Post Series: चिंटू की साइकिल

 


उद्यान में चिंटू और उसके दोस्त एक टक आसमान पे नज़रें गढ़ाए बैठे थे।

भीम ने आह भरते हुए कहा, “कितना अच्छा होता न अगर हम आसमान की सैर कर सकते। अंतरिक्ष में तैरने का कितना मज़ा आता!”

ज़ोर से हँसते हुए छोटू ने कहा, “अंतरिक्ष में पहुँचने के लिए बहुत पढाई करनी पड़ती है। ऐसे ही कोई वहाँ नहीं जा सकता।”

छोटू से सहमत होकर मुन्नू बोला, “हाँ, अंतरिक्ष में जाने की इजाज़त केवल अंतरिक्ष यान चलने वाले को मिलती है।”

मन हार कर भीम ने अपनी बाहें फैलाई और गोल घूम कर कहने लगा, “चलो वहाँ न सही, मैं धरती को आसमान समझकर यहीं तैर लेता हूँ।”

यह देखकर सारे दोस्त हँस पड़े और घर की ओर चलने लगे।

अगले दिन जब सारे दोस्त फिर खेल कूद के बाद सांस लेने के लिए कुछ देर बैठे, तब भीम उछल कर बोला, “दोस्तों! मेरे पास एक तरकीब है आसमान तक पहुँचने की।”

मुन्नू ने अचंभित होकर कहा, “क्या? कौन सी तरकीब?”

भीम ने चिंटू की तरफ इशारा करते हुए कहा, “चिंटू! चिंटू हमें आसमान तक ले जाएगा।”

चौंके हुए चिंटू ने कहा, “मैं तुम्हें आसमान में कैसे ले जा सकता हूँ?”

भीम हँसकर बोला, “बुद्धू, तुम नहीं, तुम्हारी साइकिल!”

उत्साहित मुन्नू ने कहा, “हाँ चिंटू, हम तुम्हारी साइकिल पर बैठकर आसमान की ओर जा सकते हैं।”

छोटू ने मुन्नू की हाँ में हाँ मिलाते हुए कहा, “सच चिंटू, ये मुमकिन है, बिना अंतरिक्ष यात्री बनने की पढाई किए सिर्फ तुम्हारी साइकिल ही हमें वहाँ ले जा सकती है।”

चिंटू इस योजना से सहमत नहीं था। उसने कहा, “अंतरिक्ष में ऑक्सीजन नहीं होता, हम साइकिल पर बैठकर बिना साँस लिए कैसे रहेंगे? और पिछली बार मेरी साइकिल खुद ब खुद बोल पड़ी थी। अब ऐसा होगा या नहीं, किसे पता? और तो और, ये यात्रा बहुत खतरनाक हो सकती है। हम वापस नहीं आए तो? नहीं नहीं हम साइकिल पर बैठकर अंतरिक्ष में कतई नहीं जाएँगे।”

चिंटू की इतनी साफ़ मनाई पर कोई कुछ न कह सका। सब अपना मन मसोसकर घर चल दिए।

उस रात जब चिंटू सोने की कोशिश कर रहा था, उसके दिमाग में बस उस साइकिल यात्रा की बात ही चल रही थी। मन ही मन उसे भी साइकिल पर बैठकर आसमान में जाने की चाह थी, पर उसे पता था की यह काम बहुत जोखिम भरा था। इसलिए अपने मन को शांत कर, वह चुप चाप सो गया। थोड़ी देर बाद जब उसकी आँख खुली, उसने देखा कि उसके तकिए के पास एक छोटी सी साइकिल पड़ी हुई थी। आँखें मलते हुए जब उसने उस साइकिल को अपने हाथ में लिया, वह साइकिल मानो उसे आस्तीन से खींचकर बाहर चलने को कह रही थी। जब चिंटू बाहर गया, उसने देखा कि उसकी साइकिल बदलकर एक अंतरिक्ष यान बन गयी थी, जिस पर पहिये लगे हुए थे। चिंटू तो हक्का बक्का रह गया। उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था। वह ये सोच कर चकित था कि साइकिल को उसके और उसके दोस्तों के आसमान में घूमने की इच्छा के बारे में कैसे पता चला। वह सहमे क़दमों से साइकिल की और बढ़कर उस पर बैठ गया।

Chintu ki cycle - Antriksh ki sairजैसे ही उसने अपने पैर पावदान पर रखे, अचानक से उस पर अंतरिक्ष यात्री का सूट चढ़ गया। साइकिल पर एक ऑक्सीजन सिलेंडर भी लगा हुआ था। चिंटू ने साइकिल कस के पकड़ी और धीरे धीरे साइकिल ने अपने आप हवा में उड़ना शुरू कर दिया। चिंटू की धड़कनें अब बहुत तेज़ हो गयी थी।

साइकिल से एक आवाज़ आई जिसने कहा, “चिंटू, डरो मत। उस दिन उद्यान में मैंने तुम दोस्तों की बातें सुन ली थीं। तुम मेरे साथ बिलकुल सुरक्षित हो। अब चलो तुम्हारे दोस्तों को भी अंतरिक्ष यात्रा करने के लिए उठाते हैं।”

