Post Series: हिरण्मई और भानुप्रिया

हिरण्मई और भानुप्रिया अपनी ज़िंदगी की पहली उड़ान पर थीं! उन्होने हवाई जहाज के बारे में सीखा। 

हिरण्मई और भानुप्रिया दो बहनें थी। वो दोनों गाज़ियाबाद में रहती थीं, अपने नाना-नानी और मम्मी के साथ। वो आज बहुत खुश थीं, क्योंकि उनके पापा श्रीलंका की लड़ाई से वापस आ रहे थे। उनके पापा फौज में थे और अक्सर उन्हें अकेले ही जाना पड़ता था। कभी-कभार पूरा परिवार एक साथ रह सकता था। पापा के आने के बाद, वो लोग एक नयी जगह में रहने जा रहे थे – आईज़ौल।

आईज़ौल भारत के उत्तर-पूर्व में है और मिज़ोरम की राजधानी है। गाज़ियाबाद से वहाँ जाने का रास्ता काफी लंबा था। पहले उन्हे दिल्ली से कोलकता तक ट्रेन से जाना था। फिर वहाँ से हवाई-जहाज़ से सिल्चर तक। सिल्चर से आईज़ौल तक चार घंटे का रास्ता था।

पहली उड़ानयह उनकी पहली हवाई यात्रा थी। खूब तैयारी के साथ पूरा परिवार कोलकता हवाई-अड्डा पहुंचा। उनका हवाई-जहाज़ ९ बजे उड़ने वाला था। मगर ९ बजे तक भी पायलट नहीं आया था! दूर-दूर तक कोई यात्री भी नज़र नहीं आ रहा था। काफी इंतज़ार करके, पूरा परिवार हवाई-अड्डे में लगे इकलौते टीवी के सामने बैठ गया। टीवी के आस-पास बहुत भीड़ थी क्यूंकी उस पर ‘महाभारत’ आ रहा था। सभी लोग मंत्र-मुग्ध होकर ‘महाभारत’ देख रहे थे। १० बजे जब ‘महाभारत’ खत्म हुआ, उनके हवाई-जहाज़ का पायलट उठ खड़ा हुआ। आखिरकार हवाई-जहाज़ तैयार था!

हिरण्मई और भानुप्रिया ने पहले से ही खिड़की वाली जगह की मांग कर दी थी। उन दोनों को एक-दूसरे के आगे-पीछे वाली खिड़कियाँ मिली। हिरण्मई चिल्ला-चिल्ला कर भानुप्रिया को अपनी खिड़की का नज़ारा बता रही थी। मगर भानुप्रिया को भी वही नज़र आ रहा था, इसलिए वो सुनना नहीं चाहती थी! आखिर-कार उनके पापा ने उन्हे समझाया कि जब वो कार में बैठते थे, तो उनकी खिड़कियाँ कार के दो अलग तरफ होती थी, इसीलिए उनका दृष्य अलग होता था। अभी वो हवाई-जहाज़ के एक ही तरफ थीं, इसलिए पूरी दुनिया को चिल्ला-चिल्ला कर परेशान करने कि कोई ज़रूरत नहीं थी! यह सुन कर वो दोनों शांत हो गयी।

हवाई-जहाज़ अब लगभग उड़ने के लिए तैयार था। दरवाज़े बंद कर दिये गए थे, और सभी लोगों को अपनी कुर्सी की पेटी बांधने को कह दिया गया था। धीरे-धीरे हवाई-जहाज़ उड़ान-पट्टी की तरफ बढ़ा। दो पल रुका, और फिर खूब शोर-शराबे के साथ उड़ दिया। दोनों बहनों को डर बहुत लग रहा था, मगर आस-पास के लोग चुप-चाप बैठे हुए अखबार पढ़ रहे थे। ऐसे में छोटे बच्चों की तरह डर दिखाना उन्होनें उचित नहीं समझा।

पहली उड़ान

जब हवाई-जहाज़ हवा में सीधा हुआ, तो उन्हें खिड़की के बाहर ठीक से दिखाई दिया। अब कुर्सी की पेटी खोली जा सकती थी, इसलिए वो दोनों उचक कर बैठ गईं। नीचे अब सिर्फ बादलों की एक ऊन जैसी परत थी। इस ऊंचाईं पर बादल भी अजीब आकार ले रहे थे। ज़मीन से बादल चपटे से नज़र आते थे, मगर अब वो ऊंचे पेड़ों की तरह मोटे थे। हवाई-जहाज़ एक बादल का आधा चक्कर भी लगा रहा था!

उड़ान बहुत लंबी नहीं थी, सिर्फ एक घंटे का रास्ता था। उनकी मम्मी ने उन्हे बताया कि वो बांगला देश के ऊपर से भी उड़ कर  जाएंगे। इतनी ऊंचाईं से कहना मुश्किल था कि नीचे कौन सा देश है, क्योंकि आसमान से सब एक समान लगता है।

जब वह लोग सिलचर से थोड़ी ही दूर थे, उन्हें फिर से कुर्सी पर सीधा होकर और पेटी बाँध कर बैठने को कहा गया। उन्हें समझाया गया की ऐसा करने से वो सुरक्षित रहेंगे। नीचे जाते हुए हवाई-जहाज़ ने बादलों को एक बार फिर चीर दिया। अब उन्हें नीचे और भी कुछ नज़र आ रहा था। 

पहली उड़ानदिल्ली से जब वो चले थे, तो सिर्फ घरों और गाड़ियों का ही नज़ारा था। मगर सिल्चर आसमान से बहुत खूबसूरत था। आसाम के पहाड़ों पर बसा, सिल्चर में चाय बहुत उगाई जाती है। कई पहाड़ों पर सिर्फ चाय ही चाय थी! हवाई जहाज़ उन्हे सिल्चर की बरक नदी के ऊपर से भी ले गया, जिसके तट पर सिल्चर स्थित है।

अंततः हवाई जहाज़ सिल्चर हवाई-अड्डे पर उतर गया। उनकी पहली उड़ान लंबी नहीं थी, मगर पहली तो थी। हिरण्यमई और भानुप्रिया अब अपने दूसरे नए अनुभव के लिए तैयार थे!

शब्दार्थ:

  • उचित – ठीक
  • समान – एक जैसा
  • स्थित – बसा

नैतिक मूल्य:

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पहली उड़ान
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