अनमोल हमेशा कहता था कि उसे पढ़ाई का एक और दिन मिल जाता, तो वो एग्ज़ाम अच्छे से पास कर लेता। उसके साथ ऐसे ही हुआ!


आज अनमोल का गणित का पेपर था। परीक्षा में उसे बहुत सारे सवाल नहीं आ रहे थे। घर लौटते समय रास्ते में उसका दोस्त विराट मिला तो दोनों में बात–चीत होने लगी।

“आज का पेपर कितना मुश्किल था न”, विराट थोड़े परेशान स्वर में बोला।

“अरे नहीं यार! ऐसा कुछ नहीं था”।

अनमोल की ऐसी बात सुनकर विराट ने अचरज से पूछा, “तो तू सारे सवाल कर पाया?”

“नहीं, सारे तो नहीं किए। पर पढ़ने के लिए बस एक दिन और मिल जाता तो पूरे सौ में से सौ नंबर लाता”, अनमोल ने हाथ नचाते हुए कहा।

पढ़ाई का एक और दिन“हाँ, थोड़ा और वक़्त मिल जाता तो अच्छा ही होता”, विराट ने धीमे स्वर में समर्थन किया। तभी पेड़ पर ऊपर बैठे एक उल्लू ने ज़ोर से आवाज़ की। दोनों मित्रों ने एक बार ऊपर उल्लू की ओर देखा, फ़िर बातें करते हुये अपने-अपने घर पहुँच गये। उन्हें पता ही नहीं चला की पीछे उन दोनों की बातें सुन-सुन कर वह उल्लू अपनी गर्दन मटका रहा था।

घर पहुँच कर अनमोल ने अपना बैग पटका और टीवी देखने बैठ गया।

“अनमोल, हाथ-मुँह धो कर खाना खा लो। थोड़ा आराम कर लो”, माँ ने आवाज़ लगाई।

“हाँ, जैसे ही ये कर लूँगा तो बोलोगी की अब पढ़ लो”, अनमोल ने बहुत ख़राब तरीके से जवाब दिया।

पर माँ भी कहाँ मानने वाली थी, “तो कुछ गलत कहूँगी क्या? इम्तिहान चल रहे हैं। पढ़ना तो चाहिए ही”।

“अरे मैंने सब पढ़ लिया है अगले पेपर का!”

अनमोल देर तक टीवी देखता रहा। फ़िर शाम को वह बाहर खेलने चला गया। रात को भी काफ़ी देर तक वीडियो गेम खेलता रहा। माँ के बहुत कहने पर किसी तरह बेमन से वह पंद्रह मिनट के लिए किताब–कापियाँ खोल कर बैठा।

“अनमोल बेटा, जल्दी उठो। नहीं तो परीक्षा के लिए लेट हो जाओगे”, माँ की आवाज़ से अनमोल की नींद टूटी। घड़ी की ओर देखा तो पता चला की वाकई में समय हो गया था। फटाफट से तैयार होकर वह स्कूल के लिए निकल गया।

एक्जाम हॉल के बाहर सभी छात्र कुछ-कुछ पढ़ रहे थे।

“अनमोल, तुझे अगर ये वाला नियम समझ में आ रहा है तो ज़रा मुझे समझा दे”, उसके एक दोस्त देवेश ने एक किताब उसके आगे कर दी।

“गणित! लेकिन आज तो विज्ञान का पेपर है”, अनमोल चौंका।

“अरे तूने डेटशीट ठीक से नहीं देखी होगी। आज मैथ्स का ही एग्जाम है”, देवेश ने झिड़क कर कहा।

अनमोल को अपने कानों पर विश्वास नहीं हुआ। अभी कल ही तो उसने गणित की परीक्षा दी थी, फिर यह कैसे हो सकता है। उसने चारों ओर नज़र घुमा कर देखा। वाकई में सभी मैथ्स की किताब खोलकर पढ़ रहे थे। तो क्या पिछला एग्जाम उसने सपने में दिया था? हो सकता है। मन ही मन अपनी उलझनों में डूबा हुआ वह एग्जाम हॉल में जा कर बैठ गया। पर प्रश्न पत्र देखते ही उसके होश उड़ गए। यह क्या? यह तो सारे वही सवाल हैं जो कल के पेपर में थे। तो क्या उसका सपना इतना सही था?

