नन्हें आरव के दादाजी ने उसे जानवरों के साथी हाथी के बारे में बताया।


नन्हा अरनव कल ही अपने स्कूल के साथ चिड़ियाघर घूमकर आया था। जब से वह लौटा, बहुत उत्साहित था, बस उसी के बारे में बातें किये जा रहा था। उसके मन में ढेरों प्रश्न थे, जिनके जवाब पाने के लिए वह बेचैन था।

उसने पापा से प्रश्न किये तो एक दो प्रश्नों के जवाब देने के बाद वह बोले, “बेटा! मैं ऑफिस जाने के लिए तैयार हो रहा हूँ। लौटकर तुम्हारे सवालों का जवाब दूँगा”।

फिर वह मम्मी के पास गया। कभी मम्मी खाना बना रही होतीं, कभी घर का कोई और काम कर रही होतीं। वे उसके एक दो सवालों का जवाब देतीं, फिर कहतीं, “बेटा, अभी फुर्सत नहीं है, बाद में पूछना”।

वह परेशान-सा होकर दादा जी के पास गया और बोला, “दादा जी! क्या आप मेरे सवालों का जवाब दे सकते हैं? या आपको अभी अखबार पढ़ना है?”

दादा जी हँसकर बोले, “अखबार तो पढ़ चुका मैं। पूछो, तुम्हें क्या पूछना है?”

अरनव ने सवालों की झड़ी लगा दी। दादा जी ने उसे रोकते हुए कहा, “बेटा! इतने सारे सवालों का जवाब एक साथ कैसे दूँगा मैं! अच्छा, ऐसा करता हूँ कि मैं तुम्हें एक-एक जानवर के बारे में बताता हूँ”।

“दादा जी! पहले हाथी के बारे में बताइए। मुझे हाथी बहुत अच्छा लगता है। पता है दादा जी, हाथी तो बस पूरे टाइम खाने में ही लगा रहा”।

“हाँ बेटा, हाथी की खुराक बहुत ज्यादा होती है। वह मुलायम टहनियाँ, पत्तियाँ और जँगली फल खाता है। पता है हाथी शाकाहारी होता है यानि यह माँस नहीं खाता है। जँगल में हाथी एक झुंड में रहते हैं। इनका नेता इन्हें ऐसी जगह ले जाता है जहाँ खूब सारे पेड़ पौधे हों, ताकि ये सब भरपेट खा सकें। इस तरह हाथियों का झुण्ड एक जगह से दूसरी जगह घूमता रहता है”।

“दादा जी, जँगल में इतने सारे पेड़ कौन उगाता है?” अरनव ने पूछा।

“बड़ा अच्छा सवाल किया है तुमने”, दादा जी बोले। “भगवान ने सब कुछ बहुत सोच समझकर बनाया है। हाथी इतना अधिक खाता है, तो अनजाने में वही जँगल में पेड़ पौधे लगाता भी है”।

“वह कैसे!” अरनव ने उत्सुकता से पूछा।

“देखो, जब हाथी खाता है तो वह सारे बीज भी खा जाता है, जो उसके गोबर के साथ बाहर निकल आते हैं। हाथी बराबर एक जगह से दूसरी जगह पर घूमते रहते हैं। जगह जगह गोबर गिरा के वे बीज छोड़ते रहते हैं। इन बीजों से नये पेड़ पौधे उगते जाते हैं”।

अरनव को यह सब बड़ा मज़ेदार लगा। फिर वह बोला, “दादा जी, क्या हाथी अपने बच्चे को प्यार करते हैं? और वे उनको गोद में कैसे बिठाते हैं?”

Janwaron ke saathi haathi

दादा जी को उसका प्रश्न सुनकर हँसी आ गयी। वे बोले, “बात तो अच्छी सोची तुमने! हाँ, हाथी भी अपने बच्चों को बहुत प्यार करते हैं। जब भी हाथी का कोई बच्चा जन्म लेता है, तो उसे देखकर सब हाथी खुश होते हैं और अपनी सूँड से उसे प्यार करते हैं। वह शुरू में इतना छोटा होता है कि वह अपनी माँ के नीचे, उसके चारों पैरों के बीच में आ जाता है। जैसे-जैसे माँ आगे बढ़ती है, वैसे-वैसे बच्चा भी आगे बढ़ता है। हाथी के बच्चे बहुत जल्दी चलने लग जाते हैं। और हाँ बेटा! हाथी एक और तरीके से अनजाने में ही दूसरे जानवरों की मदद करता है”।

“वह कैसे दादा जी?”

“जँगल में जब भीषण गर्मी के कारण नदियाँ सूख जाती हैं, तब हाथी उस सूखी नदी तक जाकर अपने पैरों की ताकत से बहुत सी मिट्टी हटा हटाकर तब तक खोदते हैं, जब तक वहाँ पानी नहीं निकल आता। हाथी अपनी प्यास बुझाकर आगे बढ़ जाते हैं। फिर यह गड्ढा उन बहुत से जानवरों के पानी पीने के काम आता है जो ऐसे गड्ढे बनाने लायक ताकतवर नहीं होते”।

अरनव को हाथी के बारे में इतनी सारी बातें पता चल गई थीं, इसलिये वह बड़ा खुश था। अब दादा जी ने उससे अपना होमवर्क पूरा करने को कहा। उन्होंने कहा कि कल फिर वे उसे किसी दूसरे जानवर के बारे में बताएंगे। अरनव खुशी-खुशी अपना होमवर्क करने चला गया।

शब्दार्थ:

  • भीषण – बहुत अधिक और तेज

नैतिक मूल्य:

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