निहाल और नाम्या स्कूल से घर लौट रहे थे। बस स्टॉप पर आइसक्रीम वाले को देखकर नाम्या का मन ललचा गया और उसने एक आइसक्रीम खरीद ली। फिर दोनों भाई-बहन बस में बैठ गए। बस में किसी बच्चे का आज जन्मदिन था इसलिए वो सभी को केक बाँट रहा था। नाम्या ने झट से केक का एक बड़ा सा टुकड़ा अपने लिए उठा लिया। निहाल को खाने पीने का इतना शौक नहीं था, पर नाम्या को खाने से बहुत लगाव था। उसे तरह तरह की स्वादिष्ट चीजें खाने की इच्छा हमेशा होती रहती थी।

घर पहुँच कर दोनों बच्चे कपड़े बदलने लगे और इतनी देर में उनकी मम्मी ने खाना लगा दिया। टेबल पर पहुँचते ही नाम्या का मुँह बन गया, “ये क्या मम्मी, फिर से दाल-चावल और हरी सब्जियाँ”। “पर बेटा, ऐसा ही संतुलित और पौष्टिक खाना रोज़ खाना चाहिये, उसी से हमारा शरीर स्वस्थ रहता है”। “मुझे तो पिज्जा, बर्गर और नूडल्स अच्छे लगते हैं, आप ये सब कभी नहीं बनाती”। निहाल मन ही मन मुसकुराते हुए अपना खाना खाने लगा। ये उसके घर की रोज़ की कहानी थी। मम्मी और नाम्या में अक्सर ऐसी बहस होती थी। सभी जानते थे कि मम्मी का कहना बिलकुल सही है, खाने में ऐसे तत्व होने चाहिए जो शरीर को सही पोषण दे। पर नाम्या को हमेशा चटर-पटर खाने की इच्छा होती थी। उसका हमेशा ऐसे बेवक्त और बेहिसाब खाना उसके स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचा रहा था।

शाम को पार्क में खेलते समय भी निहाल ने ध्यान दिया था, नाम्या भागने वाले खेल बिलकुल नहीं खेल पाती थी। तुरंत ही थक जाती और बैठकर सारी शाम अपनी सहेलियों से बस बातें करती रहती। हाँ, पार्क के सामने चाट-पकौड़े वाले को देखते ही वह भागकर उसके पास ज़रूर पहुँच जाती।

रात को खाने की टेबल पर फिर वही कहानी चल पड़ी। मम्मी ने आज हरे और लाल रंग की रोटियाँ बनायी थी, पालक और चुकंदर की मदद से। वह बेचारी भरसक कोशिश करती थी खाने को थोड़ा अलग रूप-रंग में परोसने की, जिससे नाम्या को वह अच्छा लगे। पापा रंगीन रोटियाँ देखकर हँसने लगे। उन्होंने सभी को बताया की विज्ञान की एक नयी शाखा का नाम है ‘न्यूरोगॅसट्रोनोमी’। इसमें मनोवैज्ञानिक, न्यूरो वैज्ञानिक, डॉक्टर और शेफ़ लोग मिलकर विभिन्न प्रयोग कर रहे हैं कि किस प्रकार भोजन के स्वाद, गंध, रंग व प्रस्तुति से उसे और अधिक रुचिकर बनाया जा सके। निहाल को विज्ञान विषय से विशेष लगाव था। पापा की बातें उसे बहुत रोचक लगीं।

machini pakvaan

दिन बितते गए। निहाल एक दिन बड़ा वैज्ञानिक बनने का सपना लेकर विज्ञान की किताबों और विश्लेषण में डूबा रहता। कभी ये मशीन बनाता तो कभी वो मशीन की ड्राइंग। कभी-कभार प्रयोगों में कुछ ज़्यादा तोड़-फोड़ हो जाती तो पापा-मम्मी से डांट भी पड़ती थी। पर निहाल अपनी धुन में लगा रहता। इधर नाम्या के भी दिन कुछ न कुछ खाते हुए बीत रहे थे। शहर में आजकल विभिन्न देशों के नए-नए होटल खुल गए थे, जहां उनकी भाषा के अजीबो-गरीब नाम और स्वाद वाले पकवान मिलते थे। नाम्या को हर रोज़ नए होटल में जाने का बहाना मिल गया था, वह कभी थाई तो कभी मेक्सिकन खाना खाकर आती और सब को बताती।

