जंगल में झील किनारे, रहता था मेंढक एक

एक दिन पत्थर पे लेटे, धूप रहा था सेक

दिन की सुनहरी धूप में, सपने रहा था बुन

कभी किसी से उसने, ये कहानी रखी थी सुन

एक था मेंढक और एक राजकुमारी

बड़ी ही सुंदर, बड़ी ही प्यारी

बाग़ीचे में एक दिन, जब वो खेल रही थी गेंद

गिरी नदी में उछल कूद के, उसकी नटखट गेंद

मेंढक का सपना

उसी नदी में रहता था मेंढक,

झटपट उस ने ली गेंद लपक

मेंढक ने दी पानी से गेंद निकाल,

और दोस्ती के लिए बढ़ाया हाथ

राजकुमारी हुई ग़ुस्से से लाल,

नहीं भाया मेंढक का साथ

मार दिया मेंढक पर पत्थर,

लहूलूहान हो गया उसका सिर

देख उसे फिर दया थी आयी,

उसको चूमा और सहलायी

मेंढक बन गया फिर राजकुमार,

राजकुमारी को हो गया उससे प्यार

लेटे लेटे मेंढक ये सोचे

काश मेरे संग भी ऐसा हो जाए

राजकुमारी पत्थर मारे, फिर प्यार जताए

हाथों से वो मुझे उठाए,

चूमे प्यार करे और सहलाए

मैं भी बन जाऊँ एक सुंदर राजकुमार,

राजकुमारी संग बसाऊँ अपना संसार

सपने में था पूरा खोया,

आधा जागा आधा सोया

होश उड़ गए जब वो जागा

बड़ी ज़ोर से तब वो भागा

आफ़त खड़ी हुई थी सिर पर

सामने बैठा था एक अज़गर

अजगर बोला जाग गए तुम,

हो गयी तुमसे भेंट

बड़े दिनों के बाद मिलेगा,

मुझको खाना भर पेट

मेंढक ने फैलायी अपनी लम्बी टाँग

और पानी में लगायी ज़ोर से छलाँग

मन में सोचे, जान बची तो शुक्र मनाए

ऐसा सपना कभी ना आए।

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