Post Series: हिरण्मई और भानुप्रिया

एक दिन, भानुप्रिया और हिरण्मई अपने घर के पास के खेत में खेलना चाहती थीं। खेत में चावल उग रहा था और वो इस समय पानी से भरा हुआ था। मगर खेत को देख कर भानुप्रिया और हिरण्मई ने कहानियों की रचना शुरू कर दी थी। हिरण्मई बड़ी थी, तो उसे अपनी कहानी ज़्यादा पसंद थी। वो चाहती थी कि वो गाँव के दो किसान हो, जो दिन भर धूप में काम करेंगे। फिर जब दोपहर के भोजन का समय आए, तो वो पेड़ के नीचे बैठकर सूखी रोटी के साथ “मुक्का” प्याज़ खाएं।

भानुप्रिया छोटी ज़रूर थी, मागर ज़रूरी नहीं था कि वो दीदी कि हर बात से सहमत थी। दीदी कि कहानी में उसे दिख रहा था कि मज़ा कम है, सिर्फ खूब सारा काम और सूखा भोजन है! इसलिए उसकी कहानी में वो दोनों खेत में खुशी के गीत गा रहा थे। वो दोनों अमृतसर में थे, मगर यह खेत सरसों का न होकर, चावल का था।

“तो क्या हुआ?”, भानुप्रिया ने कहा, “रचना का मतलब ही है की कुछ चीजों की कल्पना करनी पड़ती है।”

“क्यूँ न हम मम्मी से सलवार-कुर्ता मांगकर और बालों में परांदा बांधकर आयें?”, भानुप्रिया बोली।

“मेरे बाल अब परांदे के लिए लंबे नहीं रहे!”, हिरण्मई झल्ला कर बोली।

उसके बाल बहुत लंबे थे और उसकी मम्मी के बाल तो एड़ियों तक आते थे। बड़ी होकर वो अपने बाल लंबे रखना चाहती थी। मगर अफसोस, पिछले हफ्ते ही उसके बाल काट दिये थे। उसके स्कूल में लंबे बालों का “करेला” बनाना ज़रूरी था, और इस काम में कम-से-कम बीस मिनट लग जाते थे। इस कारण उसके बाल काटना ज़रूरी था, जिससे उसे बहुत दुख पहुंचा।

भानुप्रिया को अब अफसोस हुआ की उसने परांदे कि बात करी। उसे परांदे का उत्साह बहुत था, आखिरकार उसने परांदे को पहली बार पंजाब में ही देखा था। मगर वो दीदी का दिल नहीं दुखाना चाहती थी। हिरण्मई भी यह बात समझती थी, इसीलिए उसने तय किया कि वो खुद किसान बनेगी, छोटे बालों के साथ, और उसकी बहन किसान की बीवी बनेगी, सलवार-कुर्ता और परांदे के साथ। खुशी-खुशी वो दोनों घर की तरफ भागे तय्यार होने के लिए।

उन्होने कई घंटों तक अपनी इस रचना का लुत्फ उठाया। उन्हे दो-तीन फिल्म के गाने भी याद आ गए, जो उन्होने खूब ऊंचे स्वर में गाए। खेत में इधर-उधर भागते हुए उनके पैर तो भीग गए थे, मगर जब मज़ा आ रहा था, तो इस सब कि परवाह क्या थी?

अचानक ही, उन्होने एक आदमी को अपनी ओर भागते हुए देखा। वो सरदारजी बड़ी ज़ोर-ज़ोर से पंजाबी में कुछ चिल्ला रहे थे और उनकी तरफ इशारा कर रहे थे। हिरण्मई और भानुप्रिया को तभी एहसास हुआ कि उन्होने चावल का खेत बर्बाद कर दिया था! जहां-जहां वो खेले थे, वहाँ-वहाँ चावल कि फसल तहस-नहस हो गयी थी। जैसे-जैसे वो आदमी पास आ रहा था, वैसे-वैसे उनकी ग्लानी बढ़ती जा रही थी।

सरदार जी जब पास पहुचे तो उन्होने फिर से पंजाबी में कुछ कहा। जब उन्हें दिखा कि बच्चे पंजाबी नहीं समझ रहे थे, तो उन्होने हिन्दी में पूछा, “तुम कौन हो?”

हिरण्मई ने पूरी हिम्मत जुटा के कहा, “हम सामने के फौजी के घरों में रहते हैं। हमें माफ कर….”।

उसकी बात खत्म करने से पहले ही सरदारजी ने हाथ दिखाकर रोक दिया। बच्चों कि तरफ मुस्कुराते हुए बोले, “खेत में खेलते हुए सावधान रहना। पानी से भरा हुआ होने के कारण ज़मीन चिकनी है। तुम फिसल भी सकते हो। अब बहुत शाम हो गयी है, तुम्हें घर जाना चाहिए।” यह कहते हुए वो उन्हें घर तक छोड़ आये और वापस खेत की तरफ चल दिये।

हिरण्मई और भानुप्रिया को आश्चर्य हुआ कि बिना कुछ कहे या आवाज़ ऊंची किए, सरदाजी ने अपनी बात कह दी। उन्हें समझ में आ गया कि खेत में खेलने से नुकसान हो सकता है। असल में नुकसान तो किसान का था, मगर यह बात उन्हे प्यार से समझाई गयी।

शाम के खाने का समय आ गया था और उनके हाथ-पैर बहुत गंदे थे! इससे पहले कि उन्हे मम्मी से डांट पड़े, वो हाथ-पैर धोने के लिए भाग गए।

शब्दार्थ

  • मुक्का प्याज़ – पूरे प्याज़ को मुक्के से मार कर तोड़ना
  • बालों का करेला – बालों की चोटी बनाकर, उसको मोड़ कर चोटी की शुरुआत में बांधना
  • लुत्फ – मज़ा
  • ग्लानी – अपनी गलती का एहसास होना

अंग्रेज़ी में पढे

चावल का खेत
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