एक छोटे से कमरे में बैठकर निष्पाप कुछ लिखने में तल्लीन है। तभी एक वृद्ध ने भीतर आकर कहा, “बेटा, तेरी दादी को बुखार चढ़ा है, ज़रा चल तो।” लेखनी वहीं रखकर वह तुरन्त खड़ा हो गया और अपनी बस्ती को इन बाबा के साथ चल दिया। दरवाज़े तक आया ही था, कि जेब में हाथ डालकर कुछ देखा, वापस लौटा और एक पुस्तक खोलकर उसमें से कुछ रुपये जेब में डाल लिए। वह बाबा के साथ चल दिया और रात भर अम्मा के पास बिताकर सुबह अपने कमरे में आया।

गम्भीर प्रकृति, शान्त चित्त, स्वच्छ अंतःकरण का यह युवक, जिसका हृदय सदा भावनाओं से ओत-प्रोत रहा करता है। इसका जीवन स्वयं के लिए नहीं है, प्रत्युत मानो हर साँस यह औरों के लिए जी रहा है। भावुक प्रकृति, भरी-भरी आँखें, नम्रता व दीनता का प्रतीक, गौर वर्ण, मुख पर लावण्य युक्त आभा – इन्हीं सबके द्वारा इस ‘निष्पाप’ नामक युवक का यत्किंचित वर्णन किया जा सकता है।

सही है, इसके माता-पिता के द्वारा इसका यह नाम सम्भवतः ईश्वर ने ही रखवाया होगा। रोज सुबह उठकर एक बार मन्दिर जाना निष्पाप का नियम था, लेकिन इसे देखकर लगता है मानो स्वयं इसके शरीर में मन्दिर बना लेना मन्दिर के भगवान् का नियम था। छोटी उम्र में माता-पिता का साथ छूटने के बाद से इसके आदर्शों ने ही इसका साथ निभाया है, या ये कहना भी गलत नहीं होगा कि इसने अपने आदर्शों का बड़ी निष्ठा के साथ साथ निभाया है। २५ साल की अपनी उम्र में इसने बहुत कुछ देखा है। कभी दरिद्रता ने इसका दामन पकड़ा, तो कभी अपमान ने सताना चाहा, कभी भूख ने इसे तोड़ना चाहा, तो कभी अपने ही परिवारजनों के दिए घावों ने वार किये, लेकिन समय बता रहा है कि यह आज भी अपने आदर्शों के साथ उन्नत मस्तक होकर विजयीश्री का वरण किये हुए है। आपको कदाचित् आश्चर्य हो कि आज यह बहुत धनी है, धन से नहीं अपितु अपने अनमोल विचारों से। ईश्वर ने इसे अद्भुत् लेखन क्षमता दी है।

कमरे में लौटकर देखा, किताब में कुछ रुपये बाकी थे, जेब में ख़त्म हो चुके थे। आज के भोजन की कोई व्यवस्था नहीं थी। नहाकर, बचे हुए कुछ रुपये लेकर बाहर निकला और हमेशा की तरह जाकर ढाबे वाले से भोजन लिया। हाथ में पत्तल लेकर बैठने ही वाला था कि सड़क के दूसरे किनारे दो छोटे बच्चों को अपनी तरफ बड़ी आशा भरी नजर से देखते हुए पाया। निष्पाप ने जाकर वह भोजन उन दोनों भूखे बच्चों को दे दिया। और पेट से असन्तुष्ट किन्तु मन से सन्तुष्ट होकर वापस कमरे पर लौट आया।

कुछ देर अध्ययन में लग गया क्योंकि परीक्षा नजदीक आ रही थी। फिर अपना एक लेख लेकर आगे को कहीं कदम बढ़ा दिए। कुछ सोचता, धीरे-धीरे क़दमों के साथ वह एक पुस्तक-विक्रेता की दुकान पर पहुँचा। विक्रेता ने कहा, “आ, आ निष्पाप, बोल इतनी जल्दी कैसे वापस आ गया?” निष्पाप बोला, “तुझसे काम आ पड़ा दोस्त”। विक्रेता ने कहा, “क्या यार, दोस्त भी बोलता है और पैसे लेने के लिए अपने लेख मुझे बेचता है”। निष्पाप बोला, “इस बारे में अपनी काफी बहस हो चुकी है, तू जानता है, मैं ऐसे पैसे नहीं ले सकता चमन”। चमन ने कहा, “अच्छा तो उधार तो ले सकता है”। निष्पाप ने जवाब दिया, “ना चमन, ज़िन्दगी का क्या भरोसा, कल रहे ना रहे। आज तुझसे उधार ले लूँ और कल वापस चुकाने को बचूँ ही ना तो। ये बोझ लेकर तो मैं चैन से मर भी ना सकूँगा”। चमन दोनों हाथ जोड़कर बोला, “चल रहने दे तेरे ये आदर्श, ले चाय पी”।

