देखिये आस पास, आपकी दुनिया बदल रही है। आजकल पुरुष और महिला एक दूसरे के समान हैं, न कोई बड़ा, न कोई छोटा।


“बताओ, लड़की ने रिश्ते को मना कर दिया”, बुआ आश्चर्य से एक हाथ गाल पर रखकर बोलीं। “ये जो लड़कियों को ज्यादा पढ़ाने लगे हैं न, यह अच्छी बात नहीं है, लड़कियाँ भी बढ़ चढ़ कर बोलने लगी हैं”।

“जीजी! लड़की राहुल से ज्यादा कमा रही है”, माँ ने बुआ से कहा। दरअसल मेरे दूर के रिश्ते के एक भाई के बारे में ये सब बातें हो रही थीं।

“तो क्या हुआ, जब दोनों कमायेंगे तो कोई कम, कोई ज्यादा तो कमायेगा ही। हमारे ज़माने में तो लड़कियाँ चूँ तक नहीं करती थीं। जहाँ बुज़ुर्गों ने तय कर दिया, चुपचाप गऊ सी चली जाती थीं इस खूँटे से उस खूँटे तक”।

मुझसे चुप नहीं रहा गया। मैंने कहा, “बुआ! उस समय लड़कियों को इतनी आज़ादी ही कहाँ थी कि उनकी राय भी जानी जाये। ज़्यादातर लड़कियाँ शादी के बाद कुछ सालों तक ज़्यादा परेशान रहती थीं, फिर रो धोकर किसी तरह एडजस्ट कर लेती थीं। दूसरा कोई चारा ही नहीं होता था उनके पास”।

Duniya badal rahi hai

माँ ने मुझे इशारे से चुप होने को कहा। वैसे भी मेरे ऑफिस जाने का वक्त हो रहा था। मैं सबसे नमस्ते करके घर से निकल गयी।

रास्ते में मैट्रो में मेरे कुछ साथी लड़के-लड़कियाँ मिल जाते थे। हम लोग एक ही ऑफिस में काम करते थे तो सबसे बातचीत होती ही रहती थी। रास्ते में एक टॉपिक छिड़ गया कि अब महिलाएँ घर से बाहर निकलती हैं काम करने के लिए तो घर में क्या क्या परेशानियाँ आती हैं। कुछ साल पहले का किस्सा सबकी ज़बान पर था कि एक ऑफिस में ऊँचे पद पर काम करने वाली एक महिला के पैरों तले जमीन खिसक गई, जब उसे पता चला कि जिस आया के भरोसे वह अपने छह महीने के बच्चे को छोड़कर जाती है, वह उसे एक भिखारिन को किराये पर देती है भीख माँगने के लिए। महिला के घर आने से पहले वह उसे वापिस लाकर नहला धुलाकर सुला देती थी इसलिए पहले एक महीने तक तो महिला को इस धोखाधड़ी का पता ही नहीं चल पाया था।

शिशिर बोला, “बच्चों की परवरिश करने के लिए उनकी माँ से अच्छा कोई साबित नहीं हो सकता। अच्छा तो यही है कि शुरुआत में कम से कम कुछ साल तक माँ ही उनकी देखरेख करे”।

तो सारिका बोली, “जब महिलाएँ घर पर रहकर घर और बच्चे सम्भालती थीं, तब पुरुष उनका महत्व ही नहीं समझते थे और उन्हें अपने से छोटा महसूस कराने लगते थे। कई बार तो उन पर अत्याचार भी करने लगते थे”।

ईशिता बोली, “इसीलिये लड़कियाँ घरों से बाहर निकलीं। और अब देखा जाये तो उन्होंने कोई भी फील्ड ऐसा नहीं छोड़ा, जिसमें वे लड़कों से पीछे हों। अब उनके बाहर जाने से और काम करने से घरेलू समस्याएं पैदा हो रही हैं”।

शिशिर बोला, “बात यह है न कि अब जब महिलाएं अपने पैरों पर खड़ी हैं, तो वे पुरुषों से दबती नहीं हैं। दोनों पक्ष अपनी अपनी बात पर अड़ जाते हैं, इसलिए गाड़ी आगे नहीं बढ़ पाती। कहने वाले तो यहाँ तक कह देते हैं कि महिलाओं का आगे निकलना भी परिवारों को तोड़ रहा है”।

