अयप्पा पूरे जी जान से भाग रहा था। उसे प्रथम आना था। श्याम सुंदर उससे आगे था। अयप्पा ने अपना प्रयास तेज किया, जी जान लगाई और दोनों के बीच का अंतर कम होना शुरू हो गया। दौड़ का कठिन समापन हुआ। श्याम सुंदर एक सेकंड से चूक गया। अयप्पा जीत गया था। पर दोनों का ही प्रयास शानदार रहा।

श्याम सुंदर और अयप्पा नए सिपाही थे, जो रेजिमेंटल सेंटर में बुनियादी सैनिकों को दिए जाने वाला प्रशिक्षण ले रहे थे। वे सेंटर के वार्षिक खेलों में भाग ले रहे थे। यह प्रशिक्षण का अंतिम सत्र था।

श्याम सुंदर सिंह एक राजपूत था जो कि उत्तर प्रदेश के वाराणसी शहर से आया था। उसे अपनी वंशावली पर बहुत गर्व था क्योंकि उसके पिता और दादा, दोनों ही उससे पहले सैनिक रह चुके थे। वह एक तीसरी पीढ़ी का सैनिक था जो कि अपने पौराणिक योद्धा घराने के धर्म को निभा रहा था।

अयप्पा लिंगराज तमिलनाडु के एक सुदूरवर्ती गांव, अय्यप्पन, के एक साधारण निम्न मध्यम-वर्गीय परिवार से था। उसके पिता और दादा किसान थे। वह भारतीय सेना में शामिल होने वाला, अपने परिवार से पहला आदमी था। उसका आठ सदस्य का परिवार उस पर और सेना से मिलने वाले उसके वेतन पर पूरी तरह निर्भर था।

सेंटर में उनकी प्रतिद्वंद्विता की जानकारी सभी को थी। सेंटर में किसी भी प्रतियोगिता में विजेता और उप विजेता दोनों में से ही कोई होता था। प्रशिक्षण के अंत में दोनों ने ही शूटिंग, खेल, शैक्षिक और सैन्य प्रशिक्षण के लिए सर्वोच्च सम्मान प्राप्त किया। दोनों को ७७१ रेजीमेंट की १८वीं बटालियन में प्रविष्ट किया गया।

श्याम सुंदर ‘ए’ या ‘अल्फा’ कंपनी के लिए तैनात किया गया और अयप्पा ‘डी’ या १८वीं बटालियन की ‘डेल्टा’ कंपनी के लिए तैनात किया गया। (बटालियन को कंपनियों में विभाजित किया जाता है जिसमें लगभग २०० सैनिक होते हैं।) उनकी प्रतिद्वंद्विता की कहानी १८वीं बटालियन में जारी रही। सभी प्रतियोगिताओं में, यही दोनों हमेशा एक दूसरे के साथ प्रतिस्पर्धा करते रहे।

१९९९ की गर्मियों में, भारतीय सीमाओं का उल्लंघन किया गया; आतंकवादियों के वेष में दुश्मन सैनिक, देश की सीमाओं के अन्दर घुस आये। भारतीय सेना युद्ध के लिए गतिशील हुई और उसे इन आतंकवादियों को भारतीय क्षेत्र से बाहर फेंकने का काम सौंपा गया। १८वीं बटालियन इस काम के लिए शामिल की जाने वाली पहली टुकड़ियों में से एक थी।

बटालियन को बटालिक सेक्टर की दो चोटियों, पॉइंट २५४० और २५४२ पर कब्ज़ा करने का काम सौंपा गया। कप्तान अरमान वर्मा के तहत एक टोही पार्टी भेजी गई जिसमें अयप्पा और श्याम सुंदर दोनों ही थे। सूरज की किरणों के अलविदा बोलने से पहले पार्टी अपने कार्य के लिए निकल पड़ी। अंधेरा सैनिक का सबसे बड़ा दोस्त है। प्रशिक्षण के दौरान सैनिकों में अँधेरे में देखने और सुनने के कौशल का विकास किया जाता है। एक सैनिक अँधेरे में इस तरह देख सकता है जिसका कि एक सामान्य व्यक्ति विचार भी नहीं कर सकता।

पार्टी एक हिम तेंदुए की तरह ख़ामोशी से पहाड़ पर ऊपर की तरफ बढ़ी, कोई शोर किये बिना और केवल सांकेतिक भाषा में बात करते हुए या अधिक से अधिक फुसफुसाते हुए। छिपाव उनकी ताकत थी और अंधेरा उनका दोस्त। वे अपने साथ उच्च विभेदन कर सकने वाले ऑप्टिकल उपकरण लिए हुए थे, जो अंधेरे में भी थोड़ी सी भी हरकत को रिकॉर्ड कर सकते हैं। टीम एक प्रेक्षण स्थल पर ठहरी और उसने निगरानी शुरू कर दी। टीम दो समूहों के दल में पूरे क्षेत्र में दुश्मन के संकेत की खोज करने लगी। टोही पार्टी दुश्मन के स्थान का सटीक पता लगाने में सक्षम हुई और उन्हें बेदखल करने के लिए हमले की योजना अगली रात के लिए बनाई गई।

११०० घंटे पर यानी कि सुबह के ११:०० बजे, आर्टिलरी ने बमबारी शुरू कर दी। आर्टिलरी का मतलब है बड़ी तोपें; बोफोर्स के जैसे कैनन, जिनका उपयोग दुश्मन की रक्षात्मक किलेबंदी को नष्ट करने के लिए किया जाता है। ये भारी बंदूकें आधी रात तक गरजती रहीं, जब वास्तविक हमला शुरू किया जाना था।

