अगस्त महीने का अंतिम सप्ताह चल रहा था। बरसात करीब-करीब खत्म सी हो गयी थी। रात्रि का समय था। कक्षा सात में पढ़ने वाली चारु, हल्की सी चादर ओढ़कर सोने की तैयारी करने लगी। लेकिन उसे अपनी तबीयत कुछ भारी-भारी सी लग रही थी। थोड़ी देर बाद वह अचानक काँपने लगी। उसने अपनी मम्मी को आवाज़ दी। मम्मी ने काँपती हुई चारु को एक रज़ाई ओढ़ा दी। थोड़ी देर बाद चारु का काँपना तो बंद हो गया, लेकिन उसे तेज बुखार चढ़ आया। फिर चारु के पापा ने, जो कि एक डॉक्टर हैं, चारु को कुछ दवायें, दूध के साथ खाने के लिए दीं। उसके बाद चारु आँखें बंद करके सोने की कोशिश करने लगी। जल्दी ही उसे नींद आ गयी।

सोती हुई चारु को एक सपना आया। सपने में उसने देखा कि एक मच्छर आकर उसके हाथ पर बैठ गया और बोला, “चारु बहिन, अब कैसी तबियत है तुम्हारी?”

“पहले से अच्छा महसूस कर रही हूँ।” चारु ने कहा।

मच्छर फिर बोला, “तुम्हें जो जाड़ा लगकर बुखार चढ़ा ना, वह हम मच्छरों के काटने से होता है। इस तरह के बुखार को मलेरिया कहते हैं।”

“मच्छर जी, आपको हमें काटने से क्या फायदा? न आप हमें काटें और न इस तरह का बुखार फैले।” चारु ने कहा।

मच्छर ने थोड़ा सोचा और बोला, “अगर हम मनुष्यों को न काटें तो हम जीवित नहीं रह सकते। हम मनुष्यों की खाल काटकर उनका खून चूसते हैं, जिसके सहारे हम जीवित रहते हैं। एक रोचक बात यह है कि, हम लोगों में सिर्फ मादा मच्छर ही खून चूसती है, नर मच्छर तो फूलों व फलों का रस चूसकर ही जीवनयापन करते हैं। अतः ये मलेरिया जैसी बीमारियाँ मादा मच्छर के काटने से ही होती हैं।”

जिज्ञासावश, चारु ने अपने हाथ पर बैठे मच्छर से पूछा, “मादा मच्छर ही क्यों खून चूसती है, नर मच्छर क्यों नहीं?”

यह सुनकर मच्छर बोला, “क्योंकि मादा मच्छर में ही खाल काटने के लिए आरी जैसे दाँतेदार अंग होते हैं। इन दाँतेदार अंगों का प्रयोग करके खाल काटने के बाद मादा मच्छर खोखली नली जैसी चूषक अंगों से तुम मनुष्यों का खून चूस लेती है।”

“खोखली नली जैसी चूषक अंग? मतलब?” चारु ने पूछा।

“जैसे कल तुमने स्ट्रॉ से कोल्ड-ड्रिंक पी थी ना, कुछ कुछ वैसे ही।” मच्छर ने समझाया।

“इसका मतलब आप लोगों में नर मच्छर शाकाहारी होते हैं और मादा मच्छर मांसाहारी!” चारु ने हँसते हुए कहा।

ये सुनकर मच्छर भी मुस्कुराने लगा।

चारु ने फिर पूछा, “अक्सर आप लोगों की तुलना मक्खी से करी जाती है, इसका क्या राज है?”

मच्छर ने बताया, “मक्खी की तरह हम भी कीट जाति (इन्सेक्टा स्पीशीज़) के प्राणी हैं। उनकी तरह ही हमारे भी तीन जोड़ी टाँगें और दो जोड़ी पंख होते हैं। हम मक्खी-मच्छरों के पिछले जोड़ी पंख बहुत छोटे होते हैं, अतः उड़ने का सारा कार्य अगले जोड़ी (आगे के) पंख ही करते हैं। उड़ते समय हमारे पंख एक सेकेंड में कई सौ बार फड़फड़ाते हैं। इसी वजह से हम में से ‘भन्न-भन्न’ (भिनभिनाने) की आवाज़ आती है।”

चारु बोली, “मच्छर जी, आपका जीवन काल कितना होता है? क्या आप भी हमारी तरह कई वर्ष जीते हैं?”

