First published in December 2016 edition


नीलवन कश्मीर की वादियों में स्थित एक घना जंगल था।  नीलवन में कई तरह के पेड़ पौधे, पक्षी और जानवर जाते थे। यह एक ऐसा जंगल था जहाँ सब प्राणी मिल जुलकर रहते थे। इस जंगल के सबसे बड़े सदस्य थे हाथी दादाजी और सबसे छोटी सदस्य थी ‘नन्ही’, एक गिलहरी।

नन्ही कोई साधारण गिलहरी नहीं थी। वह एक विशेष प्रजाति की गिलहरी थी। वह एक उड़ने वाली गिलहरी थी। हालाँकि जन्म कुछ एक महीने पहले ही हुआ था, उसे उड़ने की बहुत चाह थी।  वह रोज़ अपनी माँ और पिता को एक पेड़ से दूसरे पेड़ पर छलाँगे लगाते देखती। नन्ही के परिवार की तरह, उस वन में और भी उड़ने वाली गिलहरियों के परिवार थे। उनमें से नन्ही से थोड़ा बड़ा, पर बाकी सबसे छोटा था, ‘सोनू’। नन्ही और सोनू एक दूसरे के पक्के दोस्त थे। वह रोज़ एक दूसरे के साथ खेलते थे। सोनू पेड़ों पर से बादाम आदि तोड़ लाता और नन्ही उन्हें पेड़ के तने के नीचे जमा देती।

नन्ही बहुत ही खुशमिज़ाज गिलहरी थी, पर उसे एक परेशानी बहुत सताती थी। उसे जल्द से जल्द उड़ना था। उसके सारे दोस्त – सोनू, तारा, रॉकी, रोमा, उससे बड़े थे और वे उड़ सकते थे। एक सिर्फ नन्ही ही थी जो अब तक छलांगे नहीं लगा पाई थी।

एक दिन जब सारी गिलहरियाँ खेल रही थीं, हाथी दादाजी ने नन्ही को बड़े से पेड़ की डाल पर बैठ रोते हुए देखा। उन्होंने नन्ही से पुछा, “क्या हुआ बेटा? क्यों रो रही हो?” नन्ही ने बिलखते हुए कहा, “दादाजी, देखो मेरे सारे दोस्त कैसे खेल रहे हैं, एक मैं ही हूँ जो अब तक उड़ती हुई छलांग लगाना नहीं सीखी हूँ”।

choti si nanhi badi si udaan

यह सुनकर हाथी दादाजी हँस पड़े और बोले, “बेटा हर चीज़ का सही वक़्त होता है। तुम्हें बस थोड़ा सब्र करना पड़ेगा”। इतना कहकर हाथी दादाजी ने अपनी सूँड से नन्ही को सहलाया और वे वहां से चले गए।

नन्ही ने रोना तो बंद कर दिया था, पर वह बहुत ज़िद्दी थी। उसे सब्र नहीं करना था। वह दौड़ते हुए बरगद के पेड़ पर चढ़ गयी और चिल्लाई, “सोनू, तारा, रॉकी, रोमा इधर आओ! मुझे तुमसे कुछ बात करनी है”। नन्ही की चीख सुनकर सारे दोस्त झटपट पेड़ों से कूदते हुए नन्ही के पास आ पहुँचे। सोनू के हाँफते हुए नन्ही से पूछा, “तुम ठीक तो हो? क्या हुआ?” नन्ही ने जवाब दिया, “हाँ सोनू, मैं बिलकुल ठीक हूँ। मेरी बस एक परेशानी है”। यह सुनकर रोमा ने नन्ही से पूछा, “कैसी परेशानी? हमें बताओ, हम तुम्हारी मदद करेंगे”। नन्ही ने उम्मीद भरी आँखों से सबकी तरफ देखते कहा, “सच? तुम मेरी मदद करोगे?” रॉकी ने उछलते हुए जवाब दिया, “हाँ नन्ही, पक्का वादा”।

