चंदन नगर में एक पाँच मंज़िला इमारत थी। जिसके सामने एक बहुत पुराना नीम का पेड़ था । उसकी एक डाल इमारत की पहली मंज़िल की बालकनी को छू रही थी ।

पेड़ पर बहुत सी गिलहरियाँ रहती थीं । उनके प्यारे से घोंसलें थे और वे सब मिल-जुलकर रहती थीं । उनमें से एक गिलहरी बेहद शैतान लेकिन बहादुर थी, जिसका नाम टुकटुक था । वह हर दिन डाल से कूदकर, पहली मंज़िल के घर की रसोई से कुछ न कुछ खाना लेकर आती थी । सुबह होते ही रसोई से मज़ेदार खाने की ख़ुशबू आने लगती और पूरी बालकनी में फैल जाती ।

उस घर में बरफी नाम का एक कुत्ता था, जो बालकनी में दिन भर मज़े से सोता था । शैतान टुकटुक जब खाना लेकर भाग रही होती थी, तो पहले ज़ोर से शोर मचाकर बरफी को उठाती थी । बेचारा हर दिन घबरा कर उठता और भौंक-भौंक कर घर सर पर उठा लेता । टुकटुक हँस-हँस के लोट-पोट हो जाती ।

बरफी उससे बेहद परेशान था । वह उससे कहता,”टुकटुक जिस दिन तू मेरे हाथ आई न, मैं तेरा कचूमर बना दूँगा ।” पर टुकटुक पर कोई असर न होता ।

एक दिन टुकटुक ने देखा कि एक ख़तरनाक बिच्छु बरफी के पैर की ओर बढ़ रहा था । इससे पहले कि वह उसे काटता, टुकटुक ने शोर मचाकर बरफी को उठा दिया । वह झल्ला कर उठा तो टुकटुक बोली, “ज़्यादा मत उछलो, तुम्हारी जान बचाई है ।” बरफी ने देखा पर कुछ कहा नहीं, बस उठकर अंदर चला गया ।  टुकटुक बड़बड़ाई, “कितना घमंडी है ।”

एक दिन टुकटुक ने जैसे ही बालकनी से  डाल पर छलाँग लगाई, वह धड़ाम से सीधा बरफी के सामने गिरी । वह उठा तो उसका मुँह बिलकुल टुकटुक  के उप्पर था । टुकटुक के तो काटो तो ख़ून नहीं! बरफी उसे कुछ देर देखता रहा, फिर बोला, “जा तुझे छोड़ दिया लेकिन अगली बार मुझे  जगाया तो देखना”। कुटकुट तीर की  तरह दौड़कर पेड पर चढ़ गई और फिर चिल्लाकर बोली,”सोने तो मैं नहीं दूँगी तुम्हें!” बरफी मुस्कुरा कर अंदर चला गया और टुकटुक उछलते-कूदते अपने दोस्तों को आज का क़िस्सा  बताने भागी । जाने अनजाने में उसे एक नया दोस्त जो मिल गया था!

शब्दार्थ

  • झल्लाना – चिढ़ना
दुश्मन बना दोस्त
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