सुंदर वन का बोनी बंदर बेहद शरारती था। उसकी शरारत से आस-पास के लोग बहुत परेशान रहते थे। कई बार तो उसकी शरारत सुनकर उसके माँ-बाप को भी बड़ी शर्मिंदगी उठानी पड़ती थी। थोड़ी बहुत शरारत तो हर कोई करता है लेकिन यदि शरारत करने से किसी का नुकसान हो तो ऐसी शरारत करने वाले को सब बुरा ही समझते हैं। बोनी बंदर को भी कई बार उसके माता-पिता ने, नाते-रिश्तेदारों ने, पड़ोसियों-दोस्तों ने समझाया कि ऐसी शरारतें न करो जिनसे दूसरों को कष्ट पहुँचे। लेकिन बोनी बंदर तो उनकी बातें एक कान से सुनकर दूसरे कान से निकाल देता था।

पिछले महीने की ही बात है, सुबह का समय था। लोमड़ी मौसी ने अपने बीमार बच्चे के लिए बड़ी मुश्किल से चार सेबों का इंतजाम किया था। उसका बीमार बच्चा बहुत दिनों से सेब खाने की ज़िद कर रहा था। लोमड़ी मौसी को रास्ते में बोनी बंदर दिखाई पड़ा। मौसी ने बोनी से कहा, “बेटा, मैं तो अपने घर शाम तक ही पहुँच पाऊँगी, अभी अपने काम पर जा रही हूँ, ज़रा ये सेब मेरे बीमार बेटे तक पहुँचा देना। भगवान तुम्हारा भला करेगा।” बोनी ने कहा, “चिंता की कोई बात नहीं मौसी, अभी पहुँचा देता हूँ।” ये कह कर उसने सेब का थैला उठाया और लोमड़ी के घर की ओर चल दिया।

देर शाम को जब लोमड़ी घर पहुँची, तो पता चला कि न तो बोनी बंदर वहाँ पहुँचा और न ही सेब पहुँचे। लोमड़ी बड़ी दुखी हुई। उसके बीमार बेटे की सेब खाने कि हसरत दिल में ही रह गयी। रात भर वह सो न सकी। अगले दिन सुबह होते ही वह बोनी के घर पहुँची और सेबों के बारे में पूछा। बोनी बोला, “मौसी, क्या बताऊँ, जैसे ही मैं तुम्हारे घर के पास पहुँचा, न जाने कहाँ से भालू दादा निकल आए। उन्होनें मुझसे सेब छीने और गपागप चारों सेब खा गए।” मौसी क्या, सबको ही पता था कि बोनी झूठ बोल रहा है। मौसी की आँखों में आँसू आ गए। वह बोली, “बेटा, किसी दिन तेरी शरारत तुझे बहुत भारी पड़ेगी।”

बोनी बंदर की कोई एक शरारत हो तो उसका ज़िक्र किया जाये। किसी चिड़िया का घोंसला तोड़ देना या चिड़िया के बच्चों को घोंसले से धक्का देकर गिरा देना तो उसके लिए रोज़ की शैतानी थी। एक दिन तो उसने हद ही कर दी। सोते हुए अपने चचेरे भाई टिंकू बंदर की पूँछ, पेड़ की एक डाल से बाँध दी और फिर थोड़ी दूर एक पटाखे से बड़ी ज़ोर का धमाका किया। धमाके की आवाज़ से टिंकू जो डर के उठा और उछलकर भागा, तो उसकी पूँछ का जड़ वाला हिस्सा फट गया और वह खून से तर-बतर हो गया।

बोनी बंदर की शरारतें दिन प्रति दिन सुंदर वन के लोगों के लिए कष्टकारी होती जा रहीं थीं।

एक दिन बोनी के कुछ दोस्तों ने बोनी के सामने योजना बनाई, “सुंदर वन से लगा जो कनक वन है, उसकी सीमा पर लगे पेड़ों पर बहुत मीठे आम के फल लगे हैं। कल रात हम सब चलकर मीठे आम तोड़ लायेंगे”। “दिन में क्यूँ नहीं?” बोनी ने पूछा। “वहाँ के आम इतने मीठे हैं कि कनक वन के पहरेदार उसकी सुरक्षा में लगे रहते हैं। हाँ, रात के समय पहरेदारों की संख्या न के बराबर होती है, इसीलिए रात का ही समय उपयुक्त है।” उनमें से एक दोस्त ने बताया। अब तो बोनी को चैन कहाँ। उसने सोचा, “क्यों न मैं आज रात में ही अकेले जाकर भरपूर आम तोड़ लाऊं। कल रात तोड़े आमों में तो बहुत लोगों का हिस्सा रहेगा।

