First published in February 2016

करीब ३० साल पहले की बात है। मध्य प्रदेश के भोपाल शहर में श्रीमान उदय गुप्ता अपने सुखी परिवार के साथ रहते थे। वह यूनियन कार्बाईड कंपनी में नौकरी करते थे। उनकी एक प्यारी सी बेटी भी थी। उसका नाम था गीता। गीता तीसरी कक्षा में पढ़ती थी।

१९८४ के दिसंबर माह की बात है, गुप्ताजी कंपनी के काम के सिलसिले से मुंबई गए थे। सारा भोपाल शहर तथा गुप्ताजी का परिवार चैन की नींद सो रहा था। इतने में यूनियन कार्बाईड कंपनी के प्लांट ६१० में एक भयंकर विस्फोट हुआ। करीब ४२ टन मिथाईल आयसो-साइनाईट वायु पुरे वातावरण में फ़ैल गई। १५,००० से भी ज्यादा लोगो की दम घुटनें की वजह से मौत हो गई। दुर्भाग्यवश इन सब मृतकों में गुप्ताजी का परिवार भी था।

इस हादसे के बात गुप्ताजी पूरी तरह अकेले पड़ गए। उन्होंने कंपनी या सरकार की तरफ से मिलने वाला कम्पेनसेशन तक स्वीकार नहीं किया। रुपया-पैसा थोड़े ही गए लोगों को वापस ला पाता है। वह पूरी तरह से विरक्त हो गए। जल्द ही उन्होंने अपनी नौकरी से इस्तीफा दे दिया। गुप्ताजी अपनी जमा पुंजी तक आपदग्रस्तों को दान दे चुके थे।

फिर वह बिलकुल अकेले भूटान देश की ओर चल पड़े। उन्होंने एक बार क़िताबो में पढ़ा था की भूटान देश में पारस नाम का पत्थर मिलता है। पारस पत्थर एक ऐसा पत्थर होता है जो किसी भी धातु की चीज़ को स्पर्श करे तो वह चीज शुद्ध सोने की बन जाती है। फिर गुप्ताजी राह चलते-चलते हर पत्थर को  उठाते ओर अपने गले की चांदी की चेन को लगाते। फिर देखते की वह सोने की चेन में परिवर्तित हुई या नहीं।

Paras

ऐसा करते-करते कई साल बीत गए। गुप्ताजी अब लगभग बूढ़े हो चुके थे। एक दिन अचानक उनका ध्यान उनके गले की चेन की तरफ गया तो वह हैरान हो गए। वह चांदी की चेन सोने की चेन में परिवर्तित हो चुकी थी। फिर वह सोचते रह गए आखिर कौनसा पत्थर था जिसके स्पर्श ने उनके गले की चांदी की चेन को सोने की चेन में परिवर्तित कर दिया था। अब वह पत्थर खोजना सिर्फ मुश्किल ही नहीं नामुमकीन था।

गुप्ताजी आज भी भूटान देश में है। उन्होंने बौद्ध धर्म की दीक्षा ली है। अब वह अपना जीवन दूसरों के लिए व्यतीत कर रहे हैं।

दूसरों की मदद करके आज उनके चहरे पर जो मुस्कान दिखाई देती है वह सोने से भी ज़्यादा कीमती है। गुप्ताजी आज पहले से कई गुना ज़्यादा खुश हैं। शायद यही तो वह पारस पत्थर है  जिसका ज़िक्र अक्सर किताबो में किया जाता है।  

बच्चों, अपने जीवन में कई अवसर ऐसे आते हैं जो हम पूरी तरह से जी सकते हैं। कई बार अपना ध्यान कहीं और बंटा होता है। बच्चों के लिए पढ़ाई अच्छी सीख तथा बड़ो के लिए अपना परिवार, कामकाज और सदवर्तन, यह सब पारस पत्थर के बराबर ही है। इन सब बातों में हमारा जीवन स्वर्णमय करने की क्षमता है। हमें बस सही वक्त पर इन सब बातों पर गौर करना ज़रूरी होता हैं। बहुत कम लोग ऐसे होते हैं जो इन सब बातों को पहचान पाते हैं और अपने जीवन को सार्थक कर सकते हैं।

शब्दार्थ

  • आपदग्रस्तों – संकट में फसें हुए
  • विरक्त – संसार से परे
  • सदवर्तन – दूसरों के प्रति अच्छा बर्ताव
पारस
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