अर्जुन ने सिर पर बंधा तौलिया कुर्सी पर पटका और बड़बड़ाते हुए जूते उतारने लगा।

“का हुआ रहा भैया? इतने गुस्से में काहे हो?” भजनू उर्फ भजन लाल ने जल्दी से पानी का गिलास अर्जुन को पकड़ाया और पूछने लगा।

“अरे तुम नहीं समझोगे भजनू”

“काहे नाही समझेंगे। आप हमें पढ़ना–लिखना सिखाए, हम सीखा कि नाहीं? बताओ, बताओ”

“हाँ हाँ सीखा! तुम बहुत होशियार हो”, अर्जुन ने पीछा छुड़ाने के लिए भजनू की हाँ में हाँ मिलाई और नहाने के लिए बाथरूम की ओर लपका। इतने में कौलबेल बजी। भजनू ने दरवाजा खोला, सामने साहिल खड़ा मुसकरा रहा था।

“आओ भैया आओ, आप तो ठीक टैम पर आवत रहे”।

“क्यों क्या हुआ?”

“पता नाहीं, अर्जुन भैया कछु गुस्से मा हैं”

“कहाँ हैं महाशय?”

“यहीं हूँ और कहाँ जाऊंगा”, अर्जुन ने बाथरूम से झाँकते हुए कहा।

“सुबह–सुबह क्या हो गया सूरज की तरह तमतमाए हुए क्यों हो? वैसे ही इतनी गरमी है, ऊपर से इतना क्रोध! न बाबा न!”

“क्या करूँ यार! बस, जब किसी पर बस नहीं चलता तब अपने ऊपर ही गुस्सा आता है”।

“हाँ ये तो तुमने दुरुस्त फरमाया। पर गुस्से का कुछ कारण तो होगा ही!”

“वही पुराना अलाप – भारत रत्न किसे दिया जाए? मेजर ध्यान चंद का नाम किसी को याद ही नहीं आता”।

“हाँ भाई! तू ठहरा कालेज की हौकी टीम का कप्तान तुझे तो मेजर ध्यान चंद का नाम सुझाना जरूरी है”।

“नहीं ये बात नहीं। जिस व्यक्ति ने भारत का नाम विश्व में फैलाया… जिस व्यक्ति ने अकेले के दम पर ओलंपिक में एक नहीं, कई बार जीत दिलाई… हौकी को राष्ट्रीय खेल के स्तर तक पहुंचाया… उसके प्रति सरकार की इतनी उदासीनता बर्दाश्त नहीं होती”।

Bharat Ratna

“बात तो तुम ठीक कह रहे हो। जबकि नए–नए खिलाड़ियों को विभिन्न पदकों से नवाजा जाता है”।

“जिसके नाम से विदेशों में भी सड़कें और स्टेडियम बनाए गए हैं, जो विश्व स्तर का खिलाड़ी रहा, क्या हमारा उसके प्रति कुछ फर्ज नहीं बनता?”

“सुना है, मेजर ध्यान चंद का अंतिम समय बहुत गरीबी और बीमारी में गुजरा”।

“जब किसी को उचित पहचान नहीं मिलती, तो ऐसा ही होता है”, अर्जुन ने गहरी सांस लेते हुए कहा।

“तो क्या व्यक्ति माथे पर नाम लिखा कर चले?” साहिल ने पूछा।

“नाम भी लिखा लेगा तो उसे पहचानेगा कौन? जब कोई नाम के साथ जुड़े कार्य को ही नहीं जानता”।

“ओ भैया, हमें बताओ। हम सबका बताई का कोऊ लिखवान की जरूरत नाहीं”।

“हाँ यार, तू नहा ले। मैं भजनू को बता देता हूँ, वह सब सँभाल लेगा” साहिल ने हँसते हुए कहा।

“हाँ साहिल भैया, तुम्हीं बताओ आखिर हुआ का?”

