दशहरे – दिवाली की छुट्टियाँ शुरू होने वाली थी। आरुषि और यश के ताऊजी-ताईजी गाँव से आ रहे थे, उनके साथ त्योहारों की छुट्टियाँ बिताने। दोनों बच्चे बड़ी उत्सुकता से उनके इंतज़ार में लग गये। शहर में पले–बढ़े आरुषि और यश को ताऊजी हमेशा गाँव के बारे में नयी-नयी बातें बताते थे। पर उन्हें ज़्यादा मज़ा आता था ताईजी की नयी-पुरानी कहानियाँ सुनने में। कुछ कहानियाँ सच्ची होती तो कुछ बिलकुल मनगढ़ंत। पर ताईजी के कहानी सुनाने का अंदाज़ कुछ ऐसा निराला होता की सुनने वाला यकीन कर ही लेता था।

शरद ऋतु का आगमन था और बरसात का मौसम बस अभी ही खत्म हुआ था। इस बार पूरे देश में खूब बारिश हुई थी। नदी के किनारे बसे हुए उनके गाँव में तो बाढ़ भी आ गयी थी। पर ईश्वर की कृपा से ज़्यादा कुछ नुकसान नहीं हुआ था। फलतः ताईजी इस बार बाढ़ और बारिश की कहानियों का पिटारा लेकर आई थी। रोज़ ही एक नए वाक़ये की चर्चा चलती। ताईजी का एक और पसंदीदा विषय था साँप। बारिश के दिनों में गाँव में अक्सर साँप दिख जाते हैं। अतः इस विषय पर डरावनी और रोमांचकारी कहानियों का पूरा खज़ाना था उनके पास।

एक दिन यश और आरुषि शाम को टेलीविज़न पर साँपों पर एक ज्ञानवर्धक प्रोग्राम देख रहे थे।

ताईजी को यह बिलकुल न भाया, “अरे बच्चों, शाम हो गयी है। अँधेरा होने के बाद यानि रात को उनकी चर्चा तो दूर, मुँह से नाग देवता का नाम भी नहीं लेना चाहिए”।

आरुषि ने आदर सहित जवाब दिया, “ताईजी, किसी भी चीज़ से सावधान रहना तो अच्छी बात है, पर बेवजह डरने की जरूरत नहीं है”।

ताईजी खुद साँपों से बहुत डरती थी। इन शहरी बच्चों का साँपों से न डरना उन्हें बिलकुल न सुहाया, “तुम्हें कुछ पता नहीं है। साँप का काटा पानी भी नहीं मांग पाता है”।

आरुषि, जो की दसवीं कक्षा की छात्रा थी, काफी होशियार थी। वो ताईजी की कहानियों को ज़्यादा गंभीरता से नहीं लेती। उसके समझदार दिमाग को अपने तर्कसम्मत और वैज्ञानिक विचारों पर पूरा भरोसा था।

“ताईजी, अपने देश में साँपों की तकरीबन दो सौ बहत्तर तरह की प्रजातियाँ पायी जाती हैं। पर इन में से मात्र अट्ठावन किस्में ही जहरीली होती हैं। और इन्सानों के लिए तो सिर्फ़ कुछ ही प्रकार के साँपों के पास जानलेवा ज़हर होता है”।

आरुषि की बात सुन कर यश, जो की छोटा था व सातवीं कक्षा में पढ़ता था, आश्चर्यचकित हो गया।

“सच दीदी?”

“हाँ, मैंने पढ़ा है। कोबरा, करैत और वाइपर जैसे कुछ ही साँप विषैले होते हैं। ज़्यादातर लोग तो साँप के काटने के डर से ही चल बसते हैं”।

आरुषि की ऐसी बातें सुन कर ताईजी और भी ज़्यादा नाराज़ हो गयी।

“अच्छा, अगर ऐसा है तो ये हमारे गाँव में साँपों की पूजा क्यों करते हैं? और सिर्फ़ हमारे गाँव में ही नहीं, अपने देश के किसी भी कोने में चले जाओ, सभी जगह साँपों को आदर देने की प्रथा मिलेगी”।

“वो तो होना ही है। साँप हमारे कृषिप्रधान देश के सबसे अच्छे मित्र जो हैं”।

आरुषि ने ऐसा कहा तो यश की आँखें अचरज से फ़िर फैल गयीं।

“साँप और दोस्त?”