“नहीं चारु बहिन, हम वयस्क मच्छरों का जीवनकाल तकरीबन तीन से चार हफ्तों का होता है। हम लोग अपने अंडे ठहरे हुए पानी या कहीं रुके हुए पानी में देते हैं जो सैकड़ों की संख्या में होते हैं। इन अंडों से लार्वा (इल्ली) व लार्वा से प्यूपा (कोकून) बनता है। प्यूपा से फिर मच्छर बनने में लगभग चार-पाँच दिन लग जाते हैं। अंडे से पूरा मच्छर बनने में करीब दस-बारह दिन तो लग ही जाते हैं।” मच्छर ने विस्तार से बताया।

“मच्छर जी, शुरू में आपने बताया था कि मादा मच्छर के काटने से मलेरिया नाम की बीमारी हो जाती है। यह कैसे होती है?” चारु ने पूछा।

मच्छर बोला, “हमारी एक प्रजाति ‘ऐनाफिलिज़’ की मादा मच्छर मनुष्य का खून चूसने के दौरान अपनी लार (थूक) के सहारे मलेरिया के वायरस (विषाणु) मनुष्य के खून में छोड़ देती है। इन वायरस के कारण ही जाड़ा लगकर बुखार हो जाता है और धीरे-धीरे खून की लाल रक्त कणिकायें कम होने लगती हैं। कुछ वर्षों पहले तक यह बीमारी बड़ी खतरनाक मानी जाती थी, लेकिन अब कुनैन से बनी दवाइयों, जैसे क्लोरोक्विन आदि, से इसका उचित इलाज हो जाता है।”

चारु ने उत्सुकता-पूर्वक पूछा, “क्या आपकी कुछ और भी खतरनाक प्रजातियाँ हैं?

“हाँ, हमारी कुछ प्रजातियाँ डेंगू बुखार, दिमागी बुखार (एनसिफेलाइटिस), फाइलेरिया और पीत ज्वार (येलो फीवर) जैसी घातक बीमारियाँ फैलाती हैं।” मच्छर ने कुछ गर्व के साथ बताया।

मच्छर ने आगे कहा, “मादा ऐडिज़ (Aedes) मच्छर के काटने से डेंगू बुखार जैसी गंभीर बीमारी हो जाती है जो कभी कभी जानलेवा भी होती है।”

“मच्छर देव जी, इन बीमारियों से बचने के कुछ उपाय बताने की अति कृपा करें?” चारु ने गुजारिश की।

“चारु बहिन, जैसे कि मैंने पहले कहा कि हम अपने अंडे ठहरे हुए पानी में देते हैं, अगर आप लोग अपने घर के आस-पास नालियों में पानी न रुकने दें, तो मच्छर पैदा ही नहीं होंगें। घर में लगे कूलरों का पानी भी हर दूसरे-तीसरे दिन बदलते रहना चाहिए। घर के आस-पास गड्ढों व टूटे-फूटे डिब्बों आदि में भी पानी इकट्ठा नहीं होना चाहिए। जहाँ नल लगा हो, वहाँ भी पानी की निकासी अच्छी होनी चाहिए। इस तरह ठहरे हुए पानी न मिलने पर हमारे अंडे नहीं बढ़ पाएंगे।

हमारे जन्म-स्थल समाप्त करने के साथ-साथ हमारे छिपने के स्थान, जैसे कुर्सी-मेज व पलंग आदि के नीचे, अलमारी के पीछे जैसी अंधेरी जगहों पर डी.डी.टी. और फ्लिट आदि के छिड़काव से भी हमें मारा जा सकता है। इसके अलावा भी हमें मारने और भगाने के अन्य बहुत से तरीके हैं। हमसे बचने के लिए सोते समय मच्छरदानी का इस्तेमाल करना चाहिए। इस तरह जब हमारी संख्या कम होती जाएगी तो धीरे-धीरे हमसे फैलने वाली बीमारियाँ भी कम होती चली जाएंगी।”

इतनी रोचक जानकारी देने के बाद मच्छर पहलवान भन्न-भन्न करते हुए उड़ गए।

तभी चारु के दिमाग में एक और प्रश्न आया और वह चिल्लाई, “मच्छर जी, सुनिए!” और उसकी नींद खुल गयी।

अगले दिन चारु अपने मम्मी पापा को यह कविता सुना रही थी-

मच्छर पहलवान हूँ,
मलेरिया, डेंगू व दिमागी बुखार की आन हूँ।
ठहरे पानी का मेहमान हूँ,
खून पीने को परेशान हूँ।
नाले-नाली साफ करो,
गड्ढों को मिट्टी से भरो।
गंदे पानी को न जमा करो,
मच्छरदानी बाँध के सो।

शब्दार्थ

  • जीवनयापन- जीवन बिताना या गुज़ारना
  • रोचक- मज़ेदार
  • जिज्ञासावश – उत्सुकतापूर्वक
Background music: John Stockton Slow Drag (Chris Zabriskie) / CC BY 4.0
मच्छर पहलवान
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