धीरज ने रोहन से पूछा कि क्या उसने विज्ञान के प्रोजेक्ट के लिए विषय चुन लिया है। रोहन ने हाँ कहा और धीरज को विषय का अंदाज़ा लगाने के लिए कहा।

रोहन ने उसे एक संकेत दिया कि उसका प्रोजेक्ट प्रौद्योगिकी और अंतरिक्ष, दोनों से संबंधित है और ये यह भी दिखाता है कि भारत अनुसंधान और नवाचार में कितना आगे निकल आया है। धीरज ने विषय के बारे में कुछ अंदाज़े लगाए और फिर बोला, “मैंने हार मान ली। तुम बताओ विषय क्या है।” रोहन ने धीरज से कहा कि वह मंगलयान पर एक प्रोजेक्ट बनाने जा रहा था। ये सुनकर धीरज बोला,”वाह! अच्छा है।”

तो क्या आप भी मंगलयान के बारे में जानना चाहते हैं?

मंगलयान या मार्स ऑर्बिटर मिशन (जो कि इसका अधिकारिक नाम है) एक छोटी कार के आकार का उपग्रह है। यह उपग्रह, मंगल ग्रह की कक्षा में प्रवेश करने के लिए, भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन, इसरो (ISRO) द्वारा बनाया गया है।

कक्षा वह नियमित और बार बार दोहराए जाने वाला पथ है जिसे ग्रह या उपग्रह अंतरिक्ष में किसी दूसरे खगोलीय पिंड के चारों ओर घूमने के लिए अपनाते हैं। सभी ग्रह सूर्य के चारों ओर एक काल्पनिक अंडाकार पथ में घूमते हैं जबकि उपग्रह (प्राकृतिक या मानव निर्मित) ग्रहों के चारों ओर घूमते हैं।

मंगलयान ‘मंगल ग्रह’ की कक्षा में प्रवेश करेगा और फिर इसके चारों ओर घूम कर बहुमूल्य डेटा एकत्र करेगा।

By Nesnad (Own work) [GFDL (https://www.gnu.org/copyleft/fdl.html) or CC BY-SA 4.0-3.0-2.5-2.0-1.0 (https://creativecommons.org/licenses/by-sa/4.0-3.0-2.5-2.0-1.0)], via Wikimedia Commons

जैसा कि हम सभी जानते हैं कि “मार्स” ग्रह को हिंदी में मंगल कहते हैं और “यान” का अर्थ है एक वाहन। इस प्रकार मंगलयान वास्तव में मंगल ग्रह के लिए एक वाहन है। मार्स ऑर्बिटर मिशन (एम ओ एम) ने २४ सितम्बर २०१५ को लाल ग्रह की परिक्रमा का अपना पहला साल पूरा किया है। इसरो के अनुसार मिशन १०० प्रतिशत सफल है और इसने अपनी यात्रा शुरू होने के बाद से मंगल ग्रह के चारों ओर १२० कक्षाओं को पूरा कर लिया है। सालों से इसरो द्वारा मंगल ग्रह के लिए एक मिशन के लिए अनुसंधान चल रहा था, हालांकि इस प्रोजेक्ट को अगस्त २०१२ में स्वीकृत किया गया।

एम ओ एम ने मंगल ग्रह तक की २०० मिलियन किलोमीटर की यात्रा ३०० दिनों में पूरी की, जिसमें २०-२५ दिन भी शामिल हैं जो इसने पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण खिंचाव को तोड़ने की तैयारी के लिए पृथ्वी की कक्षा में बिताए।

इसरो मंगल ग्रह तक पहुँचने में दुनिया की चौथी एजेंसी बन गई है। भारत पहला एशियाई देश है जो ऐसा करने में सफल हुआ है और अपने पहले ही प्रयास में मंगल ग्रह तक पहुंचने के लिए दुनिया में केवल एक है। ५१ मिशनों में से अब तक मंगल ग्रह के लिए केवल २१ मिशन सफल रहे हैं। मंगल ग्रह के मिशन के लिए भारत द्वारा किया गया खर्च अन्य देशों द्वारा समान मिशन पर किये गए खर्च का सिर्फ एक अंश मात्र है। भारत ने इस मिशन पर ४५४ करोड़ के करीब रुपये खर्च किए हैं जबकि संयुक्त राज्य अमेरिका की अंतरिक्ष एजेंसी, नासा (NASA) द्वारा, ४००० करोड़ रुपये खर्च किए गए।

बहुत सारे लोग इस मिशन पर इतना पैसा (जो कि अन्य देशों से खर्च की तुलना में काफी कम है) खर्च करने पर सवाल करते हैं, जबकि देश को इतनी सारी ज़मीनी स्तर की चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। एक बार अपनी जगह पर पहुँचने पर, मंगलयान वास्तव में क्या करने वाला है? हमें अपने पड़ोसी ग्रह ‘मंगल’ के बारे में क्या जानकारी मिलेगी और क्या यह जानकारी उपयोगी होगी?

