सुमेधा और दिव्या बहुत अच्छी सहेलियाँ थी। दोनो को एक दूसरे के साथ रहना और खेलना बहुत पसंद था। परीक्षा आने पर सुमेधा ने देखा कि दिव्या बिल्कुल नहीं पढ़ रही है। उसे यह कुछ अजीब सा लग रहा था, क्योंकि पहले वह ऐसा नहीं करती थी। फिर सुमेधा ने सोचा कि शायद उसने सब कुछ पहले ही पढ़ लिया होगा और मुझे यह सब सोचने की वजह अपनी पढ़ाई में ध्यान देना चाहिये। परीक्षा देने के लिये वह दोनो एक ही कमरे में बैठी। जब कभी भी सुमेधा की नज़र उस पर पड़ती, तो वह दिव्या को देखकर चौंक जाती क्योंकि वह बीच-बीच में लिखना छोड़कर आँखें बंद करके बैठ जाया करती।

एक दिन सुमेधा से रहा नहीं गया। उसने दिव्या से पूछ ही लिया कि वह परीक्षा देते समय आँखें बंद करके क्यों बैठी हुई थी? दिव्या ने बताया कि वह और उसका परिवार एक बाबा को मानते है एवं, “मैं आँख बंद करके उनका दिया हुआ मंत्र पढ़ती हूँ। उन्होने कहा था कि जब भी इस मंत्र का जाप करोगे, तो तुम्हारे सभी काम बन जायेंगे। सुमेधा देख कितना अच्छा है कि पढ़ाई करने की भी ज़रूरत नहीं है, बस मंत्र को पढ़ना है”।

सुमेधा को यह सुन कर बहुत अजीब लग रहा था कि दिव्या ऐसा क्यों कर रही है? उसने दिव्या को समझाने की बहुत कोशिश की लेकिन उसका बाबा पर इतना अटूट विश्वास था कि वह उनके ख़िलाफ़ एक शब्द तक सुनने को तैयार नहीं थी।

Dhongi baba

परीक्षाएँ ख़त्म होने के बाद एक दिन दिव्या के कहने पर सुमेधा भी बाबा के आश्रम जाने को तैयार हो गयी। आश्रम में लोगों की बहुत भीड़ और बाबा के दर्शन के लिये लम्बी-लम्बी क़तारें लगी हुयी थीं। थोडी देर बाद जब सुमेधा और दिव्या की बारी आयी, अंदर जाने पर सुमेधा ने देखा कि बाबा कुर्सी पर जो कि एक सिंहासन से कम नहीं लग रही थी और उनके भक्त नीचे हाथ जोड़ कर बैठे हुये थे। भक्त, बाबा के पैरों में रूपये डाल कर जा रहे थे। वे दोनो भी वहीं बैठ गयीं।

बाबा हवा में हाथ ऊपर करता तो उसके हाथ में फल आ जाता और वह भी भक्तों की पसंद का, क्योंकि बाबा फल देने से पूछता है, “कौन सा फल चाहिये?”

सुमेधा और दिव्या की बारी आने पर दोनो को उनकी पसंद का फल मिल गये। फिर दिव्या कहती है बाबा कितने पहुँचे हुये कि फल खुद ब खुद हवा से बाबा के हाथ में आ जाता है।

बाबा ने दिव्या से पूछा, “तुम्हारी परीक्षाएँ कैसी हुयी और मंत्र का जाप ठीक से किया कि नहीं?”

दिव्या कहती है, “बाबाजी आपने जो मंत्र और विधि बतायी थी बिल्कुल वैसे ही किया”।

फिर बाबा दिव्या को कहते हैं, “अपने मम्मी-पापा को कहना कि हमारी सेवा जल्दी कर दे, तुम्हारे रिज़ल्ट से पहले। नहीं तो, कुछ अनर्थ भी हो सकता है”। बाबा बाद में सुमेधा की तरफ इशारा करके कहते हैं, “तुम्हें भी कोई परेशानी है क्या?”

सुमेधा ने उत्तर दिया, “बाबाजी अगर कोई भी मुश्किल होगी तो मैं आपके पास ज़रूर आऊँगी”।

यह सुन कर बाबा बहुत ख़ुश होते है। इतने में और लोग आ जाते है एवं उन्हें उठना पड़ता है।

सुमेधा जब बाहर निकलती है तो दिव्या थोड़ा आगे निकल जाती है। सुमेधा, आश्रम को ग़ौर से देख ही रही थी कि एक आदमी जिसने लगभग बाबा जैसे कपड़े पहने हुये थे वह थैला लेकर सीढ़ियों पर जा रहा था। उसका चेहरा देखने पर ऐसा लग रहा था कि वह कुछ ग़लत कर रहा है। दिव्या को उसके जान पहचान की आंटी मिलने पर वह उनसे बातें करने में व्यस्त हो गयी।

सुमेधा मौक़ा पाते ही सीढ़ियों से ऊपर चली जाती है। वहाँ पर जो उसने देखा वह चौंकाने वाला था। दिव्या उसे ढूँढ ही रही थी। अचानक सुमेधा को जब सीढ़ियों से उतरते हुये देखा तो दिव्या कहती है कि ऊपर जाने की किसी को भी इजाज़त नहीं है, सिर्फ़ बाबा के लोग ही जा सकते है। रास्ते में सुमेधा, दिव्या से पूछती है, “तुम्हारे मम्मी-पापा को बाबा ने सेवा करने को बोला है इसका मतलब क्या है?”

दिव्या बताती है बाबाजी के मंत्र का असर तभी होगा जब हम उनको दक्षिणा यानि की कुछ रूपये देंगे और फिर दोनो अपने-अपने घर पहुँच जाते है।

रिज्लट निकलने पर दिव्या के अंक अच्छे नहीं आते है। सुमेधा को जब उसके अंक के बारे में पता चलता है तो वह उससे पूछती है कि मंत्र का कोई असर नहीं हुआ। दिव्या सिर झुकाये खड़ी रहती है, उसके पास कोई जबाव नहीं था। सुमेधा कहती है, “चल बाबा के पास चलते है पूछने, ऐसा क्यों हुआ?”

बाबा को जब दिव्या ने अपने रिज्लट के बारे में बताया तो बाबा ने कहा, “तुमने मंत्र अच्छी तरह से नहीं बोला होगा। चलो अब तुम्हें मैं प्रसाद देता हूँ”।

बाबा बातें ही कर रहा था, इतनी देर में सुमेधा भाग कर ऊपर चली जाती है। बाबा जैसे ही हवा में हाथ ऊपर करता है, उसके हाथ में कुछ नहीं आता! और वह आता भी कैसे, क्योंकि सुमेधा फलों वाला थैला सीढ़ियों से ऊपर जा कर चुपचाप नीचे ले आती है एवं सभी भक्तों के सामने उस ढोंगी बाबा की पोल खोलती है। ऊपर छत पर भी जहाँ पर एक बड़ा सा छेद कर दिया था, जिससे फल नीचे फेंका जाता था फिर बाद में वे उसको ढक देते थे। वह भी सुमेधा सभी को दिखाती है। बाबा डर के जैसे ही भागने लगता है वहाँ पर बैठे लोग उसे पकड़ लेते है और फिर पुलिस के हवाले कर देते हैं, क्योंकि धर्म के नाम पर वह बहुत दिनों से लोगों को ठग रहा था।

शब्दार्थ:

  • जाप – किसी शब्द या मंत्र का बार-बार किया जाने वाला उच्चारण
  • विधि – व्यवस्था आदि का तरीका
  • अनर्थ – बुरा
ढोंगी बाबा
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