बेमन से वह प्रश्न पत्र हल करने लगा। आज भी उसे उतने ही सवाल आ रहे थे जितने की कल। किसी तरह परीक्षा खत्म हुई और वह बाहर आया। उसे थोड़ी दूर पर विराट खड़ा दिखाई दिया। पर विराट भी कुछ घबराया हुआ सा था।

Padhai ka ek aur din

अनमोल के पास आकर वह फुसफुसाकर बोला, “कल हमने गणित की परीक्षा दी थी? या फिर मैं सपना देख रहा था”,

अनमोल झट से बोल पड़ा, “नहीं! हमने परीक्षा दी थी। मुझे भी याद है। अभी तक मैं भी अपनी कल की परीक्षा को सपना ही समझ रहा था। पर सारे के सारे सवाल वही थे। ऐसा कैसे हो सकता है?”

दोनों दोस्तों को कुछ समझ नहीं आ रहा था। पर करते भी क्या! घर की ओर चल पड़े।

“आज तू कितने सवाल कर पाया?” विराट ने पूछा।

“कल जितने ही। फिर से यही परीक्षा होगी पता होता तो थोड़ा और पढ़ लेता। तब तो सारे सवाल कर लेता”, आज भी अनमोल ने बेपरवाही से हाथ घुमा कर जबाब दिया।

दूर वही उल्लू पेड़ की ऊँची डाल पर बैठ कर उनकी बातें गौर से सुन रहा था।

घर पहुंचकर अनमोल ने रोज की ही तरह अपनी दिनचर्या रखी। खेला, खाया, टीवी देखा, और माँ की डांट सुनकर बेमन से थोड़ी सी पढ़ाई की।

अगला दिन आ गया। माँ के उठाने पर तैयार होकर अनमोल एग्जाम हॉल में पहुंच गया। पर यह क्या, आज भी वहाँ सभी बच्चे गणित की ही तैयारी कर रहे थे! अनमोल परेशानी से सिर खुजाने लगा। उसे कुछ समझ नहीं आया। उसने इधर–उधर विराट को ढूंढा। वह भी उसे बहुत ही परेशान हालत में मिला।

परीक्षा शुरु हुई। फिर सारे वही प्रश्न! और उसकी तैयारी भी पिछली बार की तरह। वह उतने ही सवाल हल कर पाया और बाहर आ गया। आज तो दोनों दोस्तों की हालत बहुत खराब थी। उन्हें कुछ समझ नहीं आ रहा था कि उनके साथ क्या हो रहा है। बाकी सभी लोग बिल्कुल सामान्य थे। सिर्फ उन दोनों को ही रोज-रोज गणित का प्रश्न पत्र मिल रहा था। उन्होंने बातों-बातों में सभी से पता करने की कोशिश भी की थी। पर बाकी सभी बच्चे उनकी परेशानी से बिल्कुल अनजान थे।

आज घर पहुंचकर अनमोल का व्यवहार थोड़ा बदला हुआ था। वह खुद से ही हाथ-मुंह धो कर पढ़ने बैठ गया। पर उसे समझ नहीं आया कि वह गणित पढ़े की विज्ञान। इसी उलझन में दिन बीत गया और और वह सो गया। अगले दिन फिर उन्हें गणित का ही प्रश्न पत्र मिला। अब तो उसे सारे सवाल रट गए थे। पर हल तो वह उतने ही सवाल कर पा रहा था जितने कि रोज।

“आज घर जाकर मैं इन सवालों के उत्तर ढूंढूगा। और कल अगर यही प्रश्न पत्र मिला तो सारे सवालों के सही जवाब लिखूंगा”, मन ही मन यह सोच कर अनमोल घर आ गया।

आज वह गणित पढ़ने बैठा। अनमोल को खुद से पढ़ता देखकर माँ को बहुत आश्चर्य हो रहा था। पर उन्होंने ज्यादा कुछ पूछना उचित नहीं समझा।

“पढ़ाई कर रहा है तो अच्छी बात है। कुछ तो अक्ल आई”, यह सोच कर वह अपने कामों में लग गई।

इधर अनमोल दिनभर गणित की किताबों में माथापच्ची करता रहा। सवाल तो उसे पता थे। पर किताबों में उनका हल ढूंढना कोई आसान काम नहीं था। उसने पूरे साल ध्यान से पढ़ाई नहीं की थी। इधर-उधर खेलने और टीवी देखने में सारा वक्त बर्बाद किया था। सो प्रश्नों के उत्तर ढूंढने में उसे बहुत दिक्कत आई। बहुत थोड़े से प्रश्नों के ही वह हल ढूंढ पाया।

“कोई बात नहीं। कल से तो कुछ ज्यादा सवाल कर पाऊंगा”, यह सोच कर उसने अपने मन को समझाया।

