हमें अपने बुजुर्गों का सुख बनाए रखने के लिए उन्हें आदर और समय देना चाहिए।


सुख और खुशी के दिन पलक झपकते ही गायब हो जाते हैं।  लगता है वे बहुत ही तेजी से उड़ने वाले पंखों पर सवार होकर उड़ते ही चले जाते हैं, दूर बहुत दूर। और क्षितिज के उस कोने में समां जाते हैं जहाँ वे यादें बन जाते हैं। फिर वही यादें समय के साथ आहें बन जाती हैं। कहते हैं बीता हुआ समय कभी वापस नहीं आता। यह समय बीतता ही क्यों है! और जिस समय को बिताना चाहते हैं वह धुंध की तरह जीवन पर छा जाता है। न बीतता है और न हटता है। कोहरे की तरह जीवन को शिथिल बना देता है।

शीतल अपने विचारों में डूबी थी कि सत्या की आवाज आई

“चाय के साथ कुछ बना दूँ आंटी?”

“हाँ, चाय बना ली क्या? अपने लिए भी बना ले”।

“मैं पी कर आई हूँ आंटी”, उसने चाय का कप सामने लाकर रख दिया।

“एक सैंडविच बना लाती हूँ”।

“नहीं रहने दे, मन नहीं है”, शीतल ने उठते हुए कहा।

“आंटी, इस तरीके से कैसे जियोगी?”

“कौन जीना चाहता है”, एक गहरी साँस ली शीतल ने।

“देखो आंटी, बुलाने से तो मौत नहीं आती। जब तक जीवन है, जीना ही पड़ेगा”।

“वह तो है”, चाय का घूँट भर कर शीतल ने कहा।

“फिर चलने-फिरने के लिए कुछ खाना तो पड़ेगा ही”, पास बैठते हुए सत्या बोली।

“क्या करूं, कुछ खाने को मन ही नहीं करता”।

“आप की बात ठीक है, लेकिन कुछ काम बेमन के भी करने पड़ते हैं”, कहती हुई सत्या किचिन की ओर बढ़ गयी।

सत्य फिर अतीत में खो गयी।

“माँ, केक ख़तम भी हो गया! मैंने तो जरा सा ही खाया था”।

“अरे! अभी तो काट कर रखा था”।

“पता नहीं माँ, यह वैभव कितना खाता है। सारा खा गया”।

“ओ हो हो, बेचारा सलिल तो कुछ खता ही नहीं। माँ, यह साड़ी प्लेट चट करके आया है आपके पास। भुक्कड़ कहीं का!”

शीतल के चहरे पर मुसकराहट आ गयी।

“लो, आंटी खीरा और पनीर का सैंडविच बनाया है। चाय के साथ अच्छा लगेगा”।

“यहीं रख दे”, शीतल ने कहा।

“क्या याद आ गया? बड़ी मुसकरा रही हो”।

“क्या बताऊँ? वही वैभव और सलिल की शैतानियाँ। सारे दिन एक-दूसरे की शिकायतें और पल भर में ही प्यार। चाहे कितना भी खाना बनाओ, सब चट कर जाते। दो चार दोस्त आ जाते तो पता ही न चलता कि कब बनाया और कब ख़तम”।

Buzurgon ka sukh sadan

“वह उम्र ही ऐसी होती है आंटी”।

“अब कुछ खाते ही नहीं। जब कुछ खाने के लिए कहो तो, यह नहीं खाना, इसमें फैट बहुत है, तेल बहुत है, फ़्राईड है, मीठा ज्यादा है। बस न खाने के बहाने ढूढते हैं”।

“अब, कब आएँगे भैया लोग?”