“अरे हाँ! हौकी के एक जादूगर थे, अर्जुन उन्हीं के लिए परेशान है”।

“भैया काहे मज़ाक करत हो! जादूगर तो तरह–तरह के खेल दिखावत रहे, वह कोई हौकी थोड़े ही खेलत है”, भजनू ने पास आकर बैठते हुए कहा।

“देखो भजनू, यदि तुम चुपचाप मेरी बात सुनोगे तब तो मैं तुम्हें बताऊंगा। अन्यथा मैं भी जा रहा हूँ। तब तक अर्जुन भी नहा लेगा”।

“अरे रे भैया! नाराज न हो! ओ हम तो बस चाय बना के चुपचाप सुनेंगे और लिखेंगे”।

“लिखोगे भी!” साहिल ने आश्चर्य से पूछा।

“हाँ भैया, अब हम सब लिख लेत हैं। अपना नाम, माई का नाम, आपका नाम, अर्जुन भैया का नाम, गाँव का नाम, पता… सब लिख लेत हैं। अर्जुन भैया तो सिखाए रहे। हम आपको दिखाएँ…”

“अच्छा–अच्छा लिख लेना। पहले चाय बना लो”।

साहिल टेबिल पर रखा अखबार पलटने लगा। पहले पृष्ठ पर ही भारत रत्न के लिए सुझाए नामों पर चर्चा थी। कला, साहित्य, खेल, संगीत आदि के चर्चित चेहरों को भी दर्शाया गया था। वह इन्हें देख ही रहा था कि भजनू चाय लेकर आ गया।

“साहिल भैया, हौकी का खेल कितना लोग खेलत रहा? कब से खेलत रहा? तनिक हमें भी बताओ न!”

“भजनू बार–बार टोकना मत, तभी बताऊंगा”।

भजनू ने हाँ में सिर हिलाया।

“ग्यारह-ग्यारह खिलाड़ियों की दो टीमों के बीच यह खेल खेला जाता है। ये दोनों टीमें एक दूसरे के साथ हौकी से बॉल खेलते हैं और गोल में बॉल पहुंचा कर अपनी बढोत्तरी या जीत हासिल करते हैं। जो टीम ज्यादा गोल करती है, वही विजयी होती है। यह अकेले व्यक्ति का खेल नहीं, सारी टीम का खेल होता है। लेकिन अकेला व्यक्ति अपने कौशल से टीम के लिए बहुत कुछ कर सकता है, जैसे मेजर ध्यान चंद ने अपनी टीम के लिए किया।

यह खेल मैदान में खेला जाता है इसे फील्ड हौकी या मैदानी हौकी कहा जाता है और जो बर्फ में खेली जाती है उसे आइस हौकी कहते हैं। हौकी के आधार पर अन्य खेल भी प्रचलित हो गए हैं जैसे – फर्श बॉल, रिक हौकी, जल हौकी,  मेज़ हौकी, झाड़ू बॉल आदि। इन्हें कुछ अलग–अलग नियमों के साथ खेला जाता है”।

“भैया, हम हूँ खेल सकत का”, भजनू ने पूछा।

“अगर तुम समझोगे नहीं, तो खेलोगे कैसे? इसलिए पहले बिना बोले समझो तभी खेल सकोगे”, साहिल ने समझाया। “लगभग दो हजार वर्ष पहले इस खेल को फारस में खेला जाता था। लेकिन यह आज खेले जाने वाले खेल की तरह नहीं था। यूनान और रॉम में भी इसका प्रचलन बढ़ा। उन्नीसवीं शताब्दी में यह खेल ब्रिटिश सेना के द्वारा भारत में खेलना शुरू हुआ। छावनियों के बड़े शहरों – लाहौर, जलंधर, लखनऊ, झांसी,  जबलपुर आदि इसके गढ़ माने जाने लगे।

सैनिकों और बलशाली लोगों का यह चहेता खेल बन गया। १९२८ से इसे ओलम्पिक में शामिल किया गया। पहली बार हौकी लंदन में २९ अक्तूवर १९०८ में खेली गई। इसमें छ्ह टीमें थीं। एशिया में हौकी सर्व प्रथम भारत में ही खेली गई। पहले दो एशियाई खेलों में भारत को खेलने का अवसर नहीं मिला। भारत ने पहला स्वर्ण पदक १९२८ में हौकी में जीता। १९२८, १९३२ और १९३६ के मुक़ाबले में भारतीय टीम का नेतृत्व मेजर ध्यान चंद ने किया था। उनहोंने इन मैचों में अकेले ही १३३ गोल किए थे। उन्हें हौकी का जादूगर कहा जाता था। वे इतना तेज दौड़ते थे कि बॉल उनकी हौकी से चिपकी हुई महसूस होती थी। लोगों ने उनकी हौकी की विशेष जांच भी कारवाई थी। हौलैंड में इनकी हौकी को विशेष रूप से जांचा–परखा गया था, कि काही इसमें चुंबक का प्रयोग तो नहीं किया गया। मेजर ध्यान चंद हौकी का पर्याय बन गए थे।

