भारत में लोगों को पतंग का बहुत शौक़ है। हमारे देश के साथ-साथ यह शौक चीन, कोरिया और थाइलैंड सहित दुनिया के कई अन्य देशों में ही है। भारत में तो पतंगबाजी यहाँ की संस्कृति और सभ्यता में रच-बस गयी है। पतंग उड़ाने के साथ-साथ इस पर कवियों ने ढेरों कविताएँ भी लिखी हैं। बच्चें एवं बुज़ुर्ग भी इस खेल के द्वारा मनोरंजन करते है ।

अहमदाबाद में रहने वाले विक्रांत को भी पतंग उड़ाना बहुत अच्छा लगता था, लेकिन वह छोटे होने के कारण अच्छे से उड़ा नहीं पाता था। इसलिये उसके पापा रोज़ शाम के समय उसे सिखाते। विक्रांत को पतंग उड़ाना तो आ गया था लेकिन वह अपने पापा जैसे दूर तक आसमान में नही भेज पाता था। इस कारण वह परेशान रहता और पतंग न उड़ाने के लिये बहाने ढूँढता रहता।

विक्रांत की बात पापा को समझ आने लगी, अत: वह उसको समझाते है, “बेटा हर काम धीरे ही सीखते हीना। जैसे तुमने देखा होगा कि पतंग भी धीरे-धीरे अपनी ऊँचाई को बढ़ती जाती है और फिर कितनी उमंग के साथ आसमान में ख़ुशी से लहराती है”।

अहमदाबाद में उत्तरायन यानि कि मकर संक्रान्ति से तीन-चार दिन पहले पतंग महोत्सव (काइट फ़ेस्टीवल) शुरू हो जाता है। यह १४ जनवरी तक चलता है, जिसमें तरह-तरह की प्रतियोगिता एवं पतंगबाज़ी वहाँ पर स्थित साबरमती नदी के किनारे होती है। यहाँ चीन, नीदरलैण्ड, अमेरिका, आस्ट्रेलिया, जापान, इटली और चिली आदि देशों से हिस्सा लेने पतंग के शौक़ीन लोग हर वर्ष आते है। उत्तरायन के समय अहमदाबाद में रंगबिरंगी पतंगों से आसमान इंद्रधनुषी हो जाता है। और तो और, यहाँ पर पतंग संग्रहालय भी है, जिसमें बहुत पुरानी एवं अलग-अलग आकार की पतंगें देखने को मिलती है।

इस बार पतंग महोत्सव में छोटे बच्चों की प्रतियोगिता भी शामिल की गयी, जिसमें विक्रांत ने भी हिस्सा लिया। पहले उसकी पतंग ज़्यादा ऊपर नहीं जा रही थी। लेकिन जब उसे अपने पापा की बात ध्यान आयी, वह उसे धीरे-धीरे ऊपर लेकर गया। अब उसकी पतंग सबसे ऊपर आसमान में उड़ रही थी। उसके साथ विक्रांत की जीतने की उम्मीद भी पतंग की तरह ख़ुशी से झूम रही थी। आख़िरकार ऐसा ही हुआ विक्रांत पतंगबाज़ी मे प्रथम आया। यह सब उसके धैर्य और विश्वास का नतीजा था।

जब विक्रांत को पुरस्कार दिया जा रहा था तो वहाँ पर उपस्थित सभी लोगों को पतंग के इतिहास के बारे में बताया। विक्रांत को यह जानकर बहुत आश्चर्य हुआ कि इसकी शुरूआत लगभग २३०० साल पहले चीन में हुई थी। लेकिन रामायण की चौपाई से भारत में भी पतंग का इतिहास मिलता है। महाकवि तुलसीदास ने रामचरितमानस में लिखा है कि किस तरह भगवान राम अपने भाइयों के साथ पतंग उड़ाते थे।

Pracheen khel Patangbaji

राम इक दिन चंक उड़ाई।

इंद्रलोक में पहुँची जाईं।।

प्राचीन समय में पतंगबाज़ी मनोरंजन के प्रमुख साधनों में से एक था। लेकिन समय के साथ-साथ पतंगबाज़ी का शौक भी अब कम होता जा रहा है। सबसे पहला कारण है – समय की कमी और दूसरा – खुली जगह न मिलना। आजकल तो केवल कुछ विशेष दिनों में ही पतंगें देखने को मिलती है।

राजस्थान में तो पर्यटन विभाग की ओर से प्रतिवर्ष तीन दिवसीय पतंगबाजी प्रतियोगिता होती है जिसमें जाने-माने पतंगबाज भाग लेते है। हर साल मकर संक्रान्ति के दिन इसका आयोजन किया जाता है, जिसमें राज्य के पूर्व पतंगबाजों के साथ-साथ विदेशी पतंगबाज भी भाग लेते हैं।

इसके अतिरिक्त उत्तर भारत में भी पतंगबाजी के प्रति आकर्षण है। कहीं पर दीपावली के अगले दिन तो कहीं पर रक्षाबंधन और स्वतंत्रता दिवस के दौरान आसमान में पतंगों की छटा देखने को मिलती है। दिल्ली में स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर पतंग उडा़ने का प्रचलन है। पंजाब में बसंतपंचमी वाले दिन खूब रंग-बिरंगी पतंगें उड़ाते हुये लोग दिखाई देते है।

पतंगबाज़ी के समय पतंगों का लड़ना पेच कहलाता है। लोग पेच लड़ते हुये दिखते हैं और फिर साथ में बोलते भी रहते हैं ‘वो मारा’, ‘काट दिया’, ‘वो काटा रे’। काटने के बाद जब पतंग नीचे आती है तो उसको लेने की होड़ लग जाती है। बच्चे हो या बड़े, कटी पतंग को लेने के लिये भागते है, जिसे ‘पतंग लूटना’ बोलते है। पतंग की डोर को मांझा कहते है।

चाहे पतंगबाज़ी का शौक़ कम होता जा रहा है लेकिन अगर अतीत में देखे तो इस खेल के कारण हमारी सभ्यता में बहुत विकास हुआ है। पतंग का आसमान में उड़ने का मतलब हम अपनी महत्वांकाक्षाओं से जोड़ते है। बहुत साल पहले चीन और जापान में इनका उपयोग सैनिकों को संदेश पहुँचाने के लिये किया जाता था।

विक्रांत ने प्रतियोगिता तो जीती ही लेकिन पतंग के बारे में उसे काफ़ी जानकारी भी मिली। उसने ज़िंदगी का एक बहुत महत्वपूर्ण पाठ भी सीखा कि हमें अपना काम विश्वास के साथ धैर्य से करना चाहिये। एक साधारण सी दिखने वाली पतंग उसे बहुत कुछ सिखा गयी।

शब्द-अर्थ

  • महोत्सव – बड़ा त्यौहार
  • उमंग – ख़ुशी
  • धैर्य – सहनशीलता
प्राचीन खेल पतंगबाज़ी
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