उसी रात बोनी कनक वन की सीमा में जा पहुँचा। वहाँ उसे आमों से लदे काफी पेड़ दिखे। सावधानी से चारों तरफ नज़र दौड़ाने के बाद भी उसे कोई पहरेदार नज़र नहीं आया। वह आम के एक पेड़ पर चढ़ गया और फिर उसने एक आम तोड़कर चखा। “लाजवाब! स्वादिष्ट, शहद से भी मीठा आम!” उसके मुँह से निकला। उसके बाद बोनी लगा पेड़ की डाल को हिलाने। टपा-टप, टपा-टप करके आम पेड़ से नीचे टपकने लगे। फिर वह दूसरे पेड़ पर पहुँचा और ज़ोर-ज़ोर से डाल हिलाकर आम गिराने लगा। लेकिन यह क्या? बोनी के कानों में साँय-साँय कि आवाज़ गूँजने लगी। उसे चारों तरफ काले-काले कीट पतंगे से उड़ते दिखाई दिये। उसके शरीर में सैकड़ों सूइयाँ सी चुभने लगी। “अरे बचाओ! अरे बचाओ! मैं मरा! ये तो मधु-मक्खियाँ हैं”। चिल्लाता हुआ बोनी बंदर पेड़ से कूदा और सरपट अपने घर की तरफ भागा। लेकिन सोती हुई मधु-मक्खियाँ अचानक जागने के बाद अपने पूरे क्रोध में थीं। वो भागते हुए बोनी को लगातार काटे जा रही थीं।

रात में सभी के सोये होने से बोनी की चीखें किसी ने सुनी भी नहीं। किसी तरह गिरता-पड़ता बोनी अपने घर पहुँचा। घर तक पहुँचते-पहुँचते वह अधमरा हो गया।

मधु-मक्खियों के जहरीले डंकों से उसका सारा शरीर सूज गया था। बड़ी मुश्किल से उसके प्राण बचे। हफ्तों उसे ठीक होने में लगे। अपनी भीषण पीड़ा के समय उसकी आँखों में घूमता रहता, चिड़ियों के बच्चों का क्रंदन, लोमड़ी मौसी की बेबस आँखें, टिंकू बंदर की लहूलुहान पूँछ और न जाने क्या-क्या, जिन सब का कारण वही था, सिर्फ वही।

चार हफ्तों बाद जब बोनी बंदर काफी हद तक ठीक हो गया तब वह घर से बाहर निकला। लेकिन अब वह बिलकुल बदल गया था। उसकी शरारतें और गंदी हरकतें सब खत्म हो गईं।

कुछ दिनों बाद बोनी को पता चला कि कनक वन में उसे भेजने की योजना एक साज़िश थी। जिन्होंने ये योजना बनाई थी उन्हें पता था कि उन आमों के पेड़ों के पास कोई इसलिए नहीं जाता था क्योंकि उन पर खतरनाक मधु-मक्खियों के अनगिनत छत्ते थे। पहरेदार वाली बात भी झूठी थी, जिससे बोनी बंदर रात में ही वहाँ पहुँचे, क्योंकि दिन में तो छत्ते दूर से ही दिख जाने का अंदेशा था। हाँ, योजना के अनुसार, समय कल रात का इसलिए रखा कि सबको पता था कि बोनी आज रात अकेले ही जाकर ज़्यादा से ज़्यादा आम हड़पने की कोशिश करेगा। सारी साज़िश पता चलने के बाद बोनी बोला, “चलो अच्छा हुआ, मधु-मक्खियों के डंकों के जहर ने मेरे अंदर के शरारती जहर को निकाल फेंका। अपनी पीड़ा-दायक बेबस हालत देखकर मुझे उन सबके चेहरे याद आ जाते थे, जिनको मैंने अत्याधिक सताया था।”

अब बोनी, सुंदर वन का सबसे सज्जन, सबसे परोकारी, सबका प्यारा और सबकी आँखों का तारा है।

शब्दार्थ

  • भीषण – बहुत ही बुरा
  • क्रंदन – रोना
  • अंदेशा – शंका

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बोनी बंदर
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