नवीं कक्षा का प्रतिभावान बच्चा सुबोध छुट्टी के समय स्कूल से निकला तो अगले ही मोड़ पर उसके कुछ सहपाठियों ने उसे रोक लिया। वे सिगरेट पी रहे थे। उन्होंने सुबोध पर भी सिगरेट पीने के लिए जोर डाला। वह नहीं माना तो उसका मज़ाक उड़ाने लगे।

“यह तो दूध पीता बच्चा है, अरे कोई इसकी बोतल तो लाओ।”

“इसकी मम्मी ने कहा होगा कि बेटा स्कूल के बाद सीधे घर आना। अब इसकी मज़ाल क्या जो यह कहना न माने। डरपोक कहीं का”, टोली का नेता राकेश ठठाकर हँस पड़ा।

“अरे, जिंदगी के मज़े यह क्या जाने, यह तो पैदाइशी बोरिंग है, एक दिन किताबों में सिर घुसाये ऐसे ही मर जायेगा।”

ऐसे फिकरे कस कर वे उद्दंड बच्चे उस पर हँसते रहे।

पर सुबोध विचलित नहीं हुआ। अक्सर ही वो लोग उसे ऐसे परेशान करते थे। उसने बस इतना ही कहा कि “जब ये बुरी आदतें तुम्हारे अंदर बीमारियाँ पैदा करेंगी न, तब पता चलेगा तुम्हें। समय रहते सुधर जाओ नहीं तो बाद में पछताना पड़ेगा।”

वे बच्चे उस पर फिर से हँसने लगे। सुबोध अपने घर की और चल दिया।

कई वर्षों बाद शहर के एक बड़े अस्पताल में इंटर्नशिप कर रहे डॉ. सुबोध का सामना एक मरीज़ से हुआ। मरीज़ उसका सफेद कोट और स्टेथो देखकर बोला,” सुबोध तू! तू डॉक्टर बन गया!” सुबोध ने चौंककर मरीज़ की तरफ देखा तो देखता ही रह गया। यह तो राकेश था। इतना कमज़ोर और उम्रदराज़ लग रहा था। पता चला कि सिगरेट और शराब ने उसके फेफड़ों और लीवर पर बहुत बुरा असर डाला है।

राकेश अस्पताल में भर्ती हो गया था। सीनियर डॉक्टर के साथ सुबोध भी उसका इलाज़ कर रहा था। राकेश बिस्तर पर लेटा हुआ खाँसता रहता। उसे वे दिन बार बार याद आते, जब उसने गलत संगत में पड़कर सिगरेट और शराब की शुरुआत की थी। जिसको राकेश ने ज़िन्दगी का मज़ा समझ था उसी के कारण उसकी यह हालत हो रही थी। राकेश के मम्मी पापा उसकी देखभाल के लिए अस्पताल आते रहते। वे बड़े परेशान और दुखी दिखाई देते। जब उन्हें पता चला कि डॉक्टर सुबोध राकेश के सहपाठी रह चुके हैं तो उन्होंने बड़ी हसरत से डॉक्टर सुबोध की तरफ देखा। शायद वे सोच रहे होंगे कि “काश! हमारा बेटा भी ऐसा ही होता।”

गनीमत यह थी कि राकेश को अब अपनी गलती का अहसास हो गया था। कुछ क्षण का मज़ा लेने के लिए उसने अपने ही शरीर पर जो अत्याचार किये थे, उनका फल उसे अब भुगतना पड़ रहा था। ज़िन्दगी और स्वास्थ्य की कीमत अब उसे अच्छी तरह समझ आ रही थी। वह जीना चाहता था। ऐसे में सुबोध ने ही उसे जीने की राह दिखाई।

Nasha

सुबोध ने उसे नशामुक्ति केंद्र के बारे में बताया। उसने कहा कि वह अस्पताल से छुट्टी मिलने पर नशामुक्ति केंद्र में भर्ती हो सकता है। इसका खर्च बिलकुल नाममात्र का था। इसके लिए फॉर्म आदि भी सुबोध ने ही लाकर दिए थे। उसने राकेश और उसके मम्मी पापा को बताया कि यदि राकेश ईमानदारी और लगन से नशा छोड़ने की कोशिश करेगा तो नशामुक्ति केंद्र के लोग उसे बहुत जल्दी ही इस दलदल से निकाल लेंगे। उसने उन लोगों को यह भी बताया कि इस केंद्र की मदद से सैकड़ों लोगों ने नशे की लत से छुटकारा पाया है और अब वे सामान्य जीवन जी रहे हैं।

राकेश ने डबडबाई आँखों से सुबोध की ओर देखा और बोला, “सॉरी सुबोध! हमने तेरा मज़ाक़ उड़ाया और तूने सब भुलाकर मेरी इतनी सहायता की और मुझे जीने की नई राह दिखाई। मैं तेरा यह अहसान ज़िन्दगी भर नहीं भूलूँगा।”

सुबोध ने कहा, “अरे नहीं, अहसान की कोई बात नहीं है। हो सके तो अपने नशे के आदी पुराने दोस्तों की तलाश करना और उनकी भी इस लत से छुटकारा पाने में मदद करना। मैं समझूँगा कि तूने हिसाब-किताब बराबर कर दिया”।

राकेश की आँखों से आँसू बह रहे थे।

शब्दार्थ:

  • नाममात्र – बहुत कम
  • विचलित – अस्थिर
  • गनीमत – बड़ी बात; संतोष करने योग्य बात
नशा
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