इतना कहकर साइकिल धीमी रफ़्तार से हवा में, चिंटू के दोस्तों के घरों की ओर उड़ने लगी। जब छोटू, भीम और मुन्नू उठकर बाहर आए, वह भी चिंटू जितने ही आश्चर्य चकित हुए।

तब चिंटू ने उन्हें हौसला देते हुए कहा, “दोस्तों, घबराओ मत। तुम साइकिल पर बैठकर अंतरिक्ष यात्रा करना चाहते थे न? अब मौका है, आ कर साइकिल पर बैठ जाओ।”

छोटू, भीम और मुन्नू आहिस्ता साइकिल की ओर बढे। साइकिल, जो अब अंतरिक्ष यान बन गयी थी, सितारों की तरह चमक रही थी। उसके ऊपरी हिस्से पर लाल और सफ़ेद लाइटें थी और उसकी दाईं तरफ एक बड़ा दरवाज़ा था। जैसे ही वे तीनों साइकिल के पास पहुँचे, दरवाज़ा खुल गया और छोटू, भीम और मुन्नू सीढ़ियां चढ़ कर अंदर चले गए। वहाँ उन्होंने तीन और सीटें देखीं और एक एक ने अपनी जगह ले ली। सीट पर बैठते साथ ही उन पर अंतरिक्ष यात्री का सूट चढ़ गया। तीनों दोस्त इतने अचंभित थे, कि उनके मुँह से एक शब्द नहीं निकला। सबने अपनी सुरक्षा पेटी बाँध ली और साइकिल तेज़ी से आसमान की ओर उड़ने लगी। थोड़ी देर उड़ने के बाद यान धरती से थोड़ा दूर आ चुका था।

तभी अचानक भीम ने कहा, “इतने सारे सितारे! धरती से तो एक भी नहीं दिखता। कितना सुन्दर दृश्य है।”

मुन्नू ने कहा, “हाँ, वहाँ देखो, अश्विनी नक्षत्र। इसके बारे में हमने विद्यालय में पढ़ा था।”

खुश होकर छोटू ने कहा, “हाँ! याद आया। चिंटू, क्या हम सारे ग्रह भी देख सकेंगे?”

चिंटू ने बड़े उल्लास से कहा, “क्यों नहीं! हम पूरे अंतरिक्ष का भ्रमण करेंगे।”

साइकिल यान अब और तेज़ी से सौर मंडल में घूमने लगा। चिंटू और उसके दोस्तों ने सारे ग्रह – बुद्ध, शुक्र, मंगल, बृहस्पति, शनि, अरुण और वरुण देख लिए। सब मुँह सौर मंडल की सुंदरता को देख कर खुले के खुले ही रह गए।

तभी चिंटू ने कहा, “आज अगर ये साइकिल न होती तो हम यह खूबसूरत चीज़ें कभी नहीं देख पाते।”

भीम ने सिर हिलाते हुए कहा, “सच चिंटू, ये साइकिल हमारे लिए मानो भगवान की देन है।”

इसी दौरान साइकिल अचानक बोली, “बच्चों, मुझे चमत्कारों के लिए ही बनाया गया था और में खुश नसीब हूँ कि मुझे आप जैसे बच्चों के साथ वक़्त बिताने का मौका मिला। अब यात्रा समाप्त करते हैं और घर चलते हैं, वर्ना सब को चिंता हो जाएगी।”

बच्चे खिल खिलाकर हँस दिए और घर लौटने के लिए तैयार हो गए। नीचे उतरते वक़्त, साइकिल ने एक बार फिर सौर मंडल का चक्कर लगाया। बच्चों ने एक बार फिर ग्रह, नक्षत्र और तारे बड़े चाव से देखे। थोड़ी दूर उन्हें चाँद भी दिखा, पर वे चाँद पर अब उतर नहीं सकते थे।

कुछ समय बाद जब वे घर पहुँचे तब चिंटू ने साइकिल से कहा, “शुक्रिया मित्र। हमने तुम्हारी वजह से मानो आज पूरा ज़मीन आसमान घूम लिया है, क्यों दोस्तों?”

सब ने चिंटू की बात में हामी भरी और एक दूसरे से विदा लेने लगे।

तब ही बड़े दुःख से भीम ने साइकिल से पूछा, “हमने सारा आसमान घूम लिया, पर हम चाँद पर कब जाएँगे?”

हँसती हुई साइकिल बोली, “वो यात्रा किसी और दिन के लिए। तैयार रहना!”

इतना कहकर साइकिल अंतरिक्ष यान से फिर अपने मूल रूप में आ गई और बच्चे एक और यादगार अनुभव लेकर घर चले गए।

शब्दार्थ:

  • मन मसोसना – अपनी इच्छा अपने तक ही सीमित रखना
  • पावदान – पैर रखने का बना स्थान
  • अचंभित – आश्चर्यचकित
चिंटू की साइकिल – अंतरिक्ष की सैर
Rate this post

Leave a Reply

Loading...