भारत के माउंटेन मैन दशरथ मांझी एक परी कथा से सुंदर राजकुमार या बहादुर लकड़हारे की तरह प्रतीत नहीं हो सकते हैं, लेकिन वह एक असली जीवन नायक है, एक केप के बिना।


सबसे सुन्दर यादें उन आकर्षक परी कथाओं की हैं जो हमने बचपन में सुनी हैं। ऐसी कहानियाँ जहां अंत में सभी चीजें ठीक हो जाती हैं और बुराई दंडित होती है और जिनमें बहादुरी और दृढ़ता की जीत होती है।

हालांकि, जैसे-जैसे हम बड़े होते हैं, हम यह मानने लगते हैं कि वे सिर्फ कहानियाँ थीं और वास्तविकता से उनका कोई लेना देना नहीं है; जब तक कि दशरथ मांझी जैसा कोई हमारे सामने नहीं आ जाता।

हाँ, दशरथ मांझी एक परी कथा के सुन्दर राजकुमार जैसे या बहादुर लकड़हारे की तरह प्रतीत नहीं होते, लेकिन वह एक असली जीवन के नायक हैं, जो कि एक नायक के परिधान के बिना ही हमारा विश्वास इस बात में बहाल करते हैं, कि “जहाँ चाह है, वहाँ राह भी है”, चाहे यह राह किसी पर्वत के रास्ते से ही क्यों न जाती हो। आइये, भारत के बिहार प्रदेश के इस नायक के बारे में जानें।

दशरथ मांझी एक गरीब मजदूर थे जो बिहार के गया के पास गेहलौर नामक एक छोटे से गांव में रहते थे। वह एक गरीब ग्रामीण का सामान्य जीवन जी रहे थे जब तक कि उनके ऊपर और विपदा न आ पड़ी।

मांझी की पत्नी की दुर्घटना हो गई; और उन्हें पर्याप्त और समय पर चिकित्सा देखभाल नहीं मिल सकी क्योंकि आस-पास कोई अस्पताल नहीं था और उनकी मृत्यु हो गई। यदि गांव वालों को अपने गांव के बाहर कहीं भी जाना होता था तो उन्हें पहाड़ के बीच से गुज़रने वाले एक संकीर्ण और खतरनाक रास्ते से घूम कर जाने का जोखिम उठाना पड़ता था। इसका मतलब यह था कि दैनिक ज़रूरतों और चिकित्सा देखभाल तक पहुँचना, गेहलौर में रहने वाले ग्रामीणों के लिए सचमुच एक मुश्किल और कठिनाई भरा कार्य था।

Dashrat Manjhi - Bharat ka mountain main

मांझी अपनी पत्नी की मृत्यु से अत्यंत दुखी थे और अपनी पत्नी की मौत के लिए अपने गांव में सुलभ सड़क की कमी को दोषी ठहराते थे। शायद अगर वह समय पर अस्पताल पहुँच पाती, तो उसकी जान बच सकती थी।

अधिकतर लोग विपरीत भाग्य और सरकार को दोष देते हैं और स्थिति को स्वीकार लेते हैं। किन्तु दशरथ मांझी ने कुछ ऐसा करने का फैसला किया ताकि किसी और को ऐसी ही स्थिति का सामना न करना पड़े। उन्होंने एक सड़क बनाने का फैसला किया जो उनके गांव को बाहरी दुनिया से जोड़ दे और गांव वालों का जीवन आसान और सुरक्षित बन जाए।

मांझी एक गरीब मजदूर थे जिनके पास अपने मिशन को पूरा करने के लिए आवश्यक वित्तीय-शक्ति या जनशक्ति समर्थन नहीं था। उनके पास केवल एक हथौड़ा और छेनी थे और था उनका दृढ़ संकल्प। उनके आस-पास के हर व्यक्ति, (जिसमें उनके पिता भी थे) ने सोचा कि वह एक असंभव कार्य करने जा रहे हैं। एक सड़क बनाने के लिए, हथौड़े और छेनी के साथ पहाड़ को काटने का कार्य, एक अकेले आदमी के लिए कोई बहुत समझदारी भरा विचार प्रतीत नहीं होता था। लेकिन अन्य लोगों के अविश्वास ने मांझी को भ्रमित नहीं किया।

दशरथ मांझी ने पहाड़ के बीचों बीच सड़क बनाने के लिए अपने मिशन की शुरुआत की और २२ वर्षों तक समर्पण के साथ निरंतर प्रयत्न किया। आने वाले वर्षों में कई समस्याएं आईं, गांव में भयंकर सूखा पड़ा; भ्रष्ट अधिकारियों ने उनकी धनराशि हड़प कर उन्हें धोखा दिया लेकिन कुछ भी उन्हें पीछे नहीं हटा पाया। कुछ समय गांव वालों ने उनके कार्य में अपनी सहायता भी दी, लेकिन वह सहयोग विभिन्न कारणों से लम्बे समय तक नहीं चल पाया।

आखिरकार, वर्ष १९८२ में, कार्य शुरू करने के २२ साल के बाद, पहाड़ के बीच से ३६० फीट लंबा और ३० फीट ऊँचा और ३०० फीट चौड़ा मार्ग बनाने में दशरथ मांझी सफल रहे। इस मार्ग ने यात्रा दूरी ५५ किमी से कम कर के १५ किमी कर दी।

वर्ष २००७ में मांझी की मृत्यु हो गई, लेकिन सड़क अभी भी बनी हुई है, जो मूक होते हुए भी दृढ़ता और कड़ी मेहनत का एक शक्तिशाली अनुस्मारक है।

दशरथ मांझी – भारत के ‘माउंटेन मैन’
Rate this post

Leave a Reply

Loading...