एक पेड़ के तने पर आराम से बैठा जब मैं “दिल्ली के पेड़” नामक किताब पढ़ रहा था, मुझे एक धीमी आवाज़ सुनाई दी। मैंने चारों ओर देखा लेकिन कुछ भी दिखाई नहीं दिया।

आवाज़ थोड़ी बढ़ी तो मुझे महसूस हुआ कि ये इस पेड़ के अंदर से ही आ रही थी। मैंने किताब को बंद किया, पेड़ के तने पर प्यार भरा हाथ रखा और अपने कान आवाज़ के पास किये, तो जैसे पेड़ की दबी हुई भावनायें एक हिचक के साथ बाहर आने लगीं। मैंने ध्यान रखने और देखभाल करने का वादा किया और उसको अपनी बात कहने के लिए अनुनय की।

उसने कहना शुरू किया, “मैं १५ साल पुराना हूँ, फुटपाथ के ऊपर झुका हुआ हूँ और सड़क की ओर जा रहा हूँ। सैकड़ों की संख्या में राहगीर यहाँ से गुजरते हैं, कुछ अपना सिर झुका कर निकलते हैं, जबकि कुछ का सिर मेरे से टकरा जाता है जिसके कारण हम दोनों को ही कष्ट होता है। फलस्वरूप, वो मुझे और डीडीए के बागवानी विभाग को मेरी छंटाई न करने के लिए कोसते हैं।

मेरे लिए इन परिस्थितियों में जीवित रहना बहुत ही कठिन हो गया है। मेरे शाही पूर्वजों – शीशम परिवार के अवशेषों से, जो कि ज़मीन के नीचे दबे हुए हैं, मेरा अपने आप निकल आना शायद मेरे लिए भाग्यशाली नहीं था। जैसे ही मैं खड़ा भर हुआ था, कि यहाँ पुरुषों, महिलाओं और बच्चों का एक बड़ा सा दल आ गया और वे यहाँ की भूमि को बहुत गहरा खोदने लगे जिससे की यहाँ एक गगनचुंबी इमारत बन सके। इस हलचल में एक कोने में बैठे, मैंने अपने पूर्वजों के अवशेष लगभग तीस फुट नीचे गिरते और छोटे–छोटे टुकड़ों में टूटते देखे। आज मैं बहुत गर्व महसूस कर रहा हूँ कि मैं उस पीढ़ी में से एक हूँ, जो इस गगनचुंबी इमारत की नींव में है। यह बात इस आशा को भी जन्म दे रही है कि शायद मैं अपनी आगे आने वाली पीढ़ी को किसी दिन यहाँ की भूमिगत पार्किंग से या पहली मंजिल की बालकनी से उगते देखूँ।

Thus spoke the Sheesham tree

हमारे अंदर जो मानव जाति की सेवा करने का गुण है, और मेरे बचपन की यादें आज मेरे दुखों की कहानी कह रहे हैं। इन कठोर परिस्थितियों को सहते हुए, मैं सड़क के उस पार लगे सफेदा के विशालकाय पेड़ों को देखा करता और एक दिन उन्हीं की तरह विकसित होने की इच्छा रखते हुए उन्हें अपना आदर्श मानने लगा था।

मेरे सारे सपने गायब हो गए, जब अचानक एक दिन मैंने अपने कंधों पर थोड़ा वजन महसूस किया और एक बच्चे के रोने की आवाज सुनी। वो आवाज़ मेरी डाल पर एक कपड़े को बांधकर बनाए गए पालने में से आ रही थी। शुरूआत में तो मुझे इस ज़बरदस्ती की जिम्मेदारी से चिढ़ हुई लेकिन धीरे धीरे जब उस बच्चे को कुछ खिलाने उसकी माँ आती तो उनके स्पर्श से मुझे खुशी और संतुष्टि मिलने लगी और आनंद का एहसास होने लगा। उस बढ़ते हुए परिवार के साथ जीवन आसान लगने लगा और सालों बीत गए इतने कि पालने में झूलने वाले बच्चे बड़े हो गए और मेरी डालियों पर सोने लगे।

रात में मुझे घुटन होती और मैं अपने साथियों से अलग थलग महसूस करता। आटा, चावल, दाल और गैस स्टोव के बोझ तले मैं दब गया और मुझे तेज़ शोर का भी सामना करना पड़ा।

अपने परिवार से अलग होने और चारों ओर से घिरी हुई परिस्थिति में रहने से, मैं भावनात्मक रूप से टूट गया और मेरे हर ओर बंधे हुए एलपीजी के सिलेंडरों और खान पान के धक्कों ने मुझे परेशान कर दिया। यह आघात सालों तक जारी रहा और मेरी इस कैद ने मुझे प्राकृतिक धूप और हवा से वंचित रखा। इस वजह से मेरा शारीरिक विकास प्रभावित हुआ और मैं आसमान की ओर नहीं बढ़ पाया।

एक दिन अचानक, आधी रात में गहरी नींद से मैं अपनी डालों से सिलिंडर गिरने के शोर से जाग उठा और मैंने देखा कि मैं फिर से आज़ाद हो गया था, धूप और हवा से अपना हिस्सा पाने के लिए। सूर्य की पहली किरण देखने के इंतजार ने मुझे घंटों जगाए रखा क्योंकि यह मेरे लिए एक अविस्मरणीय अनुभव होने वाला था। लंबे समय तक धूप सेकने के बाद जब मैंने नीचे जमीन की ओर देखा तो मैं डर गया। मेरे एक ओर मेरे नीचे से पैदल मार्ग गुज़र रहा था, तो दूसरी ओर मेरे पैरों के पास एक चारदीवारी भी बना दी गयी थी जो मुझे मेरे पूर्वजों से और भी दूर कर रही थी।

यह सब मेरी जानकारी के बिना मेरे आसपास हुआ और आज मैं लगभग सड़क तक जा पहुंचा हूँ।” आँसू गिराते हुए उसने धीमे स्वर में कहा, “मेरी क्या गलती है?”

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जब शीशम का पेड़ बोला
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