पहले ये खेल सिर्फ पुरुष खेलते थे लेकिन आज इस खेल में महिलाएं भी अपना हुनर दिखा चुकी हैं। महिला हौकी को ओलम्पिक में भी शामिल किया गया है।

१९१० के राष्ट्र मण्डल खेलों में भारत ने हौकी में रजत पदक जीता। भारत ने आठ बार ओलंपिक में स्वर्ण पदक जीते। इसका श्रेय टीम को तो है ही लेकिन विशेष योगदान मेजर ध्यान चंद का रहा जिन्हों ने इसे भारत में इतना लोक प्रिय बना दिया”।

“भैया एक बात पूछ सकत हैं”, भजनू ने धीरे से कहा।

“हाँ, हाँ। पूछो, इतनी देर से चुप बैठे हो। तुम्हारा पेट फूल गया होगा साहिल ने हँसते हुए कहा”।

“भैया कुछ इस जादूगर के बारे में भी बताओ न! क्या ये जादूगर के परिवार में पैदा हुए थे?”

“नहीं भजनू, ये एक साधारण किसान परिवार में पैदा हुए थे। ध्यान चंद जी के पिता ब्रिटिश सरकार में फौज के सिपाही थे। इनका जन्म २९ अगस्त १९०५ में इलाहाबाद में हुआ था। ये कोई प्रखर बुद्धि के बालक नहीं थे, लेकिन मेहनती और दृढ़ इच्छा शक्ति के धनी थे। सोलह साल की उम्र में फौज में पहली ब्राह्मण रेजीमेंट में भर्ती हो गए थे। फौज में ही इनकी पहचान सूबेदार मेजर तिवारी से हुई। उनके प्रोत्साहन से वे हौकी खेलने लगे। उनका रुझान इस कदर बढ़ा की वे नौकरी करने के बाद चाँदनी रात में अभ्यास करते थे। तभी से इनके नाम के साथ चंद शब्द इनके साथियों ने जोड़ दिया और वे ध्यान सिंह से ध्यान चंद बन गए। इनके खेल के प्रति लगाव और अच्छे प्रदर्शन के कारण फौज में उन्नति होती रही। १९३७ में उन्हे सूबेदार बना दिया गया, द्वितीय विश्व युद्ध के बाद १९४३ में उन्हें लेफ़्टीडेंट का रैंक मिला और भारत की स्वतन्त्रता के बाद १९४८ में वे कप्तान बन गए, पुन: मेजर के पद को सुशोभित किया। इक्यावन साल की उम्र में वे फौज से रिटायर हुए। उसके बाद विभिन्न प्रदेशों में हौकी का प्रशिक्षण देते रहे। तीन दिसंबर १९७९ को दिल्ली के आल इंडिया मेडीकल साइन्सेज (ए आई एम्स) में इस दुनिया को अलविदा कहा। वे लीवर के केंसर से पीड़ित थे। अंतिम समय गरीबी और बीमारी से मुश्किलों में गुजरा। वे ऐसे खिलाड़ी थे जिस पर देश को आज भी गर्व है। भारत सरकार ने उन्हें पद्म भूषण से सम्मानित किया। वे जन जन के प्यारे है और सदा रहेंगे”।

“भैया इससे बड़ा तो कोई सम्मान हो ही नाही सकता, वे तो भारत के महान रत्न हैं यानि की भारत रत्न हैं”

“वह भाई! तूने क्या बात कही है, तुमने तो उन्हें भारत रत्न ही बना दिया। वाह!” साहिल खुश होकर बोला।

“भजनू ने बोल दिया तो समझ लो भारत रत्न मिल ही गया”, अर्जुन ने ताली बजते हुए कहा।

“का भैया हमार कहन से हुय सकत का!” भजनू ने गर्व से पूछा।

“क्यों नही तुम्हारे कहने से ही तो सब होता है”, अर्जुन ने कहा और सब ज़ोर से हंसने लगे।

शब्दार्थ:

  • टोकना – बीच में बात बोलना
  • रुझान – रुचि
  • प्रमोशन – उन्नति
भारत रत्न
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