कल-कल, छल-छल बहता जाता, कभी न रूकता, कभी न थकता, उज्जवल उजला सा बस चलता जाता, निर्मल नीर आगे ही बढ़ता जाता, जहाँ भी जाता उसमें मिल जाता, कभी निर्झर बनकर प्यास बुझाता, शीतल नदियों का संगम बन जाता, कभी…

Want to read this? Sign in or subscribe.

      Subscribe

बहता पानी
Rate this post

Loading...