अन्नी सात साल का समझदार बच्चा हो गया है। 

उसने अपनी मित्र मंडली से चर्चा की – क्यों ना हम इस बार दीपावली को विशेष तरीके से मनायें? 

“विशेष तरीके से? कैसे?”, सभी मित्रों ने एक साथ पूछा। 

तनवीर बोला, “विशेष तो हर बार होती है। नए-नए अनोखे पटाखे आते है।”

खुशी बोली, “अरे हाँ! हर साल नए-नए सजावट के सामान आते है।”

आदिश बोला, “अरे भाई, मुझे तो हर साल इतने सुन्दर उपहार, जिसमें मिठाइयाँ, चॉकलेट मिलती है।”

प्रगुण बोला, “हाँ भाई हाँ, क्योंकि मौसम बदलता है। इसलिए हर बार, दीपावली पर विशेष तौर पर नए-नए कपड़े आते है।”

अद्वैत बोला, “भाई, मुझे तो हर साल नई-नई, रंग-बिरंगी बल्ब की झालरें बहुत अच्छी लगती है।”

खुशी बोली, “वही तो! अब बताओ सब कुछ विशेष ही तो है। तुम कैसे इसे विशेष बनाओगे?”

अन्नी बोला, “कोई भी त्यौहार विशेष तब होता है, जब उसमे हमारे सारे मित्र भी शामिल हों!”

“मतलब? क्या हम सब एक साथ दीपावली नहीं मनाते हैं?”, सारे मित्र चिल्लाने लगे। 

“अरे सुनो तो! हमारे मित्र मतलब – मेरा बंजी कुत्ता, खुशी का मिट्टू तोता, आदिश की दुलारी गाय, प्रगुण की चुनचुन गौरिया, अद्वैत की कट्टो बिल्ली – सब!” अन्नी बोला। 

खुशी बोली, “अरे पर ये तो पटाखें चलाते नहीं। तेज़ रोशनी इन्हे अच्छी लगती नहीं, तो ये सब दीपावली कैसे मनाएंगे?” 

अद्वैत बोला, “इन्हें पूजा के समय बैठा लेंगे और सबको मिठाइयाँ खिलाएंगे।”

अन्नी बोला, “वही तो मैं समझा रहा हूँ। हम तो दीपावली की खुशी में खो जाते है और हमारे दोस्त, जिनके साथ हम रोज़ खेलते हैं, वो पटाखें और तेज़ रोशनी के डर से अंदर दुबक जाते है। कितने दुःख की बात है। “

“हाँ! हाँ! तुम बिलकुल ठीक कह रहे हो!” सभी बोले। 

अब सबके विचार आने लगे – “हम फूल-पत्तियों से सजावट करे।“, “हल्दी, आटे और सुन्दर फूलो से रंगोली सजाये, पटाखें इतने हलके रखे कि इन्हे बिलकुल डर ना लगे”।

“ईश्वर की वन्दना भी घंटी, मंजीरा, थाप ढोलक से सभी के साथ करे। जिससे दोस्त भी झूम-झूम कर दीपावली मनायें”।  

“हुर्रे! हुर्रे! भई वाह! मज़ा आ गया!”, सभी हर्षोल्लास से भर चिल्लाने लगे।

शब्दार्थ

  • हर्षोल्लास – खुशी
  • वंदना – पूजा

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दोस्त दीपावली
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