शर्मा परिवार में चाचा-ताऊ पिता सभी के मिला कर तेरह बच्चे थे। परिवार का मुख्य स्थान हस्तिनापुर में था। बड़ी हवेली में परिवार के कुछ बुज़ुर्ग लोग रहते थे। अगली पीढ़ी अलग-अलग शहरों में नौकरी, व्यापार आदि करते थे। बुज़ुर्ग तो एक साथ वहीं रहना चाहते थे। लेकिन उनकी अगली पीढ़ी उन्हें अपने साथ रहने का प्रस्ताव देती, कभी हवेली को बेचने का आग्रह करते। बुज़ुर्गों का मानना था – ये उनका स्थाई अपना घर है। यहाँ की पूरी जानकारी, मित्र, वर्ग आदि यहीं है। तो हम क्यों इसे छोड़ कर जाए? अगली पीढ़ी भी बुज़ुर्ग होने पर एक साथ रह सकते हैं। इसलिए सभी का एक स्थाई स्थान होना चाहिए। दोनों पीढ़िया अपनी बात पर राज़ी थी अतः समाधान का निवारण नहीं था।

बुज़ुर्गों ने आपस में बैठ कर उस विषय पर चर्चा कर एक उपाय सोचा। हवेली को बने हुए सौ वर्ष हो गए थे। अतः पूरे परिवार को आमंत्रित कर समारोह का आयोजन किया। बुज़ुर्गों ने एक नियम घोषित किया – छुट्टियों में साल में एक बार सभी लोग एकत्रित होंगे। जिससे सभी का आपसी संपर्क बना रहेगा। साथ ही भेंट के साथ – संस्कारी रस्मों को मनाया जाएगा। सभी छोटे से बड़े बच्चों की रस्मे जैसे – अन्नप्राशन, नामकरण, मुंडन, जनेऊ के साथ जन्मदिवस आदि को मनोरंजक तरीके से मनाया जाएगा।

अगली पीढ़ी को उस प्रस्ताव से कोई ख़ुशी नहीं मिली वो समझ गए की हमारे बच्चे आना पसंद नहीं करेंगे तो हम भी कैसे आएंगे?

Bujurgon ki team

कुछ दिन में समारोह समाप्त हुआ। बच्चों में सहमति पैदा हुई और सभी बच्चों को सबसे उत्तम कार्य मिल जुल कर खेलना लगा। बाहर खुले मैदान में फुटबॉल बॉलीबाल खूब मस्ती से खेलते। भाई बहनो में सभी को बाहर खेलना बेहद अच्छा लगता। क्योंकि बाहर के सारे खेलों के लिए एक संगठन की आवश्यकता होती है जो वहाँ उपलब्ध थी। घर के माता-पिता का भी पूरा सहयोग मिल रहा था। सारा शोर शराबा बाहर मैदान में ही रहता। इन बच्चों के संगठन से हस्तिनापुर इलाके के बच्चे भी इकट्ठे होने लगे। अब बाकायदा दो टीम बन गई। एक परिवार की टीम एक हस्तिनापुर बालको की टीम।

धीरे धीरे दोनों टीमों में उच्च स्तर की प्रतियोगिता का माहौल बनाने लगा।

सभी बच्चे घर आ कर बेहद गंभीरता से सभी पहलुओं पर विचार प्रकट करते। इस स्तरपर पहुंचने के कारण अगली पीढ़ी भी उत्साहित हो गई। दोनों पीढ़ियों के बीच वार्ता का सामान्य विषय भी निर्धारित हो गया। हर दिन पूरा परिवार अपने बच्चों से वार्ता करता। एक दिन प्रतियोगिता निर्धारित हुई। परिवार के सभी सदस्य बुज़ुर्गों के साथ मैदान में पहुंचे। पूरा परिवार अपने बच्चे खिलाड़ियों को बेहद उत्साह से तालिया बजा, चीख-चिल्ला कर ख़ुशी से प्रोत्साहित कर रहे थे। अंत में प्रतियोगिता में परिवार की टीम जीत गई। पूरा परिवार ऐसा खुश हुआ जैसे उनके परिवार ने ओलम्पिक का स्वर्ण पदक ले लिया हो। ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहा।

शाम को ही सारे बच्चों और अगली पीढ़ी ने बुज़ुर्गों को नतमस्तक हो धन्यवाद एवं आभार व्यक्त कर कहा, “हम आपके नियमों का पालन करेंगे और सदैव हर छुट्टियों में यही आएंगे। खेल के कार्यक्रम से ख़ुशी के साथ पूरे परिवार में प्यार और तालमेल भी हो गया। इतनी ख़ुशी हमें आज तक नहीं मिली”।

शब्दार्थ:

  • बुज़ुर्ग – ६० वर्ष से बड़े
  • टीम – दल
  • निवारण – समाधान
बुज़ुर्गों की टीम
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