आरुषि समझाते हुए बोली, “हाँ, सबसे बड़े दोस्त। खेत-खलिहानों से चूहे जैसे जन्तु अनाज चट कर जाते हैं, और किसानों को कभी-कभी भारी नुकसान हो जाता है। पर साँप इन चूहों को खा जाते हैं। तो की ना उन्होंने हमारी मदद”।

ताईजी ने उनसे बहस बंद कर दी। उन्होंने दोनों हाथ जोड़कर मन ही मन कुछ प्रार्थना की, मानो अपने देवताओं से इन नादान बच्चों के लिए माफ़ी मांग रही हो, और वहाँ से उठकर चली गयी।

पर अब रोज़ ही ताईजी साँपों के धार्मिक महत्व, चमत्कारी घटनाओं व विभिन्न दुर्घटनाओं के किस्से उन्हें सुनाने लगी। एक दिन उन्होंने गाँव के एक प्रसिद्ध सँपेरा और उसके जादुई बीन की कहानी सुनाई।

“पर साँपों के कान नहीं होते। उन्हें कोई बीन की धुन सुनाई नहीं देती”, आरुषि न चाहते हुये भी बोल उठी। “वो तो बीन की हलचल की वजह से हिलने लगते हैं”।

जब ताईजी साँपों को दूध पिलाने की मान्यता के बारे में समझाने लगी तो आरुषि ने फ़िर से उनकी बात काट दी। उसे पता था की साँप दूध नहीं पीते।

आज ताईजी यश को नागमणि की कहानी सुना रही थी। उनकी कहानी में एक बदमाश इंसान ने नाग देवता की मणि चुरा कर उन्हें मार डाला था।

“फ़िर क्या हुआ ताईजी?” यश ने उत्सुकता से पूछा। उसे ताईजी की जादुई कथाएँ बहुत भाती थीं।

“फ़िर उसकी पत्नी, जो की एक इच्छाधारी नागिन थी, ने उस बदमाश इंसान से अपना बदला लिया था”। ताईजी की कहानी का अंत सुन कर आरुषि ने अपने बाल बिखेरे और यश के सामने खड़ी हो गयी।

“हाँ! मैं ही वो इच्छाधारी नागिन हूँ। तुमने बरसों पहले चोरी से मेरी चॉकलेट खाई थी। मैं आज तुम से उसका बदला लेने आई हूँ”।

Naag devta

यश का घबराया हुआ चेहरा देख कर वह हँसते-हँसते बेहाल हो गयी। “अरे बुद्धू! साँपों की याददाश्त इतनी लंबी नहीं होती। और इस नागमणि का भी कोई विशेष सबूत नहीं मिला है आजतक किसी को। वैज्ञानिकों का मानना है की कुछ बूढ़े हो गए साँप क्लोरोफेन नाम के पत्थर का इस्तेमाल करते हैं कीड़े पकड़ने के लिए। यह पत्थर गर्माहट देने पर अंधेरे में चमकने लगते हैं और कीड़े उसके पास चले आते हैं, जिसे ये साँप खा जाते हैं”।

यह सब सुन कर यश के जान में जान आई। ताईजी की सुनाई हुई विस्मयकारी कहानियाँ यश को बहुत रोचक लगती और वह उन्हें पूरे मन से ध्यान लगा कर सुनता। उसके संवेदनशील बालमन पर इन कहानियों का धीरे-धीरे असर होने लगा। किसी को पता भी न चला, पर मन ही मन वह साँपों के डर से ग्रसित हो गया।

त्योहारों की छुट्टियाँ ख़त्म हो गयी तो ताऊजी-ताईजी वापस गाँव चले गए। यश और आरुषि अपनी पढ़ाई–लिखाई और खेल–कूद वाले जीवन में फ़िर से व्यस्त हो गए।

दिन बीतते गए। बच्चों की अर्धवार्षिक परीक्षाएँ ख़त्म हो गयी। सर्दी की छुट्टियों में पूरा परिवार गाँव घूमने गया। यश और आरुषि को वहाँ बहुत मज़ा आ रहा था। घर में कई सारे बच्चे थे। वे दिन भर सभी बच्चों के साथ धमा-चौकड़ी मचाते रहते। अलग तरह का खान-पान और जीवन शैली थी यहाँ पर। गाँव में शाम होते ही सारे लोग घर आ जाते, व जल्द से जल्द खाना खाकर बिस्तरों में दुबक जाते। यश को कभी–कभी टेलीविज़न की कमी खलती थी। पर ताईजी की कहानियाँ सभी बच्चों का मन बहलाये रखती।

एक दिन दोपहर को सारे बच्चे पुआल-घर में खेल रहे थे। इस कमरे को अनाज रखने के लिए इस्तेमाल किया जाता था। दीवारें मिट्टी की थी और छत भूसे से बनी हुई थी।