नाम्या और निहाल के चाचा की शादी होने वाली थी और सभी उसमें जाने को उत्साहित थे। वो लोग नये कपड़े लेने एक दुकान में गए थे। “ज़रा सोचो भईया, वहाँ कितने तरह की खाने की चीज़ें बनेगी, कितना मज़ा आएगा”, चिप्स मुँह में डालते हुए नाम्या बोली। “हे भगवान, इस लड़की को खाने के सिवाय कुछ नहीं सूझता”, मम्मी गुस्से से बोल उठी। निहाल ने शांत स्वर में कहा, “इसे ‘कम्पल्सिव ओवरइटिंग’ की बीमारी है”। मम्मी हैरान हो गयीं, “क्या बताया, क्या बीमारी है?” निहाल ने समझाते हुए बोला, “इसके लिए खाना शरीर चलाने के लिए नहीं है, बल्कि एक नशे की आदत जैसे है। यह कुछ न कुछ खाती रहती है, अपनी भावनाओं और रोज़ की दिक्कतों से दूर रहकर अपने दिमाग को बहलाये रखने के लिए”। तभी नाम्या कपड़े लेकर ट्रायल रूम से रोते हुए बाहर निकली, “कोई कपड़ा फिट नहीं आ रहा है! मैं इतनी मोटी जो हो गयी हूँ”। सभी ने मिलकर बड़ी मुश्किल से नाम्या को एक्सट्रा साइज़ के कपड़े ढूँढकर दिये। पूरे रास्ते नाम्या उदास रही। पर घर पहुँचते ही फ्रीज़ से पेस्ट्री निकालकर खाने बैठ गयी। मम्मी ने एक गहरी सांस छोड़कर धीरे से निहाल से कहा, “तुम्हारे विज्ञान में इसके दिमाग का कोई समाधान नहीं है?” निहाल मम्मी से कह न सका की इसे किसी मनोचिकित्सक के पास ले चलते हैं। उसे पता था की यह सुनते ही घर में कोहराम मच जाएगा।

निहाल अब न्यूरोगॅस्ट्रोनोमी के विभिन्न पहलुओं पर विचार कर रहा था। मम्मी की कही हुई बातें उसके कानों में गूंज रही थी, “दिमाग का समाधान – दिमाग का समाधान”। हम जब भी कुछ खाते हैं तो जीभ, आँख, नाक और पेट मिलकर दिमाग के एक ख़ास हिस्से में सिग्नल भेजते हैं जिससे हमें स्वाद और मात्रा का ज्ञान होता है और संतुष्टि मिलती है। कैसा हो अगर हम दिमाग में जाने वाले सिग्नल्स को ही सीधे बदल दे। इस नए विचार के सूझते ही निहाल दुगुने जोश के साथ प्रयोगों में जुट गया। देर रात तक वह इंटरनेट, पुस्तकों और मशीनी कल-पुर्जों में उलझा रहा और फिर कब उसकी आँख लग गयी उसे पता ही न चला।

आख़िर निहाल ने कर दिखाया। उसने एक ऐसी मशीन तैयार की थी जिससे सीधे नये सिग्नल्स बनाकर दिमाग को भेजे जा सकते थे। मशीन में ऐसी व्यवस्था थी की अलग-अलग मीठा, नमकीन, खट्टे, कड़वे जैसे स्वादों के मनचाहे मिश्रण वाले व्यंजन बनाये जा सकते थे। और चूंकि यह मशीन सिर्फ सिग्नल बनाकर भेजती थी, तो मशीन लगाने वाले इंसान को दिनभर खाने के सिग्नल भेजने के बाद भी कोई मोटापा नहीं होता। निहाल के परिवार की खुशी का ठिकाना न था। उन्होंने वो मशीन नाम्या को लगा दी थी। निहाल की इस अभिनव ख़ोज के लिये एक बहुत बड़े वैज्ञानिक संस्था ने पुरस्कार घोषित किया था जिसे लेने के लिये वह विदेश गया था। बहुत बड़ा सम्मान समारोह था जहाँ विश्व के कई जाने-माने वैज्ञानिक आए थे। वे सभी निहाल को बधाइयाँ दे रहे थे। निहाल ने विदेश से मम्मी, पापा और नाम्या के लिये बहुत सारे उपहार खरीदे थे। नाम्या के लिये वहाँ की प्रसिद्ध पोशाक भी ले ली थी, और अब एक्सट्रा लार्ज साइज़ लेने की जरूरत भी नहीं रह गयी थी।