तारा, जो ये सब चुपचाप सुन रही थी, बोली, “अरे नन्ही, पहले ये तो बताओ तुम्हारी परेशानी क्या है। फिर ही हम तुम्हारी मदद कर सकते हैं”। नन्ही ने बोझिल आँखों से कहा, “मुझे भी उड़ना है, छलांगे लगनी हैं, कूदना है। मुझे पता है मैं छोटी हूँ, पर मैं अब और इंतज़ार नहीं कर सकती। आपको मेरी मदद करनी ही होगी। आपने वादा किया है मुझसे”। तारा ने नन्ही को समझाते हुए कहा, “नन्ही तुम अभी बहुत छोटी हो। जैसे जैसे तुम बड़ी होती जाओगी, तुम्हारे पैरों में शक्ति बढ़ेगी और तुम उड़ पाओगी”। नन्ही ने सर हिलाते हुए कहा, “आपने वादा किया है, अब आपको मेरी मदद करनी ही होगी”। यह बात सुनकर सब दोस्तों ने हामी भरी और वह नन्ही को उड़ाने के लिए तरकीबें सोचने लगे।

अगली सुबह रॉकी बड़े ही उत्साह से नन्ही के घर के बाहर चक्कर लगा रहा था। उसने नन्ही को पुकारते हुए कहा, “नन्ही, जल्दी बाहर आओ, देखो मैं तुम्हारे लिए क्या लाया हूँ”। नन्ही झट से बाहर आ गयी और उसने रॉकी के हाथ में पत्ते देखे।  “ये क्या रॉकी? तुम पत्ते लाए हो?”, नन्ही ने हँसते हुआ रॉकी से पूछा। रॉकी ने जोश से कहा, “हाँ नन्ही, तुम्हारे उड़ने के लिए।  मेरे साथ उस पेड़  पर चलो। मैं तुम्हें दिखाता हूँ”।

टीले पर नन्ही के सारे दोस्त उसका इंतज़ार कर रहे थे। जैसे ही नन्ही पहुँची, सोनू ने उससे कहा, “चलो, अपने हाथ बाहर की तरफ खोलो”। नन्ही ने बिलकुल वैसा ही किया। रोमा झट से नारियल के पेड़ के लम्बे पत्ते ले आई और उसकी मदद से उसने दोनों पत्ते नन्ही के बाज़ुओं पर बाँध दिए। रोमा ने कहा, “अब लगाओ छलांग। बाहें खोलो और पंख हिलाओ”। सब मित्र नन्ही को उड़ता देखने के लिए बड़े ही उत्सुक थे, पर अब नन्ही को थोड़ा सा डर लग रहा था। तारा ने नन्ही से कहा, “जो तुम्हें चाहिए था, वह अब तुम्हें मिल रहा है। तुम कोशिश करो, घबराओ मत। मैं तुम्हारे साथ छलांग लगाऊँगी”। इस विश्वास से नन्ही ने छलांग लगाई पर कुछ ही क्षणों में वह तेज़ी से नीचे गिरने लगी। ये तो अच्छा था कि तारा भी वहीं थी। उसने नन्ही को पकड़ लिया।

सारे मित्रों को अपनी कोशिश की नाकामयाबी पर बड़ा दुःख हुआ। पर उन्होंने हार नहीं मानी। वह नन्ही को दिए वादे को पूरा करने के लिए रोज़ नई तरकीबें सोचते रहते पर अंत में कोई भी तरकीब से नन्ही उड़ नहीं पायी।

एक दिन निराशा में डूबी हुई नन्ही उसी पेड़ पर जा पहुंची जहाँ से उसने पहले छलांग लगने की कोशिश की थी। वह डाल पर खड़ी हो गयी और उसने अपने आप से कहा, “नन्ही, आज तुझे उड़ना ही होगा। तुझमे अब वह शक्ति आ चुकी है। तू अब बड़ी हो गयी है। जो कल तक नामुमकिन था, वो आज मुमकिन होगा”। यह कहकर नन्ही डाल पर से कूद पड़ी। खुले हाथों से वह पेड़ की दूसरी टहनी पर उतरी। नन्ही उड़ पाई!

उस दिन से आज तक नन्ही बड़े बड़े पेड़ों से झूल रही है और अब वह बंदरों की टोली की सबसे अच्छी दोस्त भी बन गई है।

शब्दार्थ

  • खुशमिज़ाज – खुश स्वभाव
  • सब्र – शांति भाव से चुप रहना या सहन करना
  • बोझिल – भारी
छोटी सी नन्ही, बड़ी सी उड़ान
Average rating of 5 from 1 vote

Leave a Reply

Loading...