइनों का एक समूह होता है। हर आईना थोड़ा टेढ़ा-मेढ़ा होता है। किसी में तुम लंबे लगते थे, किसी में छोटे। किसी में तरबूज की तरह मोटे और किसी में छड़ी की तरह पतले। आईने में अपने आप को देखकर हंसी छूट ही जाती थी! इसलिए मेले में पहुँच कर उन्होने वहीं से शुरुआत की।

नौचंदी के मेले में बहुत सारे मज़ेदार झूले और सवारियाँ भी थी। सबसे आकर्षक झूला एक विशाल पहिये की तरह लगता था, जिसमे बैठे लोगों को नीचे से ऊपर और फिर नीचे लाया जाता था। ऊपर से सारा मेला नज़र आता था। हिरण्मई को झूलों से बहुत डर लगता था मगर भानुप्रिया झूलों के मामले में निडर थी! वो हर नए झूले पर बैठना चाहती थी। जब भानुप्रिया झूलों पर होती, हिरण्मई कठपुतली का नाच देख रही होती। कठपुतलियों को धागों से नचा कर लोक कथाएँ सुनाई जाती थीं।

मेले की बात हो और खाने का ज़िक्र न हो, यह कैसे हो सकता है? नौचंदी का खाना भी बहुत मशहूर था। तरह-तरह की चाट, जैसे गोल-गप्पे, आलू-टिक्की, चाट-पापड़ी और दही-भल्ले। कबाब और मसालेदार टिक्के की महक हर जगह थी। यह तय करना मुश्किल था की क्या खाया जाए! मगर इन सब के बावजूद, नौचंदी बिना ‘बुढ़िया के बाल’ के अधूरी थी। ‘बुढ़िया के बाल’ एक गुलाबी, रेशेदार, मिठास से भरा, हल्का-फुल्का चीनी का गोला था। उसे खाना बहुत ही मुश्किल था क्यूंकी वो हर जगह चिपकता था, मगर यही तो उसका मज़ा था!

देर शाम हो गई थी और हिरण्मई और भानुप्रिया अब थक गई थीं। घर जाते-जाते वो अपने मम्मी-पापा से लिपट कर सो गईं और अगली छुट्टियों के सपने देखने लगीं।

शब्दार्थ

  • गिरोह: एक समान लोगों की भीड़
  • थरथराते: काँपते

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मेरठ के पन्ने
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