कप्तान अरमान वर्मा के नेतृत्व में किया गया हमला, असफल रहा। दुश्मन अच्छी तरह से दृढ़ बंकरों में ऊंचाइयों पर बैठा हुआ था और वहां से उसने भारतीय सेना पर भारी हमला किया। कप्तान अरमान वर्मा ने पीछे हटने से इनकार कर दिया। सैनिक उसी स्थान पर रुके और वहां से उन्होंने जवाबी कार्रवाई की। तोपों का और बारूद लाया गया और दुश्मन पर चलाया गया।

अचूक और सटीक तोपों के निशाने का वांछित प्रभाव होने लगा। दो घंटों के अन्दर दुश्मन के ज़्यादातर भारी हथियारों को नष्ट कर दिया गया किन्तु एक मशीन गन अभी भी बची थी जो लगातार फायरिंग करके जवानों को हताहत कर रही थी।

श्याम सुंदर को एक छोटा सा मार्ग दिखाई दिया, जो पूरी तरह से अदृश्य था और उस मशीन गन पोस्ट की ओर जा रहा था। वह छिपकर एक बिल्ली के समान दबे पाँव से पोस्ट की दिशा में आगे बढ़ा। वह उस पोस्ट पर हमला करने के उद्देश्य से धीरे-धीरे आगे बढ़ा। अचानक उसे अपने आगे, १० मीटर की दूरी पर, कुछ हरकत दिखाई दी। उसने अपनी कटार से उस व्यक्ति पर हमला करने का फैसला किया। वह छलांग लगाने ही वाला था कि उसको एहसास हुआ कि वह तो अयप्पा था। फुसफुसाते हुए उसने पूछा, “तुम यहां क्या कर रहे हो?”

अयप्पा ने उत्तर दिया, “मैं पीछे से उस पोस्ट पर हमला करने के लिए जा रहा था, चलो अब एक साथ यह करते हैं।”

“नहीं”, श्याम सुंदर ने कहा, “मैं अकेले ही जाऊंगा, तुम मेरा बचाव करो।”

अयप्पा को एहसास हुआ कि यह बहस करने का सही समय नहीं था और उसने चुपचाप अपनी सहमति व्यक्त कर दी। वे छिपकर, धीरे-धीरे आगे बढ़े, और वो पोस्ट स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगा। श्याम सुंदर ने अयप्पा को वहीं रुकने का इशारा किया। उसने कहा कि वहां से वो अकेले आगे बढ़ेगा। वह आगे बढ़ा और अयप्पा ने अपनी राइफल का लक्ष्य पोस्ट की तरफ बनाए रखा।

जब श्याम सुंदर पोस्ट से सिर्फ १० मीटर की दूरी पर था तब दुश्मन ने उसे देख लिया। दुश्मन ने उस पर गोली चलाई जिसमें उसका पैर ज़ख्मी हो गया। वो चलने में असमर्थ हो गया। उसके ऊपर भारी गोलाबारी होने लगी। अयप्पा को क्या हुआ? वह कहाँ है? लगता है भाग गया, उसने सोचा।

श्याम सुंदर दुश्मन पर गोली चलाता रहा। उसका गोला बारूद समाप्त होने वाला था। अब उसे मौत करीब दिखाई दे रही थी। मैं एक राजपूत योद्धा की तरह मरूँगा, उसने सोचा। अपनी सारी इच्छा शक्ति के साथ वह दुश्मन की ओर अंतिम हमले के लिए आगे बढ़ा। दुश्मन उस पर लगातार फायरिंग कर रहा था। इस बार उसको दाएँ कंधे पर गोली लगी। गिरते-गिरते उसको दुश्मन के दो जवान, पोस्ट से बाहर गिरते हुए दिखाई दिए। उनकी चीखें पहाड़ों में गूंज गईं। दुश्मन की गोलाबारी बंद हो गई थी।

श्याम सुंदर ने पोस्ट तक अपने आप को किसी तरह खींचा और वहां उसने अयप्पा को पड़े हुए देखा। उसकी छाती पर गोली के घाव थे। वह मर रहा था। अयप्पा पीछे से रेंगता हुआ आया था और उसने गोलीबारी मशीन गन को खींच कर दुश्मन के दो सैनिकों को नीचे फेंक दिया था।

पोस्ट निष्प्रभावी हो गया। इसके तुरंत बाद कप्तान अरमान इस पोस्ट पर पहुंच गए और उन्हें इन बहादुर सैनिकों की बहादुरी का पता चला। पॉइंट २५४० और २५४२ की दोनों चोटियाँ अब भारतीय नियंत्रण में थीं।

अयप्पा और श्याम सुंदर दोनों को निकटतम सेना अस्पताल में पहुंचा दिया गया। राष्ट्र की ज़रुरत के समय उनकी तीव्र प्रतिद्वंद्विता सहयोग में बदल गई और दोनों ने अपने देश के लिए लड़ाई में साथ-साथ जीत हासिल की।

शब्दार्थ:

  • प्रतिद्वंद्विता – मुकाबला
  • प्रविष्ट – दर्ज किया जाना 
  • विभेदन – विश्लेषण

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दो सैनिकों की कहानी
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