Mitti Ka Diya

मिट्टी का दीया हूँ, तो फिर क्या हुआ?

रोशनी को तो मैंने भी सभी को दिया,

बदलते वक़्त की बदलती तक़दीर हूँ मैं,

तभी तो शब्दों में बिखर रहा हूँ यहाँ।

मोमबत्ती और लड़ियों से कभी रहा न द्वेश मेरा,

फिर लोगों ने क्यों छोड़ा साथ मेरा?

अमीर और ग़रीब में फ़र्क़ न समझा कभी,

चमक हर आँगन में बिखेरी एक जैसी,

पर क़सूर कहाँ है मेरा कोई तो बताये?

अब याद क्यों नहीं आता हूँ मैं दिवाली के पर्व पर,

मुबारक हो, खेल-खिलौने और मिठाई वाला त्यौहार,

भुलाना न मुझको आप अबकी बार।

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मिट्टी का दीया
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