मंगलयान पर जांच के लिए पांच वैज्ञानिक उपकरण हैं। यह बहुत सारा डेटा एकत्रित करेगा जिसका विश्लेषण न केवल मंगल ग्रह के बारे में जानने के लिए, अपितु सामान्य रूप से अंतरिक्ष के बारे में भी एक बेहतर समझ हासिल करने के लिए किया जाएगा। इसके अलावा अंतरिक्ष की यात्रा रोमांचक लगती है, चाहें यह एक फिल्म में हो या वास्तविकता में। यह विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में भारत के विकास का संकेत भी है।

उपग्रह में सौर ऊर्जा संचालित उपकरण लगाए गए हैं जो कि मंगल ग्रह की सतह की तस्वीर लेंगे। मंगल ग्रह की मिट्टी का अध्ययन करने के लिए इन चित्रों का विश्लेषण किया जाएगा। सतह के चित्र यह निर्धारित करने में मदद करेंगे कि ग्रह पर कभी पानी था या नहीं या फिर अभी भी इस ग्रह पर पानी के निशान हैं या नहीं। आमतौर पर यह माना जाता है कि मंगल ग्रह पर बर्फ के बड़े भंडार हैं, लेकिन कोई जल निकाय नहीं हैं। यदि मंगल ग्रह पर पानी पाया जाता है तो यह पृथ्वी के अलावा, ब्रह्मांड में पानी पाए जाने वाला एकमात्र ग्रह बन जाएगा।

मंगल कलर कैमरा (एमसीसी, MCC) द्वारा, मंगल ग्रह की परिक्रमा यान से भेजी गईं कुछ शानदार तस्वीरें।

मिट्टी और सतह के अलावा, मंगल ग्रह के वातावरण के बारे में भी अध्ययन किया जाएगा। उपग्रह से जुड़े उपकरण विभिन्न गैसों की उपस्थिति का पता लगाने की कोशिश करेंगे, यह निर्धारित करने के लिए कि जीवन और पानी कभी मंगल ग्रह पर मौजूद थे भी या नहीं। मंगल ग्रह पर मीथेन गैस की मौजूदगी और स्रोत का अध्ययन करने के लिए एक विशेष सेंसर है। एक अन्य अध्ययन मंगल ग्रह की सतह और वातावरण पर सौर विकिरण के प्रभाव के बारे में पता लगाने पर केंद्रित है।

इस मिशन का एक अन्य महत्वपूर्ण पहलू है – अंतर ग्रहीय स्थानिक क्षेत्र के लिए एक अंतरिक्ष यान भेजने में शामिल तकनीक के बारे में अध्ययन करना। इससे भविष्य में मंगल ग्रह पर, और उम्मीद है, कि अन्य ग्रहों पर भी कोई मिशन भेजने में मदद मिलेगी। हालांकि भारत ने पहले भी चंद्रमा पर सफल मिशन भेजा है, लेकिन यह अलग है क्योंकि यह पहला अंतर ग्रहीय मिशन है। प्राप्त जानकारी से, गहरे अंतरिक्ष संचार के विकास और भविष्य के मिशन और नेविगेशन की योजना बनाने में मदद मिलेगी।

रोहन ने कहा, “धीरज क्या तुम जानते हो कि मंगलयान के मंगल ग्रह पर पहुँचने पर उसका स्वागत क्यूरोसिटी रोवर (नासा के उपग्रह) द्वारा किया गया था?”

क्यूरोसिटी रोवर ने ट्विटर पर एक संदेश भेजा “नमस्ते, @मार्स ऑर्बिटर! बधाई @इसरो………..”

इसरो ने जवाब दिया, “कैसे हो @मार्स-क्यूरोसिटी? संपर्क में रहना। मैं आस-पास रहूँगा।”

मंगलयान के बारे में और भी बहुत कुछ है जो रोहन अपने प्रोजेक्ट में शामिल करेगा; यह सिर्फ एक छोटा सा अंश है।

अंग्रेज़ी में पढे

मंगलयान या मार्स ऑर्बिटर मिशन – भारत का मंगल ग्रह को “हैलो”
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