अंजन ने प्रधानमंत्री को नैतिक मूल्य का महत्व समझाया। 

अंजन पैदल चलता हुआ अपने घर पहुँचा, ताला खोला और अन्दर आया। घर में दो कमरे हैं, एकदम साधारण सा घर है। जीवन के लिए जरुरी चीजों के अतिरिक्त और कुछ नहीं है। एक कमरे में एक तरफ बिछी चटाई पर आकर वह बैठ जाता है और किसी गहरी सोच में डूब जाता है।

२८-३० वर्ष का अंजन कोई गरीब नहीं है, दिल का भी अमीर है और धन का भी। इसके पिता करोड़पति ही नहीं, अरबपति हैं। यह स्वयं भारत का शिक्षा मंत्री है। लेकिन ऐसा जीवन जीना इसे अच्छा लगता है। शादी इसने की नहीं है। यह औरों के लिए जीता है, देश-भक्ति इसकी रग-रग में भरी है।

बैठे-बैठे इसका ध्यान अतीत में चला जाता है। जब वह यही कोई १८-२० साल का होगा। एक दिन जब सड़क के किनारे-किनारे पैदल कहीं जा रहा था। उसका ध्यान वहीं एक बच्चे पर जाता है जो दूसरे बच्चे को गाली दे रहा होता है। अंजन मना करता है तो बच्चा उसे भी गाली देने लगता है।

अंजन बोलता है, “ऐसे नहीं बोला करते।”

वो बच्चा बोलता है, “मेरे पिता भी ऐसे ही बोलते हैं, मैं भी ऐसे ही बोलूँगा।”

नैतिक मूल्य

अंजन आगे बढ़ जाता है। वह सोचने लगता है कि इस बच्चे का क्या दोष है, इसने समाज में, अपने आस-पास यही सब देखा है, इसलिए यही सब सीखा है।

नैतिक मूल्यफिर उसका ध्यान जाता है जब एक दिन वह कार में अपने माता-पिता और बहन के बच्चे के साथ कहीं जा रहा होता है। उसके पिता बिस्कुट खाकर उसका पैकेट रास्ते पर डाल देते हैं। बहन का बच्चा भी केला खाकर छिलका रास्ते पर डाल देता है। वह बच्चे को मना करता है तो बच्चा कहता है, “नाना ने भी तो डाला है”। वह सोचने लगता है बच्चा तो वही सीखेगा जो बड़े करते हैं।

फिर उसे याद है वो दिन जब कक्षा में परीक्षा चल रही थी और दो टीचर ध्यान रखने के लिए घूम रहे थे कि कोई नकल ना करे। लेकिन फिर भी बच्चे नकल कर रहे थे। टीचर देखकर भी अनदेखा कर रहे थे क्योंकि उन्हें स्कूल का परिणाम अच्छा दिखाना था। वह सोचने लगा कि, “इस तरह तो देश का भविष्य बिगड़ रहा है। सिर्फ एक विद्यालय का परिणाम अच्छा बनाने के लिए पूरे देश के भविष्य को ख़राब कर देना कहाँ तक सही है?”

अब उसका ध्यान उस घटना पर जाता है जब वो बहुत छोटा था और अपनी बहन के साथ खेल रहा था। बहन ने खेल-खेल में एक साथी दोस्त के पत्थर से मार दिया।

जब उस साथी की मम्मी आई तो बहन ने कहा, “मैंने नहीं मारा है, ये झूठ बोलता है।”

फिर साथी की मम्मी चली गयी।

बहन अंजन से बोली, “तू मम्मी को मत बताना। जो भी बोलना है मैं बोल दूँगी।”

अंजन ने कहा, “लेकिन तूने ही उसे मारा है।”

बहन बोली, “अब सच बोलने से उसके लगी हुई सही तो नहीं हो जाएगी ना।”

अंजन ने सोचा, “थोड़ी सी डाँट से बचने के लिए अपना ईमान, अपने आदर्श बिगाड़ देना कहाँ तक सही है। आज छोटा झूट बोला है, कल बड़ा झूठ बोला जायेगा।”

नैतिक मूल्यफिर अंजन को याद आता है वो दिन जब उसके नैतिक शिक्षा में कम अंक आये थे और टीचर ने उसे पास करने के लिए अंक बढ़ा दिए थे।

अंजन बोला, “मैडम, आप मेरे अंक मत बढ़ाओ, वरना मेरी गलत आदत पड़ जाएगी।”

टीचर ने कहा, “नैतिक शिक्षा जैसे विषय में हम किसी को फेल नहीं करते, ऐसा हमें ऊपर से आदेश है।”