सभी उपहारों और विदेश के अनुभवों के साथ निहाल घर लौट रहा था। वह अपने परिवारवालों से मिलकर उनसे अपनी खुशियाँ बाँटने के लिये बेचैन था। पर यह क्या, घर पहुँच कर निहाल ने देखा वहाँ एक अजीब सा सन्नाटा फैला हुआ था। घर पर कोई नहीं था। सब अचानक कहाँ चले गए? इधर–उधर आवाजें लगाकर जब निहाल थक गया तो वह पड़ोस के अंकलजी से पूछने गया। वहाँ से पता चला की सभी अस्पताल गए हैं। “अस्पताल? किसकी तबीयत ख़राब हो गयी?” निहाल ने ये पूछते हुए मन ही मन सारी संभावनाएं टटोली। पापा को दिल का दौरा पड़ा क्या, पर अभी इतने बूढ़े तो नहीं हुये हैं पापा। तो फिर क्या मम्मी को कुछ हो गया? नहीं, वो तो काफ़ी ध्यान रखती हैं अपने स्वास्थ्य का। फिर किसे क्या हुआ? “नाम्या की तबीयत अचानक बहुत बिगड़ गयी थी, उसे ही लेकर सभी अस्पताल गए हैं”, अंकलजी की आवाज़ आयी निहाल को। उनसे अस्पताल का नाम पूछकर किसी तरह गिरते-पड़ते वह वहाँ पहुँचा।

वहाँ का दृश्य बहुत ही डरावना था। नाम्या बिलकुल कृशकाय सी बिस्तर पर लेटी हुई थी। अगल बगल बहुत सारी मशीनें लगी हुई थीं और पास ही कई बोतलें लटकी हुई थीं, जिनसे नाम्या के शरीर में दवाएँ भेजी जा रही थीं। निहाल को देखते ही मम्मी उससे लिपट कर रोने लगी। “नाम्या को क्या हुआ मम्मी?” घबराए हुए निहाल ने पूछा। “एकदम से बेहोश होकर गिर पड़ी थी। तो यहाँ लेकर आना पड़ा”, पापा ने जवाब दिया। “डॉक्टर कह रहे हैं कि पोषण की कमी से शरीर की ताकत बिलकुल ख़त्म हो गयी है”, मम्मी हिचकते हुए बोली। “पोषण की कमी? दिन भर खाते रहने वाली नाम्या को पोषण की कमी कैसे हो सकती है?” निहाल चौंका।

“आपकी बहन के शरीर में पौष्टिक तत्वों की बहुत कमी हो गयी है। ज़िंदा रहने की ऊर्जा भी थोड़ी ही बची है। इतने दिनों से इन्होने कुछ खाया नहीं है। ऐसा तो होना ही था”, पीछे से डॉक्टर साहब निहाल को समझाकर बोले। “लेकिन ऐसा हुआ कैसे?” निहाल को अभी भी कुछ समझ नहीं आ रहा था। “तुम्हारी मशीन नाम्या को इतनी पसंद आ गयी थी की वह दिनभर उसी पर अलग अलग तरह के स्वादिष्ट पकवान बनाते रहती और दिमाग को खाने का सिग्नल भेजती रहती। उस मशीन में स्वादों के मिश्रण से ऐसे अनोखे नये स्वाद बन जाते थे की वह उनमें ही डूबी रहती, और असली खाना खाना भूल जाती थी। हमने भी खुशी-खुशी में ज़्यादा ध्यान नहीं दिया। ये सब हमारी लापरवाही की वजह से हुआ है”, पापा ने पूरी बात बता डाली। “नहीं पापा, मैं अगर ऐसी मशीन नहीं बनाता तो ये सब नहीं होता। सारी गलती मेरी है”, कहते हुए निहाल का गला भर आया। तभी मम्मी की ज़ोरदार आवाज़ आयी, “अरे नाश्ता ठंडा हो रहा है, अब जल्दी से उठ जाओ निहाल! वरना स्कूल के लिये लेट हो जाओगे”।

निहाल हड़बड़ा कर उठ बैठा। सामने रखी किताबें और कम्प्युटर उसे मुंह चिढ़ा रहे थे। “तो ये मशीन एक सपना था”, निहाल कुछ सोचते हुए तुरंत तैयार होने लगा। उसे स्वाद की दीवानी नाम्या को जल्द से जल्द पौष्टिक और उचित आहार के बारे में जो बताना था। जीवन में सही भोजन के महत्व को वो अच्छी तरह से समझ गया था।

शब्दार्थ

  • पौष्टिक : सही पोषक तत्वों से भरपूर
  • समाधान : उपाय, हल
  • अभिनव : नया, अनूठा
Background music: Sunset (Kai Engel) / CC BY 4.0
मशीनी पकवान
Average rating of 3.4 from 5 votes

Leave a Reply

Loading...