दोनों साथ चाय पीने लगे। चमन ने पूछा, “बता कितने पैसे चाहिए?” निष्पाप बोला, “इस लेख के कितने बनते हैं, वो दे दे”। चमन ने १००० रुपये पकड़ते हुए कहा, “यार तू परसों ही तो लेकर गया था १५०० रुपये, सब उड़ा डाले क्या?” निष्पाप एक निश्छल मुस्कराहट के साथ बोला, “उड़ जाते हैं, लगता है पहले कभी लक्ष्मी जी से बैर रखकर आया हूँ, तो मेरे पास आती तो है पर रहती नहीं”। दोनों की हँसी ने वातावरण में मानो महक भर दी। निष्पाप उठते हुए बोला, “अच्छा तो दोस्त चलूँ”। चमन ने हाथ पकड़कर कहा, “बैठ ना, ऐसी क्या जल्दी है, भोजन करके जाना”। निष्पाप बोला, “नहीं चमन, रोज-रोज ये तेरा इस तरह भोजन कराना नहीं सह सकूँगा।” चमन ने कुछ डाँटते हुए कहा, “चुपचाप बैठ और भोजन कर, भाषणों से पेट नहीं भरता।”

आखिर चमन ने उसे भोजन कराकर ही भेजा। निष्पाप अपने अगले लेख की सोच में नदी किनारे विचारों में डूबा हुआ चला जा रहा है। रास्ते का ठीक से कुछ पता नहीं। होश हुआ जब वह एक सूट-बूट धारी युवक से टकराया। युवक बोला, “निष्पाप!” निष्पाप ने भी पहचानते हुए कहा, “अर्थ, तू!?” अर्थ बोला, “अरे ये क्या हाल बना रखा है, कैसा है तू? स्कूल के दिनों के बाद आज दिखा है।” निष्पाप नेकहा, “हाँ, मैं अच्छा हूँ। तू बता तू कैसा है?” अर्थ ने अपने वस्त्रों की ओर देखते हुए कहा, “बस मौज है, जीवन का आनन्द ले रहा हूँ। खूब पैसा कमाता हूँ। (हँसते हुए) जैसे भी मिल जाए, जो भी मिल जाए, सब अपना ही है”। निष्पाप मुस्कुराते हुए उसके कंधे पर हाथ रखते हुए बोला, “क्यों भाई, ईश्वर का डर-वर है या नहीं तुझे?” अर्थ ने हँसते हुए कहा, “डर को खरीदकर जेब में रखकर घूमता हूँ”। निष्पाप बोला, “बड़ा अमीर हो गया रे, जो डर को भी खरीद लिया।” अर्थ कहने लगा, “और तू बता, तेरी वो सच्चाई, ईमानदारी, सब सही-सलामत है या डूब गयी जीवन के प्रवाह में?” निष्पाप ने जवाब दिया, “ये सब कोई मेरा साथ छोड़ते ही नहीं हैं, क्या करूँ। तो मैं भी साथ निभाए जा रहा हूँ।” दोनों हँस पड़े।

अर्थ बोला, “एक बात बता निष्पाप, तू कहता है सत्य पर चलना चाहिए, तुझे क्या मिला इससे? और मैं मौज करता हूँ, मैंने क्या खोया? इसका जवाब दे मुझे। और फिर मरने के बाद तो कौन जाने कोई न्याय करने वाला है भी या नहीं। अब तू ही बता, क्या सही है”। निष्पाप ने कुछ गम्भीरता के साथ कहा, “तेरे सवाल का जवाब दूँगा दोस्त, आज नहीं, फिर कभी।” दोनों अपने-अपने रास्ते चल पड़ते हैं।

घर तक पहुँचते-पहुँचते शाम हो गयी। दिन भर का भोजन एक ही बार में करके वो जब शाम तक घर पहुँचा तो उसे अपने नए लेख के लिए विचार मिल चुके थे। पहले जाकर दादी को दूध दिया, फिर कमरे में नीचे बिछे बिस्तर पर जाकर अपने वफादार दोस्त कागज और कलम को पकड़ा। पूरी रात लिखता रहा।

