दिव्यांग लोगों को ईश्वर ने कुछ अलग शक्ति दी है। यही उनको उड़ने की शक्ति देती है। 

First published in November 2016


एक स्थान पर चार आदमी एक साथ रहते थे। उनमें एक अंधा, एक लंगड़ा, एक गूंगा और एक बहरा था। चारों अपने आप को बड़ा ही अभागा समझते थे। वे अक्सर अपने दुर्भाग्य के कारण चिंतित रहते थे। अंधे का कहना था कि संसार में आँख ही एक ऐसी है जो भाग्य और सुख प्रदान कर सकती है। बहरे का कहना था कि कान ही केवल सौभाग्य लाने वाले अंग हैं। गूंगे का मानना था कि जीभ ही मानव का महान अंग है, इसके बिना सब पशु हैं। इसी प्रकार लंगड़े का भी कहना था कि मनुष्य का सौभाग्य लाने के लिए उसे अपने पैरों पर खड़ा होना जरूरी है।

चारों ने निश्चय किया कि वे भगवान से अपने प्रति हुए अन्याय की शिकायत अवश्य करेंगे, यही सोच कर वे एक दूसरे की सहायता से मंदिर की ओर चल पड़े। मंदिर में किसी गुरुदेव का प्रवचन चल रहा था। काफी भीड़ थी, वे भी चुपचाप पीछे बैठ गए और ध्यान से प्रवचन सुनने लगे। बहरा व्यक्ति लोगों के हावभाव से और गुरुदेव की मुखमुद्रा से प्रवचन का अंदाज लगा रहा था।

गुरुदेव का प्रवचन जारी था, “ईश्वर जो कुछ करता है अच्छा ही करता है। मनुष्य का जीवन पाकर उसका पहला कर्तव्य है कि वह सच्चे मन से, ईमानदारी से, निष्ठा से कार्य करे क्योंकि कर्म ही व्यक्ति के भाग्य को बदलता है एवं उसके पाप और पुण्य का कारण बनता है। ईश्वर यदि किसी को अपंग बना देता है तो इसकी पूर्ति वह किसी न किसी प्रकार करता है। जैसे अंधे व्यक्ति की स्पर्श शक्ति को वह इतना बढ़ा देता है कि वह इससे बहुत कुछ समझ जाता है। ईश्वर उसके सामने कार्य करने की चुनौती रखता है। जो इसे स्वीकार कर लेता है उसे सफलता निश्चित ही मिलती है। अपंगता सौभाग्य या दुर्भाग्य का कारण नहीं, इसके लिए उत्तरदायी होते हैं उसके कर्म। कर्म के प्रति उसकी निष्ठा और लगन इतनी होनी चाहिए कि ईश्वर भी उससे पूछने लगे – खुदी को कर बुलंद इतना कि खुदा बंदे से खुद पूछे, बता तेरी रजा क्या है?

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कितने ही अपंग व्यक्तियों ने वे काम कर दिखाए हैं जो चमत्कृत कर देते हैं, शारीरिक दोष उनकी प्रेरणा बन जाते हैं। गायक, गीतकार, संगीतकार रवीन्द्र जैन को कौन नहीं जानता? उनकी आँखों में दृष्टि नहीं लेकिन उनके ज्ञान चक्षु से कौन परिचित नहीं। श्री सतीश गुजराल सुन नहीं सकते थे लेकिन उनकी पेंटिंग क्या कुछ नहीं कहती–सुनती। अरुणिमा सिन्हा जिनका एक पैर ट्रेन से कट गया था उन्होंने चौबीस वर्ष की अवस्था में २०११ में एवरेस्ट पर विजय हासिल की। जिसे अबला कहा जाता है उसने एक पैर से वह काम कर दिखाया जिसे लोग सोच भी नहीं सकते। स्टीफन हौकिंस को कौन नहीं जानता! बीमारी ने उनके शरीर के सभी अंगो को निर्जीव कर दिया, सिर्फ उनके मस्तिष्क और निगाहों के बल पर “ब्लैक होल” के बारे में संसार को बताया। ऐसे रहस्य से पर्दा उठाया जिसे कोई नहीं जानता था। हमारे प्रधान मंत्री ने इन्हें नया शब्द दिया “दिव्यांग”। सच है ईश्वर ने उन्हें कुछ अलग शक्ति दी है। ये कमी ही इनकी दिव्यता है”।

प्रवचन जारी था लेकिन चारों मित्र उठे और एक नई प्रेरणा से चल पड़े क्योंकि उन्हें अपने सौभाग्य का रास्ता नजर आ गया था। उनके हौंसले बुलंद थे, अब उन्हें सफलता प्राप्त करने से कोई नहीं रोक सकता था।

“किसमें जुर्रत है जो रोके हमारी उड़ान को,

हम परों से नहीं हौंसलों से उड़ा करते हैं”॥

शब्द – अर्थ:

  • चक्षु – नेत्र
  • बुलंद – बहुत ऊँचा
  • जुर्रत – हिम्मत

नैतिक मूल्य: 

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Background music: Behind Your Window (Kai Engel) / CC BY 4.0
दिव्यांग की उड़ान
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