अंजन कुछ नहीं बोल सका। वह सोचने लगा “नैतिक शिक्षा क्या इतना छोटा विषय है? ये तो बहुत बड़ा विषय है, इसमें तो सभी को उत्तीर्ण होना चाहिए। क्या भूगोल, इतिहास, रसायन विज्ञान, गणित आदि से कम है नैतिक शिक्षा? नैतिक शिक्षा होगी तभी तो इन सभी चीजों का सही उपयोग सम्भव होगा।”

अपने कमरे में बैठे-बैठे अंजन का ध्यान अतीत से बाहर आया जब किसी ने दरवाजे पर घंटी बजायी। उसने खोला तो देखा प्रधानमंत्री घर पर आये थे। उसने उनका स्वागत किया। बैठने के लिए वही चटाई थी। प्रधानमंत्री ख़ुशी से वहाँ बैठ गए।

प्रधानमंत्री बोले, “बहुत दिनों से इच्छा थी तुम्हारा रहन-सहन देखने की। इसलिए आज बिना बताये आ गया।”

अंजन कुछ शर्मिन्दा होकर बोला, “मेरे पास आपके स्वागत के लिए कुछ नहीं है।”

प्रधानमंत्री ने कहा, “अंजन, तुम मेरे बेटे की तरह हो, और बेटे को पिता के स्वागत की जरुरत नहीं होती। तुम तो वो बताओ जो मुझसे कहना चाहते थे, काफी दिन से तुम मुझसे कुछ कहना चाहते थे ना।”

अंजन ने गहरी साँस छोड़ते हुए कहा, “हाँ, मेरी आपसे एक प्रार्थना है।”

प्रधानमंत्री ने कहा, “बोलो, निस्संकोच बोलो।”

अंजन ने कहा, “मैं चाहता हूँ कि सभी विषयों की तरह नैतिक शिक्षा में भी उत्तीर्ण होना अनिवार्य हो जाये और इसके उत्तीर्ण अंक कम से कम ४५% रखे जाएँ। साथ ही नैतिक शिक्षा विषय को बारहवीं तक रखा जाए।”

प्रधानमंत्री कुछ आश्चर्य के साथ बोले, “लेकिन तुम ऐसा क्यों चाहते हो?”

अंजन ने जवाब दिया, “आप मुझे बताइए, अगर हम दस मंजिल का घर बनाना चाहते हैं और नींव मजबूत ना रखें तो क्या होगा?”

प्रधानमंत्री ने कहा, “मकान नहीं बन सकेगा।”

अंजन कहता है, “इसी तरह ये नैतिक मूल्य ही देश की नींव हैं, ये बच्चों में होना जरूरी हैं वरना बच्चे जो भी करेंगे उसका परिणाम अच्छा आ ही नहीं सकेगा।”

प्रधानमंत्री अंजन की बात से सहमत हुए और फिर पूछने लगे, “नैतिक शिक्षा से बच्चों के नैतिक मूल्य कैसे अच्छे हो सकेंगे?”

अंजन ने कहा, “बच्चे नैतिक मूल्यों, जैसे सच बोलना, त्यागमय जीवन जीना, दूसरों को ख़ुशी देना, आदि, के बारे में कहाँ से सीख सकते हैं? यह समाज अब ऐसा नहीं है कि बच्चे यहाँ से ये सब सीख सकें। इसलिए मैं चाहता हूँ कि बच्चों को इन सबकी जानकारी विद्यालय से मिले। जब बच्चे इनके बारे में जानेंगे तभी तो अपने जीवन में भी उतरेंगे। और तभी वे अच्छे उद्देश्य के साथ काम कर सकेंगे।”

प्रधानमंत्री ने अंजन की भावनाओं का सम्मान करते हुए कहा, “मैं कल ही यह प्रस्ताव विधानसभा में पारित करवाता हूँ। तुम्हारा यह सपना साकार होगा अंजन बेटा। मैं तुम्हारे साथ हूँ।”

यह कहकर प्रधानमंत्री चले गए और अगले दिन यह प्रस्ताव पारित हो गया। अंजन को भारत वैसा ही गठित होता दिखने लगा जैसा उसने कल्पनाओं में सोचा था।

शब्दार्थ: 

  • अतिरिक्त – अलावा
  • अतीत – भूतकाल
  • उत्तीर्ण – पास

नैतिक मूल्य: 

इस लेखक की और रचनाएँ पढ़िये

 

नैतिक मूल्य
Average rating of 5 from 2 votes

Leave a Reply

Loading...