“अब देखो, जब फुरसत होगी”, शीतल ने कहा और चाय से उठती भाप में अपना मुंह छुपा लिया।

वह जानती है कि अब शायद वे उसके मरने के बाद ही आएँगे। वे अपनी घर-गृहस्थी और काम में इतने व्यस्त हैं कि उनके पास व्यर्थ के कामों के लिए समय नहीं कि वे चार दिन अपनी माँ के पास रह जाएँ। अगर समय होगा भी तो बच्चों के साथ घूमने-फिरने में निकाल देंगे। यह भी तो जरूरी है।

शीतल ने कोशिश करके सैंडविच का टुकड़ा गले के नीचे उतारा। वह भी तो वैभव के पास रुकी नहीं। जिद करके वापस आ गयी। जितने काम उसने जवानी में नहीं किए, उतने इस बुढ़ापे में कैसे संभव थे। फिर उन्हें माँ की नहीं, एक केयर टेकर की जरूरत थी। बुढ़ापे का शरीर और अक्खड़ स्वाभिमान भी तो है। कोइ उसे निरीह, निर्बल समझे, उस पर तरस खाए, उस पर सहारा देने का एहसान जताए, यह भी तो उसे मंजूर नहीं।

अमेरिका का शर्दीला वातावरण, संवेदना रहित जीवन उसे रस नहीं आया। उसे लगा जीवन का अंतिम समय अपनी जमीन पर ही निकालना उचित होगा। वह वापस आ गयी। जानती है कि यहाँ कोई इंतजार नहीं कर रहा। लेकिन घर की दीवारों में, सामानों में, वे सुनहरी यादें बसी हैं जो अब जीवन का सहारा हैं। वे यादें ही तो हैं जो एक संबल बन कर हाथ पकड़ लेती हैं। सब जानते हैं, मैं भी जानती हूँ कि जिसने दुनिया छोड़ दी, वह वापस नहीं आएगा। लेकिन फिर भी लगता है, जैसे मेरा कोइ इंतजार कर रहा है। कोई मुझे देखना चाहता है, बातें करना चाहता है, एहसास करना चाहता है। इसलिए वह वापस आ गयी। अपने घर में इस घर को बनाने में उसके पति और उसने कितने दिन-रात एक किए थे। कितनी जमा पूंजी को खपा दिया था। इस उम्मीद में कि एक दिन चैन से रहेंगे।

यह चैन से रहना उतना ही बड़ा भ्रम है जितना अमर बने रहने का। सभी जानते हैं कि मृत्यु अवश्य आएगी लेकिन मरना कोई नहीं चाहता। उसी प्रकार जीवन में चैन का समय कभी आता ही नहीं फिर भी सब उसे चाहते हैं।

“मैं जा रही हूँ। रात को आउंगी”, सत्या ने आकर कहा।

“ठीक है, दस बजे तक आ जाना”, शीतल अतीत से वर्त्तमान में आ गयी।

“अच्छा”, सत्या कह कर चली गयी।

शीतल के जीवन में अब सत्या ही सहारा है। जीवन विडम्बनाओं से भरा रहता है। जिन्हें बुढ़ापे का सहारा समझते हैं, वे पास भी नहीं होते और जो कोई नहीं होते, वे सहारा बन जाते हैं। अब सत्या ही उसकी देखभाल करती है, वही रात को पास में सोती है। इतनी बड़ी कोठी है, उसी के एक सर्वेंट के लिए बनाए कमरे में रहती है

शीतल छड़ी टेकती हुई बाहर निकली। गेट के पास आकर खड़ी हो गयी। कितना सन्नाटा पसरा पड़ा है, अभी से। अभी तो आठ भी नहीं बजे। एक जमाना था जब रात के बारह बजे भी सड़क पर, घरों में, शोर गुल रहता था। चहल-पहल रहती थी। वैभव और सलिल भी कितनी-कितनी देर तक खेलते रहते थे। उसके पति और मित्रों की मंडली भी शनिवार और रविवार को देर तक जमती ही थी। कितने पकवान, कितनी मिठाइयाँ। रबड़ी-जलेबी और चाट का कार्यक्रम तो चलता ही रहता था। साथ में भविष्य की बातें। बच्चों की पढाई, खर्चों की चर्चा के विषय रहते ही थे। साथ में कहाँ, क्या हो रहा है? राजनीति और फ़िल्में भी इसमें शामिल होती थीं। आए दिन साथ-साथ घूमने जाना, पिकनिक मनाना। दिन पखेरू बन पता नहीं कहाँ उड़ गए।

