रामदेव ने उस छोटे से टुकड़े को इस तरह भींच लिया था जैसे वह कागज न होकर उसका बेटा अरुण हो। रह–रह कर उसकी आंखों से आँसू बह रहे थे, मुट्ठी में बंद कागज भी उसकी नमी से गीला हो…

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परवरिश
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