अगले दिन फिर मैथ्स का पेपर आया। आज वह पढ़कर आए सारे सवालों को हल कर पाया। पर कुछ सवाल उसे फिर भी नहीं आए। बाहर निकलकर अनमोल और विराट एक दूसरे से बातें करने लगे।

“क्या हो रहा है हमारे साथ? ऐसा लगता है कि किसी साइकिल के पहिए में हमारी जिंदगी फंस गई है। गोल घूम कर रोज वही दिन आ जाता है”, अनमोल अनमने ढंग से बोला।

“यह मैथ्स का पर्चा दे-देकर तो मैं पागल हो गया हूँ”, विराट ने ज़ोर से अपना माथा ठोका।

अनमोल का अंदाज़ दार्शनिक हो गया, “शायद कोई चाहता है कि हम पूरी पढ़ाई करें और इस पेपर में पूरे नंबर लाए। अब तो लग रहा है जब तक हम यह पेपर सौ में सौ पाने लायक नहीं कर लेते, तब तक हमें यही पेपर देते रहना पड़ेगा”।

“अरे बाप रे! अनमोल, ऐसे मत बोल। मैं अब और गणित का एग्ज़ाम नहीं दे सकता”, विराट ने अपने दोनों हाथ जोड़ दिये।

“हमारे चाहने से कुछ हो रहा है क्या?” अनमोल झल्लाया। “मैं तो सोच रहा हूँ कि आज से विज्ञान और दूसरे विषय भी ठीक से पढ़ना शुरू कर देते हैं। कहीं इस मैथ्स के बाद उनके भी पेपर रोज-रोज न आने लगे”।

“शुभ–शुभ बोल”, विराट ने मुंह लटका कर कहा।

“चलो! घर चलते हैं। और बाकी सवाल भी पढ़ने की कोशिश करते हैं”।

पीछे बैठे उल्लू की आँखें आज गोल–गोल घूम रही थी।

आज घर आते ही अनमोल पढ़ने बैठ गया। उसने गणित की किताब मन से पढ़ी। और फिर प्रश्न पत्र के सवालों को हल करने की कोशिश करने लगा। आज उसे सारी बात समझ में आ रही थी। हर परीक्षा के बाद वह हमेशा कहता था कि पढ़ने को सिर्फ एक दिन और मिल जाए तो वह पूरे सौ में सौ नंबर ले आएगा, पर वह कितना गलत था। उसे पूरे साल के कितने सारे दिन मिले थे, जिन्हें उसने अपनी लापरवाही और मस्ती में गवां दिये थे। पूरे नंबर लाने के लिए साल भर ठीक से पूरी पढ़ाई करने की जरूरत थी, ना की एक और दिन की। आज उसने थोड़ा गणित पढ़ने के बाद विज्ञान की भी किताब उठाई। पहली बार उसे कुछ पढ़ना अच्छा लग रहा था, और देर रात तक वह तल्लीन हो कर पढ़ता रहा। बाहर सन्नाटे में एक अज़ीब सी आवाज़ गूंज रही थी। शायद कोई उल्लू बोल रहा था।

अगले दिन फ़िर से गणित का प्रश्न–पत्र मिला। पर यह क्या! आज वो पुराने सवाल नदारद थे। सारे ही सवाल दूसरे थे। अनमोल ने इधर–उधर देखा। सभी छात्र अपना–अपना पर्चा लिखने में व्यस्त थे। उसने भी प्रश्नों को हल करना शुरू कर दिया। जल्दी ही वह आश्चर्य और खुशी में डूब गया। इन नए सवालों के भी जवाब उसे आ रहे थे।

सारे सवालों को सही ढंग से पूरा करके अनमोल बाहर आया।

विराट दिखा तो उसने चहक कर कहा, “इस बार तो पूरे सौ में से सौ नंबर मिलेंगे”।

“तो आख़िर तुझे तेरा वो एक–और-दिन मिल ही गया”, और दोनों दोस्त ठहाका मार कर हँसने लगे। पेड़ पर बैठे उल्लू के चेहरे पर भी एक मुस्कान खिल उठी थी।

शब्दार्थ:

  • माथापच्ची करना – दिमाग लगाना; उलझे रहना
  • तल्लीन – ध्यान-मग्न; व्यस्त
  • नदारद – गायब

नैतिक मूल्य:

इस लेखक की और रचनाएँ पढ़िये

पढ़ाई का एक और दिन
Average rating of 5 from 1 vote

Leave a Reply

Loading...