शीतल मुड़ी और अंदर की ओर चल दी। बरामदे में ही ईजी चेयर पर बैठ गयी। क्या करेगी अभी से बिस्तर पर जाकर? एक समय था कि रात के बारह बजे से पहले बिस्तर पर पहुँचाना संभव ही नहीं होता था। कार्य में सहयोग देने वालों के होते हुए भी वह कितनी व्यस्त रहती थी। अब व्यस्तता ही समाप्त हो गयी। हकीकत यह है कि अब शरीर में दम नहीं। अन्यथा वह व्यस्त रहने के और भी तरीके ढूंढ लेती। शीतल विचारों में डूबी बैठी थी कि सत्या आ गयी।

“आंटी! सारस्वत आंटी, उस पीली कोठी में रहने वाली, नहीं रहीं”।

“क्या?” परेशान सी शीतल ने पूछा।

“बिचारी। पता नहीं कब की सिधार गईं? अभी पता चला। जब चौकीदार खुला दरवाजा देख कर उन्हें बताने गया”।

“अरे! बहुत बुरा हुआ”।

“आंटी। वह कई दिनों से बीमार थीं। उनकी कामवाली ने बताया था। वह भी कल ही अपने भाई की शादी में गयी है”।

शीतल सत्या का सहारा लेकर उठी। और सारस्वत जी के घर की ओर चल दी। उनके घर का हाल देखकर कलेजा मुंह को आ रहा था। बुजुर्गों को कौन देखने वाला है! सब अपने-अपने घरों में, कार्यों में व्यस्त हैं। बुजुर्ग सब भगवान के सहारे हैं। दस पंद्रह बुजुर्ग भी वहां थे, जो अपने ऐसे भविष्य की चिंता से डरे हुए थे। शीतल ने अपने जान-पहचान के लोगों को बुला कर उनके अंतिम-संस्कार की व्यवस्था कराई। उदास और चिंतित वह अपने घर लौट आई।

रात भर सो न सकी। सबके चिंतित चेहरे और भयभीत आँखें उसे डराती रहीं। प्रात:काल वह एक दृढ निश्चय के साथ उठी। उसने निश्चय किया कि वह इस घर के, गली के और आस-पास के सन्नाटे को कैद कर लेगी। अब न कोइ अकेला रहेगा और न भयभीत। कोइ भी बुजुर्ग अपने भविष्य को लेकर न परेशान होगा और न निराश।

उन्होंने अपनी शानदार कोठी को “सुख सदन” में परिवर्तित करने की ठानी। सभी आस-पास के ही नहीं, दूर दराज के भी जो अकेले बुजुर्ग हैं, चाहे वे स्त्री हैं या पुरुष, सभी को यहाँ आश्रय मिलेगा। अपनी संपत्ति का सदुपयोग करते हुए यहाँ खाने और स्वास्थ्य की पूर्ण व्यवस्था भी की जाएगी। डाक्टर, नर्स और सहायकों की व्यवस्था भी की जाएगी। बुजुर्गों के मनोरंजन और मन बहलाव का भी ध्यान रखा जाएगा। शीतल ने जब इस प्रकार के प्रबंधन की घोषणा की तो अन्य बुजुर्गो ने भी अपनी संपत्ति को इस कार्य में लगाने की इच्छा व्यक्त की। कई युवा इस कार्य के लिए स्वत: आगे आए।

आज “सुख सदन” वह आश्रय है जहाँ बुजुर्ग अकेलेपन और उदासी के शिकार नहीं, बल्कि उनमें उत्साह और उमंग के साथ-साथ जीने के प्रति लगाव भी दिखाई देता है। उनकी आँखों में अनुभव और ज्ञान की चमक है। वे समाज के उपेक्षत नहीं, बल्कि वांछित व्यक्ति हैं। कई युवकों ने इनके अनुभवों को लिपि बद्ध करके जीवनोपयोगी सामग्री को संकलित किया है, जिनमें ज्ञान के साथ-साथ अनुभव का भी विशेष महत्व है।

बुजुर्ग हमारे पूजनीय हैं, हमारे आदर्श हैं, हमारे अतीत हैं। हम सब इनकी मेहनत, त्याग और कोशिशों से ही आगे बढे हैं और बढ़ रहे हैं। हमें उनके प्रति कृतज्ञ और नत मस्तक होना चाहिए।

शब्दार्थ:

  • पखेरू – पक्षी
  • लिपि बद्ध -लिख कर
  • कृतज्ञ -आभारी

नैतिक मूल्य:

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