Mujhe Pashtachap Nahin Hoga

सुबह सूरज की पहली किरण के साथ उसका लेख “मुझे पश्चात्ताप नहीं होगा” पूरा हुआ।

दरवाजे पर जब किसी ने खटखटाया तो पता चला कि बस्ती में एक अकेली रहने वाली विधवा माई का देहान्त हो गया। कल मिले पैसे आज उसकी अन्त्येष्टि में खर्च हो गए। कुछ देर दादा-दादी के पास बात करके, वह रात वाला लेख लेकर चमन के पास पहुँचा।

चमन बोला, “आ निष्पाप, ला दे तेरा अगला लेख। लेकिन दोस्त पैसे कल लेकर जाना।” निष्पाप ने कहा, “कोई बात नहीं”। लेख देकर वह चला गया। मगर जब अगले दिन वहाँ पहुँचा तो चमन वहाँ नहीं था। रोज निष्पाप आता रहा, लेकिन चमन नहीं मिला।

महीने भर बाद चमन उसके घर आया, एक पत्र के साथ। निष्पाप को वह पत्र देते हुए बोला, “ले राष्ट्रपति महोदय ने तुझे बुलाया है।” निष्पाप ने आश्चर्य से कहा, “क्या बोल रहा है!, पागल हो गया है?” चमन ख़ुशी से झूमता हुआ बोला, “पता है निष्पाप, हुआ क्या? जब तू मुझे लेख देकर गया तो अगले दिन मैं तेरे सारे लेखों की एक पुस्तक बनवाकर बेचने की सोच रहा था। लेकिन जाने क्यों, रात को तेरा वो लेख पढ़ने बैठ गया। ओह! तूने मेरे जीवन की दिशा बदल दी यार!” निष्पाप बोला, “पर हुआ क्या, बताएगा भी, या हूँ ही गोल-गोल घूमता रहेगा? और मुझे भी घुमाता रहेगा।”

चमन अपनी मस्ती में बोले जा रहा था, “मैंने पढ़ा। तूने एक सवाल का जवाब लिखा कि तुझे सत्य की राह पर चलकर क्या मिला। मरने के बाद कौन जाने कोई न्याय करने वाला होगा भी या नहीं। आहा! क्या लिखा है तूने। तो साहब निष्पाप जी लिखते हैं कि ….’मैं नहीं जानता मरने के बाद कोई स्वर्ग या नरक हैं या नहीं। मैं इस बात का दावा नहीं करता कि मरने के बाद कोई न्याय करने वाला सच में है या नहीं। पर इतना जानता हूँ कि अगर कोई न्यायकर्त्ता नहीं हुआ तो भी मुझे मेरे जीवन पर पश्चात्ताप नहीं होगा। लेकिन अगर न्यायकर्त्ता हुआ तो जो गलत कार्य करते हैं उनका क्या होगा, वे अपना हश्र सोच लें। मुझे तो दोनों ही स्थितियों में कोई पश्चात्ताप नहीं होगा। और इस जीवन में भी मैं संतुष्ट हूँ, खुश हूँ कि मैं जो कर सकता था, मैंने किया। मैंने अपनी तरफ से सर्वोत्तम किया। इसलिए सच के रस्ते पर चलने में, अच्छा काम करने में नुकसान कुछ नहीं है’।” निष्पाप चुपचाप सुन रहा था और देख रहा था उसके निष्पाप जीवन का असर!

चमन बोला, “दोस्त, तेरे निर्मल जीवन ने, तेरी लेखनी ने मेरे जीवन की दिशा को नया मोड़ दिया और मैंने सोचा कि मैं कुछ तेरी तरह चलने की कोशिश करता हूँ। और मैंने तेरे लेखों को बेचने की जगह उन्हें राष्ट्रपति महोदय को दिखाया। जानता है उन्होंने उसे पढ़कर क्या कहा? वो बोले ‘मैं चाहता हूँ, इन लेखों को पढ़कर एक नहीं, कई चमन खिल जाएँ।’ और उन्होंने तुझे बुलाया है, वो तुझसे मिलना चाहते हैं निष्पाप।”

चमन ख़ुशी से झूमता हुआ बोल रहा था, “मैं आज अपने को बहुत हल्का, बहुत खुश और बहुत भाग्यशाली महसूस कर रहा हूँ। ऐसे कई चमन खिल उठें। मुझे भी अब कोई ‘पश्चात्ताप नहीं होगा’।”

 

शब्दार्थ

  • निष्पाप – पाप-रहित
  • यत्किंचित – थोड़ा बहुत
  • अन्त्येष्टि – अंतिम संस्कार
Wake Up! (Kai Engel) / CC BY 4.0
मुझे पश्चात्ताप नहीं होगा
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