First published in August 2016 लटक-झटक, मटक-मटक, चली चली रे चली, मैं उड़ चली, हवा के साथ-साथ मैं बह चली, कभी इधर तो कभी उधर, बस उड़ चली। ढील डोर की छोड़ो, आगे बढ़ते जाना है, ऊँचे-ऊँचे बादलों से आँख…

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पतंग
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