“नहीं, यह बात नहीं है”, पारस बोला, “दरअसल समस्या की जड़ यह है कि पुरुष आज भी अपने आपको महिलाओं से बड़ा समझते हैं। जब तक वे उन्हें बराबरी का दर्ज़ा नहीं देंगे, तब तक यह जंग जारी रहेगी”।

“हाँ, सही कहा तुमने”, प्रज्ञा बोली, “परिवार में जब भी त्याग की जरूरत होती है, महिला को ही आगे आना पड़ता है। यह गलत बात है। समझौता, त्याग, बलिदान, ये सब महिलाओं के ही हिस्से में क्यों हैं? घर की हर समस्या के समाधान के लिए स्त्री पुरुष दोनों को भागीदार होना चाहिए”।

“बिल्कुल”, सारिका बोली, “मेरी दीदी भी जॉब करती हैं। घर की सारी जिम्मेदारी दीदी और जीजाजी मिल-बाँटकर निभाते हैं। एक बार मेरे भान्जे दीपू को टॉयफायड हो गया। कुछ दिन तक वह स्कूल भी नहीं जा पाया। तो दीदी जीजाजी ने बारी-बारी से छुट्टी लेकर उसकी देखभाल की”।

“ऐसा ही होना चाहिए”, आराध्या बोली, “अब तो पूरी दुनिया में ऐसे कानून भी बन रहे हैं जो महिलाओं के बाहर काम करने में सहायक हो सकेंगे। हमारे देश में भी ऐसा कानून पास हो गया है कि महिला को माँ बनने के बाद छब्बीस हफ्ते तक की पेड लीव मिल सकती है। यहाँ तक कि, अगर उन्होनें बच्चे को गोद लिया है, तब भी १२ हफ्ते की पेड लीव दी जायगी। अभी पिताओं के लिए, पैटरनिटी लीव लॉं हमारे यहाँ नहीं बना है, लेकिन बहुत सी कम्पनियाँ ऐसी सुविधाएं दे रही हैं जिनमें बच्चे के जन्म के बाद या बच्चे को गोद लेने के बाद भी, माता के अलावा पिता को भी कुछ वेतन सहित छुट्टियाँ दी जा सकेंगी। इन सब चीजों से बच्चों के पालन पोषण में सहायता मिलेगी”।

“अच्छा! बातों में लगकर सब ये मत भूल जाना कि अब हमारा मैट्रो स्टेशन आने ही वाला है”, मैंने कहा।

“अच्छा तो फिर मिलते हैं”, कहकर सब थोड़ी देर बाद मैट्रो से उतरकर आगे चल दिये।

चलते-चलते मैंने मोबाइल फोन में पापा का मैसेज पढ़ा। पापा ने लिखा था। “कल मेरी रानी बिटिया को मेरे लिए दामाद ढूँढने जाना है”। पढ़कर मुझे हँसी आ गयी। पापा ऐसे ही करते हैं। मैट्रिमोनियल साइट्स पर मेरी शादी के लिए विज्ञापन दे रखा है। जब उन्हें बॉयोडाटा आदि के आधार पर कोई रिश्ता सही लगता है तब मेरी और उस लड़के की एक मीटिंग करवा देते हैं। उनका वादा है मुझसे कि जब मुझे कोई लड़का सही लगेगा तभी वे बात को आगे बढ़ाएंगे।

पापा कहते हैं कि अब शादी सही उम्र में होती है, बचपन या किशोर उम्र में नहीं। तो फिर लड़की को भी पूरा अवसर दिया जाना चाहिए कि वह अपनी पसन्द से लड़का चुने। जब लड़की इतनी बड़ी और समझदार हो जाती है कि बाकी सभी महत्वपूर्ण निर्णय अपने आप ले सके, तो फिर शादी जैसे महत्वपूर्ण विषय में उसकी राय को कैसे नज़रअंदाज़ किया जा सकता है। फिर मुझे सुबह वाला बुआ का डायलॉग याद आ गया और मैं मन ही मन मुस्कुराती हुई आगे बढ़ गयी।

शब्दार्थ:

  • भीषण – बहुत अधिक और तेज

नैतिक मूल्य:

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दुनिया बदल रही है
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