बहुत साल पुरानी बात है। मिथिला नामक एक छोटे से नगर में सत्यवान नाम का एक लकड़ियों का व्यापारी रहता था। उसके घर के आँगन में उसकी लकडियाँ बेचने की दुकान थी। उसकी दुकान शमशान घाट के बिलकुल सामने होने के कारण, ज्यादातर लकड़ी वह लोगों की अंतिम क्रिया के लिए बेचता था। उसका नाम तो सत्यवान था, लेकिन असलियत में वह बहुत ही धूर्त और झूठा इंसान था। मृत व्यक्ति के रिश्तेदारों को वह अक्सर महंगे दमों पर लकड़ी बेचता था। कई बार वह गरीब और जरूरतमंद ग्राहकों को तुरंत पैसे देने के लिये तक मजबूर कर देता था।   

उसकी पत्नी शीला हमेशा कहती थी कि इतना पैसे के पीछे भागना छोड़ दो। उसके बुरे कामों के कारण, ढेर सारा पैसा होने के बावजूद, वह दोनों जीवन में खुश नहीं थे। शीला कोई बच्चा न होने के कारण हमेशा दुखी रहती थी। वह हमेशा अपने नसीब को कोसती रहती। हमेशा यही सोचती कि यह सब सत्यवान के बुरे कर्मों और व्यापार करने के गलत तरीकों की देन है।

एक रात सत्यवान सोया हुआ था और उसे एक बुरा सपना आया। वह अपनी दुकान में हमेशा की तरह बैठा हुआ था। तभी एक बहुत बड़ा सा व्यक्ती उसकी तरफ आता हुआ दिखाई दिया। वह व्यक्ती एक बड़े काले भैंसे की पीठ पर विराजमान था। वह व्यक्ती भैसें से नीचे उतरा और चलकर सत्यवान की ओर चला आया। बदतमीज सत्यवान हमेशा की तरह उस व्यक्ती को अनदेखा कर अपने काम में व्यस्त होने का नाटक करने लगा। वह व्यक्ति बोला, “सत्यवान, आज तक तुमने हजारों पाप किये हैं। अब वक्त आ चुका है कि तुम्हें मौत की सज़ा देकर, तुम्हारी आत्मा को नर्क में भेजा जाये। चित्रगुप्त, जो इंसानों के पापों का हिसाब किताब रखते हैं, उन्की दी हुई सूची में तुम्हारा नाम सबसे पहला है।”

सत्यवान चौंक गया और बोला, “मैं मरने के लिये बिलकुल राज़ी नहीं हूँ।”

“तुम्हारा नाम इस सूची मैं सबसे पहला है! तुम्हारे प्राण तो मुझे लेने ही पड़ेंगे”, यमराज बोले।

सत्यवान के धूर्त मन में तुरंत ही यमराज को ठगने का ख़याल आया। वह बोला, “बिलकुल! क्यों नहीं? लेकिन आप साक्षात यमराज मेरे घर अतिथी के रूप में पधारे हैं। यह मेरा कर्तव्य बनता है कि मैं आपकी सेवा और सम्मान करूँ। हमारी मान्यता है कि ‘अतिथी देवो भव’, यानी महमान भगवान का रूप होता है!”

यमराज मान गये। तब सत्यवान ने शीला को दोपहर के भोजन के लिए पकाये सारे स्वादिष्ट व्यंजन यमराज को परोसने को कह दिया। शीला ने घर का सारा खाना यमराज को परोसा  और वह सामने कोने में खड़ी हो गयी। वह डर के मारे काँप रही थी, उसके पसीने छुट रहे थे। सत्यवान ने उसे अन्दर जाने को कह दिया। उसके बाद सत्यवान ने चुपके से यमराज के खाने में नींद की दवाई मिला दी। वह स्वादिष्ट खाना खाते ही यमराज को चक्कर आने लगे और वह सो गए। जब यमराज सो रहे थे तब धूर्त सत्यवान ने उनकी पापी इंसानों की सूची लेकर, अपना नाम पहले स्थान से मिटाकर आखरी स्थान पर लिख दिया।

घंटे दो घंटे बाद यमराज जाग गए। वह बहुत खुश नजर आ रहे थे। “तुमने मुझे इतना स्वादिष्ट भोजन खिलाया। मैं तुमसे प्रसन्न हूँ। इसीलिये मैं सूची का क्रम नजर-अंदाज करके शुरुवात से सूची ना पढ़ते हुए, उसके अंत से पढ़ना शुरू करता हूँ।“

बेचारा सत्यवान इस बार उसकी एक ना चली। वह कुछ ना कर पाया। यमराज के साथ उसे चुपचाप नर्क जाना पड़ा।

तो बच्चों, इस कहानी से हमें यह सीख मिलती है कि झूठ बोलना या किसी को ठगना बुरी आदत है। अपने गलत कर्मो का हमें कभी न कभी प्रायश्चित्त ज़रूर करना पड़ता है। इसिलए जिंदगी मैं हमेशा ईमानदारी और सच्चाई की राह पर चलना जरूरी हैं। ऐसे बर्ताव से तुम्हें हमेशा के लिए निर्दोष ओर खुशियों से भरी जिन्दगी हासिल होगी।

शब्दार्थ

  • विराजमान – उपस्थित
  • ठगने – धोका देना
  • साक्षात – शरीर रूप में प्रकट होना
Background music: Trio for Piano Violin and Viola (Kevin MacLeod) / CC BY 3.0

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पापी सत्यवान
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