बच्चे दौड़-दौड़ कर एक दूसरे को पकड़ने का खेल खेल रहे थे। तभी किसी लड़के को एक कोने में कुछ सरसराता हुआ सा दिखायी दिया। उसने तुरंत औरों को सावधान किया और इशारे से उधर दिखाया। सभी ने उधर देखा तो पाया की वहाँ एक बड़ा सा काला साँप था। वह दीवार के कोने में बने एक छेद से अंदर आ गया था। लगता है साँप ने भी बच्चों की मौजूदगी भाँप ली थी। वह कुंडली मारकर वही बैठ गया। सारे बच्चे चीख़–पुकार मचाते हुए कमरे से बाहर भागे। पर यश को तो मानो साँप सूंघ गया था। वह भागने के बजाय अपनी जगह पर किसी मूर्ति सा खड़ा रहा।

बाहर बच्चों की आवाज़ सुनकर ताऊजी भागे हुए आए। जैसे ही उन्हें सारा माजरा समझ आया, वे पुआल–घर की ओर लपके। चलते–चलते उन्होंने एक डंडा हाथ में उठा लिया। कमरे के दरवाज़े पर पहुँचकर ताऊजी ठिठक गए। अंदर बिलकुल अजीब सा नज़ारा था। यश सीधे टकटकी लगाए साँप को देख रहा था। साँप भी अपना पूरा फ़न फैलाकर उसे ही देख रहा था। ऐसा लग रहा था मानो उनके बीच कोई मूक वार्तालाप चल रही हो। सभी ज़ोर-ज़ोर से यश को वहाँ से भागने को कहने लगे। पर यश तो जैसे बंध सा गया था। वह हिल-डुल तक नहीं रहा था।

“नाग देवता मंत्र पढ़ रहे हैं, वशीकरण मंत्र। इसे सम्मोहित कर लिया है। अब यह सिर्फ़ उनकी ही बात मानेगा”। यह ताईजी की आवाज़ थी। वह दूर में दोनों हाथ जोड़ कर खड़ी थी।

तब तक शोर सुनकर यश के पिताजी भी वहाँ पहुँच गए। ताऊजी और पिताजी के बीच आँखों–आँखों में इशारे से बात हुई। पिताजी ने एक झटके में यश को अपनी ओर खींचकर गोद में उठा लिया। उसी समय ताऊजी ने झट से साँप के बगल में डंडा दे मारा। साँप अपनी जगह से हिला तो ताऊजी उसे डंडे से दीवार के उसी छेद की ओर धकेलने लगे। वे उसे भागने का रास्ता दिखा रहे थे। जल्द ही साँप वापस उसी छेद में घुसकर गायब हो गया।

“ताऊजी, उसे भगा क्यों दिया? मारा क्यों नहीं?” आरुषि ने आश्चर्य से पूछा।

“दोस्ती!” ताऊजी का इशारा आरुषि समझ गयी। आखिर साँप किसानों के दोस्त होते हैं। तभी गाँव में उन्हें न मारने की प्रथा प्रचलित है।

इधर यश की हालत कुछ अच्छी न थी। वह खोया-खोया रहता। नींद में बड़बड़ाते हुए उठ जाता था। ताईजी नाग देवता का सम्मोहन छुड़ाने के लिए उसे गाँव के तांत्रिक बाबाजी के पास ले जाना चाहती थी। पर आरुषि ने सबको समझाया की यश को साँपों के अत्यधिक डर के कारण इस घटना से शॉक यानि की भावनात्मक सदमा हो गया है। फ़िर समय बीतने के साथ धीरे-धीरे यश ठीक हो गया।

ताईजी के बनाए हुए लड्डुओं की ख़ुशबू पूरे घर में फैली हुई थी। पर उन्होंने बड़ी सख्ती से किसी भी बच्चे को उन्हें छूने से मना कर रखा था। आखिर यश से रहा न गया। उसने जैसे ही चुपके से एक लड्डू उठाया, सामने आरुषि को खड़ा पाया।

“वो…वो नाग देवता ने मुझ से यह लड्डू लाने को कहा है”। उसने घबरा कर कहा।

“नाग देवता लड्डू नहीं खाते। वे चूहे, मेंढक और चिड़िया खाते हैं। हाँ, उनके भक्तगण लड्डू खा सकते हैं”। आरुषि की हंसी छूट गयी।

यश ने जल्दी से मुंह में लड्डू डाला और दाँत निकालकर हंसने लगा।

शब्दार्थ: 

  • मान्यता – मंज़ूरी; सामाजिक स्वीकृति
  • वार्तालाप – बातचीत
  • सम्मोहन – मुग्ध करना; वश में करना
नाग देवता
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